ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वैसी आलोचना खुलकर करने से बचते हैं, जैसी फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी करते हैं। ब्रिटिश पीएम कीर स्टार्मर एक खास रणनीति पर काम कर रहे हैं। रणनीति यह है कि अमेरिका को न तो उकसाया जाए और न ही मतभेदों को सार्वजनिक मंच पर लाया जाए।
ग्रीनलैंड के मसले पर भी स्टार्मर ने वैसी प्रतिक्रिया नहीं दी। दूसरे शब्दों में कहें तो डाउनिंग स्ट्रीट ने बेहद नरम रुख अपनाया, जबकि फ्रांस और डेनमार्क ने ट्रंप के प्लान के खिलाफ तीखी आवाज उठाई।
टैरिफ के मामले में भी ब्रिटेन ने कोई जवाबी कार्रवाई का संकेत नहीं दिया। यूरोपीय संघ ने भी कीर स्टार्मर से अलग रुख अपनाया और ट्रंप की हर हरकत पर सख्त प्रतिक्रिया दी। कीर स्टार्मर की धैर्य वाली रणनीति पर अब सवाल उठने लगे हैं।
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पिछले साल अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क ने भी निजी तौर पर स्टार्मर सरकार को घेरा था। ग्रूमिंग गैंग के मामले में उन्होंने सरकार बदलने तक की भी मांग की थी। तब भी स्टार्मर ने नरम रुख ही अपनाया था। इसी साल अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किया। इस मामले में भी ब्रिटेन ने ट्रंप की आलोचना नहीं की। उसे पहली प्रतिक्रिया ही देने में 16 घंटे लग गए।
क्या कीर स्टार्मर डबल गेम खेल रहे?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ने अपने एक बयान से यूरोप में ताजी नाराजगी फैला दी। ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि अफगानिस्तान युद्ध में यूरोप के सैनिक अग्रिम मोर्चे पर नहीं थे। ट्रंप के इस बयान पर पहली बार कीर स्टार्मर ने कड़ी प्रतिक्रिया देने की कोशिश की। यही कारण है कि उनकी इस प्रतिक्रिया को ट्रंप की दुर्लभ आलोचना माना जा रहा है। हालांकि तब भी स्टार्मर ट्रंप को सीधे तौर पर कुछ भी कहने से बचते दिखे।
जब उनसे पूछा गया कि ट्रंप ने दावा किया कि अफगानिस्तान में यूरोप के सैनिक अग्रिम मोर्चे पर नहीं थे। क्या वह ट्रंप से माफी की मांग करेंगे। जवाब में स्टार्मर ने कहा, 'अगर मैंने उस तरह से कुछ गलत कहा होता तो मैं निश्चित रूप से माफी मांगता।' यहां भी स्टार्मर शब्दों से खेलते दिखे। वह इसका सीधा जवाब दे सकते थे, 'ट्रंप को माफी मांगनी चाहिए।' ब्रिटेन अब जहां अपने ताजा रुख से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह अमेरिका को कड़ी प्रतिक्रिया दे सकता है। अमेरिका से हर मामले में वह एक सुर नहीं है। मगर पर्दे के पीछे वह पूरी तरह से अमेरिका से कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।
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चागोस द्वीप समूह: डोनाल्ड ट्रंप ने चागोस द्वीप समूह मॉरीशस को देने की न केवल आलोचना की बल्कि ब्रिटेन के कदम को घोर मूर्खता करार दिया। ट्रंप के बयान पर ब्रिटेन ने प्रतिक्रिया से बचना उचित समझा। इसके बाद चागोस द्वीप समूह विधेयक को भी वापस ले लिया। पिछले साल स्टार्मर की सरकार ने ही चागोस द्वीप वापस देने का फैसला किया था। अब अमेरिकी दबाव में अपने ही फैसले से पीछे हटना पड़ रहा है।
ईरान: ब्रिटेन की सरकार ईरान मामले में भी अमेरिका के साथ पर्दे के पीछे और सामने दोनों जगह एक साथ है। कई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि तेहरान में इजरायल और अमेरिका की मदद भी ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने किया। ओमान के पास और ईरान के करीब ब्रिटेन ने एक गुप्त ठिकाना भी तैयार किया है। अमेरिकी सेना मध्य पूर्व में ईरान के खिलाफ बड़ी तैयारी में जुटी है। अमेरिका के साथ ब्रिटेन ने भी कतर में अपने टाइफून लड़ाकू विमानों को तैनात किया है।
रूसी तेल टैंकर: इसी महीने अमेरिका की नेवी ने उत्तर अटलांटिक के पास रूसी तेल टैंकर बेला 1 को पकड़ा। जहाज पर रूसी झंडा लगा था। इसके बाद भी अमेरिकी सैनिक जहाज पर उतरे और सभी क्रू सदस्यों को हिरासत में ले लिया। बाद में ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि रूसी टैंकर को पकड़ने में ब्रिटेन की सेना भी शामिल थी। हालांकि यह भी साफ किया कि कोई भी ब्रिटिश जवान टैंकर पर नहीं उतरा। ब्रिटेन ने ऐसा इसलिए कहा, ताकि रूस के साथ तनाव न बढ़े।
