अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज होने के बाद से तालिबान लगातार अपने हिसाब से नियम बना रहा है। कभी वह महिलाओं की शिक्षा पर बैन लगाता है तो कभी उनके घर से निकलने पर रोक लगा देता है। अब एक नया 'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड फॉर कोर्ट्स' को लेकर नया बखेड़ा शुरू हो गया है। इसके तहत लोगों को 4 वर्णों में बांटा जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे ऋगवेद में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का जिक्र है। इसमें सबसे ऊपर मुल्ला आएंगे और निचले तबके के लोग उन्हें छू भी नहीं पाएंगे। इतना ही नहीं, इन मुल्लाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी नहीं की जा सकेगी।
अब मानवाधिकार समूह इसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। इन समूहों का कहना है कि यह तालिबान कोड गुलाम प्रथा को फिर से शुरू कर देगा क्योंकि इसमें गुलामी को कानूनी मान्यता दी गई है।
तालिबान कोड में क्या है?
इसी तालिबान कोड का अनुच्छेद 9 कहता है कि अफगानिस्तान के लोगों को चार क्लास (वर्ण) में बांटा जाएगा। सबसे ऊपर धार्मिक गुरु या मुल्ला आएंगे। मानवाधिकार संगठन रवादारी का कहना है कि अगर मुल्ला कोई अपराध करते हैं तो उन्हें सिर्फ सलाह दी जाएगी जबकि निचले तबके में रखे गए लोगों को भीषण सजा दी जाएगी। यह रवादारी संगठन वही है जिसने तालिबान के सत्ता में आते ही देश के बाहर शरण ले ली थी।
नए नियमों के मुताबिक, तालिबान शासित अफगानिस्तान में लोगों को जो सजा मिलेगी वह उनके क्लास पर निर्भर करेगी। मतलब अगर उच्च जाति वाला हुआ तो कम सजा मिलेगी और निचली जाति के लोगों को ज्यादा सजा मिलेगी।
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इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन नियमों ने कुछ खास तरीके की हिंसा पर रोक लगा दी है। खासकर ऐसी हिंसा जिसमें चमड़ी उधड़ जाय या फिर हड्डी टूट जाए। लंदन से चलने वाले एक अफगानी न्यूज चैनल 'अफगान इंटरनेशनल' का कहना है कि अगर कोई 10 साल के बेटा नमाज नहीं पढ़ता तो उसका पिता इसके लिए उसे सजा दे सकता है।
गुलामी को कानूनी मान्यता मिलेगी?
नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट (NRF) की मीडिया सेल का कहना है कि तालिबान का शासन अब गुलाम प्रथा को कानूनी रूप दे रहा है। तालिबान कोड का अनुच्छेद 15 कहता है कि किसी भी अपराध की स्थिति में कोई 'हद' तय नहीं की गई है। इसके लिए ताजिर का नियम है जिसमें यह देखा जाता है कि अपराधी आजाद है या गुलाम।
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अनुच्छेद 4 का पैराग्राफ 5 कहता है कि हुदूद सजा का एलान इमाम करते हैं जबकि ताजिर की सजा पति या मालिक सुना सकते हैं। अब मानवाधिकार समूहों का कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ है क्योंकि वैश्विक स्तर पर गुलाम प्रथा पर रोक लगाई जा चुकी है।
