आंखों के रोगों में ग्लूकोमा को सबसे गंभीर बीमारी माना जाता है, क्योंकि इससे व्यक्ति अंधा भी हो सकता है। ग्लूकोमा को 'साइलेंट थीफ ऑफ साइट' कहते हैं। आसान भाषा में इसका मतलब है कि यह ऐसी बीमारी है, जो आपकी आंखों की रोशनी चुरा ले जाती है। इसके लक्षण अक्सर शुरुआती दौर में दिखाई नहीं देते। नेत्र रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि इस रोग में धीरे-धीरे आंखों की रोशनी खत्म हो जाती है और मरीज को इसका पता तब चलता है, जब बीमारी बुरी तरह फैल चुकी होती है।

 

भारत में अंधापन के बढ़ते मामलों में ग्लोकोमा एक बड़ी वजह है। इस बीमारी का इलाज न के बराबर हो पाता है, क्योंकि इसके लक्षण लोगों को समय पर महसूस नहीं होते। इसी कारण इसे ‘साइलेंट थीफ ऑफ साइट’ कहा जाता है। आंखों के जानकारों का कहना है कि ग्लूकोमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है। दवाओं और सर्जरी के माध्यम से केवल आगे होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है, लेकिन जो नुकसान हो चुका होता है, उसे ठीक नहीं किया जा सकता।

 

इस बीमारी के लक्षण बहुत कम होते हैं। आमतौर पर आंखों में दर्द नहीं होता, केवल हल्की लालिमा दिखाई दे सकती है। इसी वजह से यह रोग चुपचाप आंखों को भारी नुकसान पहुंचा देता है। मरीज अपनी आंखों की रोशनी खो देता है और उसे पता नहीं चलता। ग्लूकोमा में नजर धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है। शुरुआत में मरीज पढ़ने, गाड़ी चलाने जैसे रोजमर्रा के काम कर सकता है, लेकिन बाद में अचानक उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है।

 

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ग्लूकोमा क्या है और यह इतना खतरनाक क्यों है?

 

ग्लूकोमा एक ऐसी बीमारी है जिसमें आंखों की ऑप्टिक नर्व (Optic Nerve) को नुकसान पहुंचती है। ऑप्टिक नर्व आंखों से देखी गई चीजों की जानकारी दिमाग तक पहुंचाती है। ग्लूकोमा में यह नुकसान अक्सर आंखों के अंदर बढ़े हुए दबाव (आई प्रेशर) के कारण होता है।

 

मार्च 2023 में इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 90 प्रतिशत ग्लूकोमा मरीजों का समय पर इलाज नहीं हो पाता। इसकी वजह यह है कि मरीज देर से डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, जब तक आंखों को भारी नुकसान हो चुका होता है। ऐसे में आंखों की रोशनी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाती। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्लूकोमा आंखों के लिए एक बेहद खतरनाक बीमारी है।

 

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किन लोगों को होता है ग्लूकोमा?

 

आंखों की विशेषज्ञ डॉ. पूजा प्रभु बताती हैं कि 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोग, जिनके परिवार में पहले ग्लूकोमा का इतिहास रहा हो, मधुमेह (डायबिटीज) के मरीज, हाई पावर का चश्मा पहनने वाले लोग, लंबे समय तक स्टेरॉयड खाने वाले व्यक्ति और आंखों में चोट लगने वाले लोग ग्लूकोमा के अधिकतर  शिकार होते हैं।

 

डॉ. पूजा प्रभु का यह भी कहना है कि आजकल ग्लूकोमा किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है।डॉक्टरों का मानना है कि ग्लूकोमा की ठीक समय पर पहचान बेहद जरूरी है, तभी आंखों को कम से कम नुकसान पहुंचता है। इसलिए यदि आंखों में हल्की सी भी लालिमा या कोई असामान्य लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत आंखों की जांच करानी चाहिए। इससे व्यक्ति को अंधा होने से बचाया जा सकता है।

ग्लूकोमा का इलाज क्या है?

डॉ. पूजा प्रभु के अनुसार, ग्लूकोमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है। इस बीमारी से आंखों को जो नुकसान हो जाता है, उसे कभी ठीक नहीं किया जा सकता। हालांकि, दवाओं और सर्जरी के जरिए आगे होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है।