हमारे भारत में एक अजीब सी सोच घर कर गई है, हम काम के बोझ को किसी 'मेडल' की तरह पहनकर घूमते हैं। आपने अक्सर सुना होगा लोग बड़े गर्व से कहते हैं, 'भाई, दिवाली थी फिर भी ऑफिस की फाइलें निपटा रहा था' या 'दो साल हो गए, एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली।'

 

हमें लगता है कि जितना ज्यादा हम खुद को थकाएंगे, समाज में उतनी ही इज्जत बढ़ेगी लेकिन बेंगलुरु के NIMHANS (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज) की हालिया रिपोर्ट्स और वहां के मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह कोई गर्व की बात नहीं बल्कि एक मानसिक बीमारी की शुरुआत है। डॉ. समीर पारिख (फोर्टिस नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के डायरेक्टर) के अनुसार, हम अक्सर दूसरों को इम्प्रेस करने के लिए अपनी नींद और सुकून का सौदा कर लेते हैं, जिसे वो 'टॉक्सिक प्रोडक्टिविटी' कहते हैं। 

 

हमारे अंदर हमेशा एक डर बैठा रहता है कि 'अगर मैंने आज आराम किया, तो मेरा पड़ोसी या मेरा कलीग मुझसे आगे निकल जाएगा।' इसे ही एक्सपर्ट्स 'पीछे छूट जाने का डर' यानी FOMO कहते हैं। इसी चक्कर में हम अपनी नींद और चैन बेच देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हर किसी की ज़िंदगी की रेस अलग है। दूसरों को इम्प्रेस करने की इस होड़ में हम अपनी सेहत का कबाड़ा कर लेते हैं।

 

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शरीर का अलार्म

सिर्फ मानसिक ही नहीं, शारीरिक रूप से भी यह कल्चर हमें खोखला कर रहा है। लांसेट (The Lancet) की एक हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में युवाओं में बढ़ते हार्ट अटैक का एक बड़ा कारण जरूरत से ज्यादा काम का तनाव है।

 

डॉ. देवी शेट्टी (नारायण हेल्थ के चेयरमैन) ने भी कई बार कहा है कि अगर आप मशीन की तरह 14-14 घंटे बिना ब्रेक के काम करेंगे, तो आपका शरीर 40 की उम्र तक आते-आते बूढ़ा हो जाएगा। डॉक्टर्स सुझाव देते हैं कि हमें दिन में कम से कम 20 मिनट 'नथिंगनेस' (बिल्कुल खाली बैठना) का अभ्यास करना चाहिए। ICMR (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) की स्टडीज भी बताती हैं कि लगातार स्क्रीन टाइम और काम का बोझ हमारे शरीर में 'कोर्टिसोल' यानी स्ट्रेस हार्मोन को खतरनाक स्तर तक बढ़ा देता है।

हमेशा की थकान

जब हम बिना रुके भागते रहते हैं तो हमारा शरीर एक ऐसी हालत में पहुंच जाता है जिसे डॉक्टर्स 'क्रोनिक फटीग' कहते हैं। आसान भाषा में इसका मतलब है, ऐसी थकान जो सोने से भी ठीक नहीं होती। आप सुबह सोकर उठेंगे तब भी ऐसा लगेगा कि शरीर में जान नहीं है। चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता है और किसी भी काम में मन नहीं लगता। एक्सपटर्स की सलाह सीधी है, अगर आप मशीन को भी 24 घंटे चलाओगे तो वह फुंक जाएगी, आप तो फिर भी इंसान हैं।

 

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ब्रेक लेना कमजोरी नहीं है

एक्सपटर्स का मानना है कि असली कामयाब इंसान वह नहीं है जो पागलों की तरह काम करे, बल्कि वह है जो जानता है कि कब रुकना है। भारतीय एक्सपर्ट्स अब 'मिनिमलिज्म' की सलाह दे रहे हैं। इसका मतलब है कि अपनी जिंदगी से उन फालतू के कामों और तनावों को हटा दें जो आपकी सेहत बिगाड़ रहे हैं।

 

छुट्टी लेना या त्योहार पर काम न करना कोई गुनाह नहीं है। जब आप आराम करते हैं तो दिमाग शांत हो जाता है और अगले दिन और भी बेहतर काम कर पाते हैं। अपनी 'सेल्फ-वर्थ' यानी अपनी कीमत को सिर्फ काम से मत जोड़िए। काम से बढ़कर आपकी सेहत है।