महात्मा गांधी ने कहा था, 'भारत की आत्मा गांवों में बसती है।' यह सिर्फ बयान नहीं है बल्कि उस वक्त की हकीकत थी। अब का भारत लग है। वैसे तो सरकारी आंकड़ों में उनके निधन के 78 साल बाद भी भारत की 65 फीसदी आबादी गांवों में रहती है। कुल 47 प्रतिशत आबादी अपने जीवन यापन के लिए कृषि कार्यों पर निर्भर है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के नए आंकड़े, अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'कागजों' में तो ग्रामीण है, लेकिन वहां का जनजीवन, काम-धंधा और घनत्व पूरी तरह शहरी हो चुका है। शहरी नहीं तो इन इलाकों को कस्बाई इलाका तो कहा ही जा सकता है।
शहरीकरण की रफ्तार धीमी हो गई है। देश की आबादी में शहरों में रहने वाले लोगों का हिस्सा कम-मध्यम आय वाले देशों के औसत से भी थोड़ा कम है। विशेषज्ञ राकेश मोहन कहते हैं कि इसका एक बड़ा कारण उद्योगों का गांवों में फैलना है। चीन, पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में उद्योग मुख्य रूप से शहरों में विकसित हुए, जिससे लोग गांव से शहर की ओर पलायन करते रहे, लेकिन भारत में गांवों में भी काफी मैन्युफैक्चरिंग हो रही है।
साल 2011 की जनगणना बताती है कि देश का सिर्फ 31 फीसदी हिस्सा शहरी है लेकिन अब, सैटेलाइट इमेज, नाइट लाइट, घनत्व और आवाजाही के नए तरीकों से पता चलता है कि असल में भारत कहीं ज्यादा शहरी है। संयुक्त राष्ट्र के 2025 आंकड़ों के अनुसार 2015 में भारत 63 फीसदी शहरी था, यानी लगभग दोगुना।
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जनगणना के आंकड़े क्या कह रहे हैं?
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत सिर्फ 31 फीसदी इलाका शहरी था। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा पुराना और अधूरा है। जनाग्रह फाउंडेशन की रिपोर्ट 'द एनुअल सर्वे ऑफ इंडिया सिटी सिस्टम 2023' और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि देश साल 2015 में ही 63 फीसदी शहरी हो चुका था। यह संख्या, जनगणना के आंकड़ों से दोगुना है।
शहरों की परिभाषा क्या है?
आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि अगर घाना या मैक्सिको जैसे देशों के शहरों की परिभाषाओं को को पैमाना मानें तो ये आंकड़े और बढ़ जाते हैं। इन देशों में 5000 या 2500 से ज्यादा आबादी को शहरी मान लेते हैं।
अगर मेक्सिको की आबादी को फॉर्मूला मानें तो भारत कितना शहरी?
मेक्सिको में शहरी क्षेत्र की आबादी का फॉर्मूला मानें तो भारत की 65 फीसदी आबादी शहरी होगी। यहां 2500 से ज्यादा लोग, जहां हों, वह इलाका शहरी होता है। अगर घाना की मानें तो देश की 47 फीसदी आबादी शहरी है। यहां 5000 से ज्यादा की आबादी को शहरी माना जाता है। साल 2011 में हुई जनगणना के आंकड़े कहते हैं कि भारत में शहरी क्षेत्र 31 फीसदी हैं।
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कैसे शहरी हो रहा है भारत, आंकड़ों से समझिए
नाइट टाइम लाइट्स (NTL) के आंकड़े में इन दावों की हकीकत नजर आती है। सैटेलाइट तस्वीरें बताती हैं कि इन इलाकों में ऐसी गतिविधियां हो रहीं हैं, जो शहरी इलाकों में होती हैं। यहां जनसंख्या घनत्व ज्यादा है, नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC), इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISNO) की तस्वीरें भी बताती हैं कि शहरी क्षेत्रों का प्रसार बढ़ा है। सैटेलाइट से ली गई नाइट टाइम लाइट्स की तस्वीरें इस बात का सबसे आसान और आकर्षक प्रमाण हैं। 2012 से 2023 के बीच दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे शहरों में रात का उजाला बहुत बढ़ गया है।
मुंबई जैसे शहरों में शहर का केंद्र कम बढ़ा लेकिन आसपास के इलाकों में खूब शहरीकरण फैला। पुणे और हैदराबाद जैसे शहरों में तेज विकास हुआ। भारतीय शहर, अब शहरों की सीमा तोड़कर गांवों तक फैल रहे हैं। 16 बड़े शहरों में बाहरी इलाके शहर के केंद्र से तेजी से बढ़ रहे हैं। नये घर, फैक्टरियां, गोदाम, दफ्तर सब शहर की सीमा के बाहर बन रहे हैं। सड़कें, मेट्रो और ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के साथ-साथ शहर फैल रहे हैं। शहरों का विस्तार गांवों तक हो रहा है।
आगे क्या?
आर्थिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक अब शहरों की योजना बनाते समय सिर्फ पुरानी नगर निगम सीमाओं को नहीं देखना चाहिए। सरकार को शहर, आसपास के गांव और कस्बे को एक साथ देखना होगा, क्योंकि लोगों की आबादी, नौकरियां और आर्थिक गतिविधियां अब इन सीमाओं को पार कर चुकी हैं। ग्रामीण क्षेत्र तेजी से शहरी हो रहे हैं।
भारत के शहरी क्षेत्र बढ़ने का दावा किस आधार पर हो रहा है?
भारत सरकार की पारंपरिक जनगणना किसी क्षेत्र को 'शहरी' घोषित करने के लिए तीन नियम शर्तें केंद्र सरकार ने तय की हैं। यह पुरानी परिभाषा है। साल 2011 की जनगणना में इसी को आधार बनाकर यह दावा किया गया था कि भारत की 31.1 फीसदी इलाका शहरी है।
- पहली शर्त: 5,000 आबादी से ज्यादा हो
- दूसरी शर्त: कम से कम 75 फीसदी पुरुष कामकाजी आबादी गैर-खेती कार्यों में लगी हो
- तीसरी शर्त: जनसंख्या का घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो
सैटेलाइट आंकड़े क्या कह रहे हैं?
यूरोपियन कमीशन और यूनाइटेड नेशंस डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक एंड सोशल अफेयर्स (UNDESA) किसी इलाके को शहरी बताने के लिए अलग फॉर्मूले का इस्तेमाल करते हैं। इसे डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन (DEGURBA) फॉर्मूला कहा जाता है। यह प्रशासनिक सीमाओं को नहीं, बल्कि सैटेलाइट इमेज और आबादी के वास्तविक फैलाव को मापता है।
ग्लोबल ह्यूमन सेटलमेंट लेयर (GHSL) का सैटेलाइट डेटा बताता है कि भारत साल 2015 में ही 63 प्रतिशत शहरी हो चुका था। इसका मतलब है कि भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है, जो शहरी मानकों पर खरे उतरते हैं।
भारत के शहरी होने की वजह क्या है?
देश में उद्योगों का ग्रामीकरण तेजी से हुआ है। फैक्ट्रियां और मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट, अब शहरों के दायरे से निकलकर गांवों तक पहुंच रहे हैं। शहरी सीमाओं पर उद्योग लगाना लोग ज्यादा पसंद कर रहे हैं। जमीन सस्ती होने की वजह से कंपनियां ग्रामीण इलाकों में प्लांट लगाती हैं। वहां काम करने वाले लोग खेती छोड़कर फैक्ट्रियों में काम करने लगते हैं। उनका जीवन स्तर, काम का तरीका तो शहरी हो जाता लेकिन कानूनी दर्जा गांव का रहता है। वजह यह होती कि वह इलाका, किसी नगर निगम का हिस्सा नहीं होता।
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आर्थिक सर्वे में केरल का अलग से जिक्र क्यों?
केरल में शहरी इलाके का विस्तार ज्यादा है लेकिन सरकारी आंकड़े अलग तस्वीर दिखाते हैं। साल 2011 की जनगणना में केरल का शहरीकरण 47.7 दर्ज था। असली आंकड़े 80 फीसदी से ज्यादा है। आर्थिक सर्वे 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि केरल में शहरीकरण 82.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
केरल में गांव और शहर की सीमाएं खत्म हो गई हैं। शहर का दायरा बढ़ गया है।
गावों के शहरीकरण से बदला क्या है?
आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट में बताया गया है कि जब कोई इलाका सैटेलाइट इमेज में शहर होता है लेकिन कागजों में गांव, तब भी वहां पंचायत के ही नियम लागू होते हैं। बहुमंजिला इमारतें या बेहतर टाउन प्लानिंग से ऐसे इलाके दूर रहते हैं। म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की तरह कचरा प्रबंधन, सीवरेज ग्रिड और पानी की पहुंच का इंतजाम शहरों की तरह नहीं हो पाता, जबकि जरूरतें वैसी ही होती हैं। बजट ग्रामीण विकास के लिए आवंटित होता है, जो कि नई जरूरतों के हिसाब पर्याप्त नहीं होता है। आर्थिक सर्वेक्षण में अपील की गई है कि प्रशासनिक परिभाषाओं को छोड़कर सैटेलाइट और नए आंकड़ों के आधार पर शहरों के लिए योजाएं बनाई जाएं।


