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घर से चलते हैं एक तिहाई से ज्यादा कारोबार, 86 पर्सेंट लोग लगाते हैं खुद का पैसा

छठी आर्थिक जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि छोटे प्रतिष्ठानों, उनमें काम करने वाले लोगों और इनसे मिलने वाले रोजगार में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT

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देश में होने वाली जनगणना में जिस तरह लोगों, उनके घर, गाड़ियों और अन्य संसाधनों की गिनती होती है उसी तरह एक आर्थिक जनगणना भी होती है। इसमें उन प्रतिष्ठानों की गिनती होती है जिनसे लोग कमाई करते हैं। इसमें घरों से चलने वाली दुकानें, कोई उद्योग, एक ही जगह से चलने वाले उद्योग और कम लोगों के साथ चलने वाले प्रतिष्ठान शामिल होते हैं। छठी आर्थिक जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि ऐसे 36 प्रतिशत प्रतिष्ठान लोगों के घरों से चलते हैं। इतना ही नहीं, इन्हें चलाने के लिए जरूरी पूंजी का जुगाड़ 86 प्रतिशत लोग अपने घर के पैसों, जमापूंजी या दूसरों से उधार लेकर ही करते हैं।

 

इस जनगणना के लिए सर्वे जनवरी 2013 से अप्रैल 2014 के बीच हुआ था। अगस्त 2014 में प्रारंभिक रिपोर्ट भी आई थी लेकिन विस्तृत रिपोर्ट अब सामने आई है। इस बीच सातवीं आर्थिक जनगणना हो चुकी है और जून 2026 से आठवीं आर्थिक जनगणना भी शुरू हो चुकी है।

क्या कहती है आर्थिक जनगणना?

छठी आर्थिक जनगणना बताती है कि देश में कुल 5.85 करोड़ प्रतिष्ठान चल रहे थे। इसमें से 3.48 करोड़ यानी 59.48 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र में थे और 2.37 करोड़ यानी 40.51 प्रतिशत शहरी क्षेत्र में थे। 4.53 करोड़ यानी 77.6 प्रतिशत प्रतिष्ठान ऐसे थे जिन गैर-कृषि वाले काम हो रहे थे। वहीं, बाकी के 1.32 करोड़ प्रतिष्ठान खेती और उससे जुड़े कामकाज से संबंधित थे। इसमें खेती के अलावा, कटाई, मड़ाई और वृक्षारोपण जैसे काम भी शामिल हैं।

 

अगर 2005 में हुई पिछली आर्थिक जनगणना से तुलना करें तो इन 8 साल में प्रतिष्ठानों की संख्या में 41.79 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पहले कुल प्रतिष्ठानों की संख्या 4.12 करोड़ थी जो बढ़कर 5.85 करोड़ हो गई। इसमें से 96 प्रतिशत प्रतिष्ठान प्राइवेट थे और सिर्फ 3.6 प्रतिशत संस्थान सरकार या सरकारी कंपनियों के अधीन थे। इनमें से 4.18 करोड़ यानी 71.74 प्रतिशत एक ही शख्स मालिक और कर्मचारी दोनों था यानी इनमें किसी भी दूसरे शख्स को काम पर नहीं रखा गया था। सिर्फ 1.65 करोड़ यानी 28.26 करोड़ प्रतिष्ठान ऐसे थे जिनमें कम से कम एक और शख्स को काम पर रखा गया।

कहां से चल रहे हैं ऐसे प्रतिष्ठान? 

इस जनगणना के मुताबिक, एक तिहाई से ज्यादा यानी 36.19 प्रतिष्ठान ऐसे थे जो घर से ही चल रहे थे। इसमें ज्यादातर छोटी दुकानें या अकेले चलाए जाने वाले कुटीर उद्योग हैं। उदाहरण के लिए- दर्जी या मोची का काम करने वाले लोगों का दुकानें। 18.44 प्रतिशत प्रतिष्ठान ऐसे थे जो घर से बाहर से तो चल रहे थे लेकिन उनकी कोई तय जगह या कोई तय बिल्डिंग नहीं थी। बाकी के 45.37 प्रतिशत प्रतिष्ठान घर से बाहर किसी तय दुकान या अन्य जगहों से चल रहे थे।

 

2013 से 2014 के बीच इन 5.85 करोड़ प्रतिष्ठानों में कुल 13.12 करोड़ लोगों ने काम किया। 2005 यानी पांचवी आर्थिक जनगणना की तुलना में देखें तो रोजगार में 38.13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।  

कहां से लाते हैं पैसे?

आर्थिक जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि इस तरह का काम करने वाले लोग या प्रतिष्ठान ज्यादातर पूंजी अपने घर से ही लगाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 85.88 प्रतिशत प्रतिष्ठानों में खुद की पूंजी लगाई गई। इसके अलावा, 6.78 प्रतिष्ठानों को दान या अन्य एजेंसियों से पैसा मिला। 3.81 प्रतिशत प्रतिष्ठानों के लिए लोगों ने अपने जानने वाले या अन्य लोगों से कर्ज लिया। 1.19 प्रतिशत लोगों को सरकारी एजेंसियों से पेसे मिले और सिर्फ 1.19 प्रतिशत लोगों को ही बैंकों से लोन मिला।

 

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