कामकाजी महिलाओं को प्रेगनेंसी और डिलीवरी के बाद अपनी फिजिलकल औप इमोशनल जरूरतों का ख्याल रखने के लिए मैटरनिटी लीव दी जाती है। मैटरनिटी लीव को लेकर भारतीय संसद ने भी नियम बनाए हैं और कई राज्यों ने भी इसको लेकर नियम बनाए हैं। मैटरनिटी लीव को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 21 अप्रैल को एक अहम फैसला दिया। कोर्ट ने अपने इस फैसले में कहा कि पहली बार मैटरनिटी लीव के दो साल के अंदर दोबारा मैटरनिटी लीव लेने से मना नहीं किया जा सकता। कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर मैनरनिटी लीव को लेकर फिर से चर्चा शुरू कर दी है। 

 

भारत में मैटरनिटी लीव को लेकर पहली बार 1961 में कानून बना। संसद ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 को पास किया और इसके बाद इस अधिनियम में कई बार परिवर्तन किए गए। 2017 में इस अधिनियम में संशोधन कर छुट्टी की अवधि 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई है। यह कानून पब्लिक और प्राइवेट दोनों सेक्टरों में लागू होता है। मैटरनिटी लीव के दौरान कंपनी कर्मचारी की सैलरी नहीं काट सकती और उसे पहले जैसा ही वेतन मिलता रहेगा। 

 

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कितनी छुट्टी मिलती हैं?

  • पहले दो बच्चों पर- 26 सप्ताह (डिलीवरी से पहले 8 सप्ताह समेत) 
  • दो बच्चों के बाद- 12 सप्ताह
  • गोद लेने पर- 12 सप्ताह ( गोद लेने के दिन से शुरू होती है)
  • गर्भपात या अन्य मेडिकल- 6 हफ्ते की लीव (मेडिकल प्रूफ के साथ)

किन-किन कंपनियों पर लागू होता है?

भारत में मैटरनिटी लीव कानून के तहत ज्यादा से ज्यादा कामकाजी महिलाओं को कवर करने की कोशिश की गई है। यह पॉलिसी प्राइवेट और सरकारी दोनों कर्मचारियों पर लागू होती है। इसमें कंपनियां, सरकारी ऑफिस, फैक्टरी और बागान शामिल हैं। हालांकि, इसको लेकर शर्त यह है कि कंपनी में 10 से ज्यादा कर्मचारी होने चाहिए। 

 

इस अधिनियम के तहत खुद का रोजगार कर रही महिलाओं को शामिल नहीं किया गया है। अगर कंपनी या संस्था में 10 से कम कर्मचारी हैं तो उसे भी इस अधिनियम के तहत कवर नहीं किया गया है। इसके साथ ही मैटरनिटी लीव के लिए महिला को डिलीवरी की अनुमानित तारीख से 12 महीनों के भीतर कम से कम 60 दिनों तक काम करना होगा। 

 

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सैलरी भी मिलेंगी और टर्मिनेशन भी नहीं

मैटरनिटी लीव अधिनियम के तहत भारत में महिला को नौकरी से निकालने पर रोक लगाता है। यानी मैटरनिटी लीव पर गई महिला को कंपनी काम से नहीं निकाल सकती। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि महिला की जॉब सिक्योर रहे। इसके साथ ही महिलाओं को मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट के अनुसार, भुगतान का अधिकार है। इसका मतलब है कि महिलाओं को मैटरनिटी लीव के दौरान पहले की तरह ही सैलरी मिलती रहेगी।