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'2 साल में दूसरी बार मैटरनिटी लीव', इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया अहम फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मैटरनिटी लीव से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए अहम फैसला दिया। कोर्ट ने संसद से बने कानून को किसी भी अन्य कानून से ऊपर माना और उसी के हिसाब से मैटरनिटी लीव देने का आदेश दिया।

Allahabad High Court

इलाहाबाद हाई कोर्ट, Photo Credit: PTI

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इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने मंगलवार 21 अप्रैल 2026 को मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश को लेकर एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने अपने इस फैसले में कहा कि पहली बार मैटरनिटी लीव के दो साल के अंदर दोबारा मैटरनिटी लीव लेने से मना नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की है जिसने मैटरनिटी लीव के लिए अप्लाई किया था लेकिन दो साल के राज्य सरकार के नियम का हवाला देकर उसे मैटरनिटी लीव देने से इंनकार कर दिया गया था। कोर्ट का यह फैसला मैटरनिटी लीव से जुड़े नियमों और कामकाजी के लिए काफी अहम माना जा रहा है। 


जस्टिस करुणेश सिंह पवार की बेंच ने मनीषा यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मनीषा यादव ने 4 अप्रैल 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके दूसरी बार लिये गये मातृत्व अवकाश की अर्जी को नामंजूर कर दिया गया था। अर्जी नामंजूर करने के पीछे वित्तीय हैंडबुक के नियमों को आधार माना गया था। कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत मिले अधिकार, वित्तीय हैंडबुक के प्रावधानों से ऊपर होते हैं। 

 

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मैटरनिटी लीव में दो साल के अंतर की दलील

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट,1961 एक कल्याणकारी कानून है और इसके प्रावधानों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हालांकि, राज्य सरकार ने वित्तीय हैंडबुक के नियम 153(1) का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि दो मातृत्व अवकाश अवधियों के बीच कम से कम दो साल का अंतर होना जरूरी है।

संसद और राज्य के कानून में टकराव

 कोर्ट ने पिछले निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट देश की संसद ने बनाया है और इसलिए यह किसी भी कार्यकारी निर्देश या वित्तीय हैंडबुक के प्रावधानों से ऊपर माना जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई विरोधाभास होता है, तो संसद की ओर से पास किए गए एक्ट के प्रावधान ही मान्य होंगे।

 

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मैटरनिटी लीव को मिली मंजूरी

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की पहली संतान साल 2021 में हुई थी और उसने 2022 में दूसरे मैटरनिटी लीव के लिए अर्जी दी थी, जिसे गलत आधारों पर खारिज कर दिया गया था। मनीषा यादव ने 2021 में मैटरनिटी लीव ली थी जब उन्हें पहला बच्चा हुआ था। इसके बाद उन्होंने जब दोबारा मैटरनिटी लीव के लिए अप्लाई किया तो उनकी मांग को दो साल के नियम का हवाला देकर रद्द कर दिया गया।

 

कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को छह अप्रैल 2026 से दो अक्टूबर 2026 तक मैटरनिटी लीव मंजूर करे। कोर्ट के इस फैसले को कामकाजी महिलाओं के लिए काफी अहम माना जा रहा है। 


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