लोकसभा में इन दिनों सदन की कार्यवाही के दौरान अक्सर हंगामा देखने को मिल रहा है। सरकार और विपक्ष के बीच अलग-अलग मुद्दों को लेकर लगातार बयानबाजी हो रही है, जिससे सदन का कामकाज ठीक से नहीं चल पा रहा है। इसी बीच कांग्रेस ने 10 फरवरी को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को उनके पद से हटाने के लिए एक नोटिस दिया है। इस नोटिस पर विपक्ष के 120 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें समाजवादी पार्टी और डीएमके जैसे बड़े दल भी शामिल हैं।

 

हालांकि, ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अभी तक इस मुद्दे पर अपना स्पष्ट रुख नहीं बताया है। विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के दौरान उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। कांग्रेस नेता मणिकम टैगोर का कहना है कि यह कदम मजबूरी में उठाना पड़ा है क्योंकि विपक्षी सांसदों को जनता से जुड़े मुद्दे उठाने का मौका नहीं दिया जा रहा।

 

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विवाद की असली वजह क्या है?

सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति की शुरुआत बजट सत्र के दौरान हुई, जब राहुल गांधी सदन में पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की किताब का जिक्र कर रहे थे। स्पीकर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया, जिसके बाद सदन में काफी हंगामा हुआ। विवाद तब और बढ़ गया जब स्पीकर ने कांग्रेस के 8 सांसदों को सस्पेंड कर दिया।

 

एक और बड़ा मुद्दा तब खड़ा हुआ जब 4 फरवरी को प्रधानमंत्री के भाषण से पहले स्पीकर ने कथित तौर पर सुरक्षा कारणों का हवाला दिया। राहुल गांधी ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री सच का सामना करने से डर रहे हैं, इसलिए वे सदन में नहीं आए।

नियम क्या कहता है? 

संविधान के अनुच्छेद 94 C के तहत लोकसभा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है लेकिन इसकी प्रक्रिया काफी सख्त है। सदन में प्रस्ताव लाने से कम से कम 14 दिन पहले इसकी सूचना देनी होती है। सदन में कम से कम 50 सांसदों का खड़े होकर इस प्रस्ताव का समर्थन करना जरूरी है तभी इस पर चर्चा हो सकती है। 

 

यह सारा बहुमत का खेल है क्योंकि स्पीकर को हटाने के लिए सदन के मौजूदा सदस्यों के बहुमत की जरूरत होती है। 

 

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क्या ओम बिरला की कुर्सी को खतरा है?

आंकड़ों को देखें तो यह प्रस्ताव गिरना लगभग तय माना जा रहा है। 543 सदस्यों वाली लोकसभा में बीजेपी और एनडीए के पास 293 सीटें हैं जबकि विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन के पास 238 सीटें हैं। बहुमत का आंकड़ा सरकार के पास है, इसलिए यह प्रस्ताव स्पीकर को हटाने से ज्यादा सरकार को घेरने और अपना विरोध दर्ज कराने का एक तरीका नजर आता है।

इतिहास में कब-कब हुआ ऐसा?

भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ है जब स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया हो। सबसे पहले 1954 में पहले लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया था। उसके बाद 1966 में सरदार हुकम सिंह के खिलाफ और बाद में 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ। दिलचस्प बात यह है कि अब तक इनमें से कोई भी प्रस्ताव सफल नहीं हो पाया है।