सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (3 फरवरी) को व्हाट्सऐप और उसकी पेरेंट कंपनी मेटा की प्राइवेसी पॉलिसी पर तीखी बहस हुई। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने कड़े शब्दों में कहा कि अगर कंपनियां भारतीय संविधान के नियमों का पालन नहीं कर सकतीं, तो उन्हें भारत छोड़कर चले जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक की प्राइवेसी के साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा।

 

केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि व्हाट्सऐप की पॉलिसी एक तरह का 'शोषण' है। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी न केवल लोगों का डेटा शेयर कर रही है, बल्कि उसका इस्तेमाल व्यावसायिक मुनाफे के लिए भी कर रही है।

 

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CJI ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस ने व्हाट्सऐप की पॉलिसी को 'बेहद चालाकी से तैयार किया गया दस्तावेज' बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सड़क किनारे सामान बेचने वाला वेंडर या बिहार के किसी गांव में रहने वाला व्यक्ति आपकी इन पेचीदा शर्तों को समझ पाएगा? CJI ने कहा, 'कभी-कभी हमें खुद आपकी भाषा समझने में इतनी दिक्कत होती है, तो एक साधारण सा ग्रामीण इसे कैसे समझेगा?'

'दवा पूछते ही आ जाते हैं विज्ञापन'

सुनवाई के दौरान CJI ने अपना निजी अनुभव शेयर करते हुए डेटा शेयरिंग पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अगर डॉक्टर व्हाट्सऐप पर तीन दवाओं के नाम लिखता है, तो अगले पांच मिनट में फोन पर उसी दवा से जुड़े विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि कंपनियों को लोगों के डिजिटल फुटप्रिंट का इस्तेमाल विज्ञापन के लिए नहीं करना चाहिए।

 

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मामला क्या है?

यह पूरा विवाद भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा लगाए गए 213 रुपये करोड़ के जुर्माने से शुरू हुआ था। CCI का कहना था कि व्हाट्सऐप ने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल किया और यूजर्स को नई पॉलिसी मानने के लिए मजबूर किया। हालांकि, कंपनी का तर्क है कि उसकी पॉलिसी दूसरे देशों के नियमों के हिसाब से ही है।

 

अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी पक्षों को नोटिस जारी किया है। इस केस की अगली सुनवाई अब तीन जजों की बेंच करेगी।