भारतीय दुनियाभर में सबसे ज्यादा चाय पीने हैं। घरों से लेकर चौक, चौराहों, होटल और ऑफिसों में आपको चाय पीने के दीवाने मिल जाएंगे। मगर, इन सबके बरअक्स चाय लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी और आजीवीका का साधन है। भारत में अकेले इतनी चाय पी जाती है कि सिर्फ घरेलु मांग से इसकी पूर्ति नहीं होती। ऐसे में पिछले कुछ समय से बाहर के देशों से सस्ती और कम गुणवत्ता वाली चाय भारत में आयात की जा रही है। विदेशों से चाय आयात करना बुरा नहीं है लेकिन इससे भारतीय चाय किसानों और चाय उद्योग को काफी नुकसान हो रहा है। इसी समस्या को देखते हुए विणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले टी बोर्ड ऑफ इंडिया ने एक बड़ा फैसला लिया है। अपने फैसले में बोर्ड ने बाहर से आयात होने वाली चाय के लिए कई नियम बनाए हैं।
टी बोर्ड ऑफ इंडिया ने पिछले दिनों एक निर्देश में कहा है कि 1 मई 2026 से भारत में आने वाली हर चाय की खेप की जांच करना जरूरी होगा। इसका मतलब यह है कि जो भी चाय विदेश से भारत आएगी, पहले उसकी गुणवत्ता की जांच की जाएगी। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि खराब या मिलावटी चाय भारत में ना बिके। टी बोर्ड ने इस बारे में एक नियम और प्रक्रिया (SOP) भी जारी की है।
10 फरवरी के जारी हुआ निर्देश
टी बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन सी. मुरुगन ने 10 फरवरी के एक निर्देश जारी किया। इसमें उन्होंने कहा, 'चाय (डिस्ट्रीब्यूशन एंड एक्सपोर्ट) कंट्रोल ऑर्डर, 2005 के पैराग्राफ 34 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल करते हुए यह निर्देश दिया जाता है कि 1 मई 2026 से चाय के सभी आयात खेप की क्वालिटी पक्का करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अनुसार जरूरी तौर पर टेस्ट किया जाएगा।'
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दरअसल, 2013 में चाय के आयात के लिए एक ऑनलाइन जरूरी चेकिंग सिस्टम शुरू हुआ था, जिसके तहत बोर्ड चाय के सैंपल टेस्ट करता था और हर आवेदक को ऑनलाइन क्लियरेंस सर्टिफिकेट जारी किया जाता था। हालांकि, संसद की स्टैंडिंग कमिटी ने 12 अगस्त 2025 की अपनी 194वीं रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि बढ़ते आयात और मिलावट के खतरों को देखते हुए, ज्यादा कड़ी मॉनिटरिंग की जरूरत है।
फैसला जरूरी क्यों हुआ यह?
भारतीय चाय उद्योग लंबे समय से यह शिकायत कर रहा था कि नेपाल, केन्या और अफ्रीका के कुछ देशों से बहुत सस्ती और घटिया चाय भारत लाई जा रही है। यह चाय बिना टैक्स के आती है और बहुत कम दाम में बिकती है। इससे भारतीय किसानों को उनकी चाय का सही दाम नहीं मिल पाता और उन्हें आर्थिक परेशानी होती है। खासकर छोटे चाय किसान इससे बहुत ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। भारत हर साल नेपाल और श्रीलंका के अलावा दूसरे देशों से 25 से 30 मिलियन किलो चाय आयात करता है।
इससे पहले काफी समय तक दार्जिलिंग टी एसोसिएशन ने इस बात पर हैरानी जताई थी कि सस्ती और खराब नेपाली चाय को सरकारी संस्था फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) जांच के बिना चाय आयात करने की इजाजत कैसे दे रही है? FSSAI केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एक कानूनी संस्था है। यह खाने की चीजों की क्वालिटी को रेगुलेट करती है।
आयात करने वालों के लिए नए नियम
दार्जिलिंग टी एसोसिएशन के एक अधिकारी के मुताबिक, 'नेपाल से आने वाली घटिया क्वालिटी की सस्ती ड्यूटी-फ्री डंपिंग और FSSAI का पालन न करने वाली चाय ने दार्जिलिंग चाय इंडस्ट्री को ICU के मरीज में बदल दिया है।' ऐसा ही विरोध कई और टी एसोसिएशन ने भी किया है। टी बोर्ड ने बताया कि जो भी व्यक्ति या कंपनी चाय आयात करना चाहती है, उसे टी बोर्ड के पास पंजीकृत होना जरूरी है। आयातक को चाय आने की तारीख, चाय रखने का गोदाम, कंटेनरों की संख्या और बिल की जानकारी टी काउंसिल पोर्टल पर देनी होगी। इसके साथ ही चाय की कीमत, भाड़ा और बीमा का पूरा ब्योरा भी देना होगा

टी बोर्ड के अधिकारी सेफ्टी कंप्लायंस की जांच के लिए मान्यता प्राप्त लैब में टेस्टिंग के लिए सैंपल लेंगे। आयात की गई चाय को अलग से स्टोर किया जाना चाहिए और फाइनल क्लियरेंस मिलने तक उसे बेचा या दोबारा निर्यात नहीं किया जा सकता।
सैंपल स्टैंडर्ड्स पर खरा नहीं उतरने पर...
अगर कोई सैंपल स्टैंडर्ड्स पर खरा नहीं उतरता है, तो निर्यातक रिजर्व सैंपल टेस्टिंग के लिए कह सकता है। हालांकि, दोनों में से कोई भी फेल होने पर उसे टी (वेस्ट) कंट्रोल ऑर्डर, 1959 के तहत चाय के कचरे के तौर पर खत्म कर दिया जाएगा। निर्यातक के लिए आयात की गई चाय को छह महीने के अंदर दोबारा निर्यात करना होगा। साथ ही इसके बारे में भारतीय चाय के साथ ब्लेंड्स को पैकेजिंग और दस्तावेजों पर साफ-साफ बताना होगा। दार्जिलिंग के एक चाय बागान मालिकों का कहना है कि अगर नियम को अच्छी तरह से लागू किया जाए तो यह स्वागत योग्य कदम है।
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चुनावी मौसम में ऐसी कवायद क्यों?
सरकार का यह कदम ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन दोनों ही राज्यों में बड़ी मात्रा में चाय के बागान हैं और इन बागानों में लाखों की संख्या में लोगों की आजिवीका जुड़ी हुई है।
दरअसल, असम में चाय की राजनीति काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि चाय बागान मजदूर जिन्हें असम में 'टी ट्राइब्स' या चाय जनजाति कहा जाता है, राज्य की आबादी का लगभग 17-20% हिस्सा हैं। यह आबादी असम में बड़ा वोट बैंक है। यह समुदाय मुख्य रूप से ऊपरी असम के जिलों में रहते हैं। राजनीतिक दलों के लिए इन मजदूरों का समर्थन जीतना चुनावी सफलता की कुंजी है। ऐसे में सरकार का नया नियम के लागू होने के बाद चाय बागान मालिकों को अलग मुनाफा होता है तो सामाजिक रूप से हाशिए पर मजदूर अपनी मजदूरी वृद्धि बढ़ाने की मांग कर सकते हैं।
पहले चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों पर कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी लेकिन हाल के वर्षों में बीजेपी ने इस वर्ग को अपने पाले में किया है। यह वर्ग वर्तामान में बीजेपी का मजबूत आधार है। असम की 126 विधानसभा सीटों में से चाय उद्योग और चाय मजदूर लगभग 40 सीटों पर निर्णायक प्रभाव डालते हैं। यहां इनकी आबादी चुनाव परिणाम तय कर सकती है।
