पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। एक तरफ पार्टी का लगातार जनाधार खिसक रहा है, दूसरी तरफ, कई पुराने सहयोगी, कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से हिचक रहे हैं। बिहार में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) गठबंधन में संभावित दरार के बीच अब एक और मोर्चे पर कांग्रेस को झटका लग सकता है। पश्चिम बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़ सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी चुनाव की तैयारियों में अभी से जुट गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पश्चिम बंगाल का दौरा कर चुके हैं, अमित शाह भी जा चुके हैं। ममता बनर्जी, फ्रंट फुट पर चुनावी मैदान में उतर गईं हैं, कांग्रेस और वाम दलों के बीच अभी मंथन ही चल रहा है।

पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव अब नजदीक हैं। मार्च से अप्रैल 2026 के बीच चुनाव कराए जा सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच साल 2021 से ही चुनावी मुकाबले हो रहे हैं। लोकसभा चुनावों में भी टीएमसी और बीजेपी के बीच ही मुख्य लड़ाई है। कांग्रेस का प्रतिनिधित्व साल 2011 के बाद से ही लगातार कम हो रहा है। 

 

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पश्चिम बंगाल में गठबंधन की मजबूरी क्या है?

बीजेपी और टीएमसी की सीधी जंग में, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) और कांग्रेस दोनों कमजोर हो रहीं हैं। गठबंधन करने और न करने की अटकलें भी खूब लग रहीं हैं। CPI (M) की केंद्रीय समिति ने जनवरी 2026 में तिरुवनंतपुरम में एक बैठक की थी। दोनों दलों ने कहा था कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी और बीजेपी दोनों को हराने के लिए वे कांग्रेस के साथ चुनावी समझौता कर सकते हैं। अलग बात है कि न तो कांग्रेस, न तो वाम दल, दोनों कोई भी गठबंधन की कवायद शुरू नहीं कर रहे हैं, जबकि चुनाव में 3 महीने से भी कम वक्त बचा है। 

लेफ्ट-कांग्रेस का साथ आना, दोनों के लिए जरूरी क्यों?

ममता बनर्जी का कैडर बेस पश्चिम बंगाल में बहुत मजबूत है। बीजेपी ने साल 2016 की तुलना में अप्रत्याशित बढ़त पश्चिम बंगाल में हासिल की है। विपक्षी वोट तभी नहीं बिखरेगा, जब लेफ्ट और कांग्रेस दोनों मिलकर, बीजेपी और टीएमसी को चुनौती दें। पश्चिम बंगाल में कुछ नेताओं की दलील है कि लेफ्ट के सारे मोर्चे और कांग्रेस को एक होना चाहिए। अभी तक, यह साफ नहीं है कि कांग्रेस और लेफ्ट का पश्चिम बंगाल में कोई गठबंधन होगा। कांग्रेस अभी तक इस गठबंधन पर हां  नहीं कह रही है।  


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किस हाल में है पश्चिम बंगाल में कांग्रेस? चुनावों से समझिए 

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का हाल क्या है?

  • लोकसभा 2014: कांग्रेस पार्टी को अकेले चुनाव लड़ना पड़ा। कांग्रेस ने सभी 42 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की। टीएमसी को 34 सीटें मिलीं, सीपीएम और बीजेपी को 2-2 सीटें हासिल हुईं। 
  • 2019 लोकसभा चुनाव: कांग्रेस, बीजेपी, लेफ्ट और टीएमसी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। तृणमूल कांग्रेस ने 22 सीटें जीत लीं। बीजेपी ने अप्रत्याशित तौर पर 2 सीटों से 18 सीटों पर जीत हासिल की। ममता बनर्जी का जनाधार घट गया। कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें हासिल हुईं। लेफ्ट का खाता नहीं खुला। 
  • 2024 लोकसभा चुनाव: तृणमूल कांग्रेस ने सभी 42 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। 29 सीटें आईं। बीजेपी को सिर्फ 12 सीटें हासिल हुईं। कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीत पाई, अधीर रंजन चौधरी तक अपनी सीट नहीं बचा पाए। 

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का हाल क्या है?

पश्चिम बंगाल में न तो लोकसभा, न ही विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के अच्छे दिन आए हैं। साल2011, 2016, 202 में वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) के साथ कांग्रेस का गठबंधन कोई कमाल नहीं कर पाया। सभी चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी गठबंधन बुरी तरह हारे। 

  • विधानसभा चुनाव 2011: कांग्रेस और टीएमसी ने गठबंधन में साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। टीएमसी की 184 सीटें आईं थीं। कांग्रेस ने 42 सीटों पर जीत हासिल की थी। सीपीएम ने 40 सीटें जीत ली थीं। ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने 11 सीटें जीती थीं, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को 7 सीटें मिलीं। दो निर्दलीय और 8 अन्य प्रत्याशी जीते। पश्चिम बंगाल में वाम शासन का अंत हो गया। 

  • ​विधानसभा 2016: कांग्रेस ने लेफ्ट फ्रंट के साथ गठबंधन किया था। 92 सीटों पर लड़ी और 44 सीटें जीतीं। TMC को 211 सीटें, लेफ्ट को कुल 32। इस चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 3 सीटें मिलीं थीं लेकिन 3 साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में बीजेपी को जमकर प्रचार करने की छूट मिली। 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजे, पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए भी चौंकाने वाले रहे। 

  • विधानसभा 2021: कांग्रेस ने संयुक्त मोर्चा की अगुवाई में लेफ्ट फ्रंट  और इंडियन सेक्युलर फ्रंट के साथ लड़ी। पार्टी ने 92 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन एक सीट नहीं जीत पाई।  TMC को 213 सीटें मिलीं, BJP को 77। पश्चिम बंगाल में गठबंधन के साथ भी और बिना भी कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ। 

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गठबंधन के बाद भी क्या हासिल हुआ?

साल 2021 में लेफ्ट और कांग्रेस का गठबंधन था। दोनों पार्टियां मिलकर एक भी सीट नहीं जीत पाईं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस प्रमुख सुभंकर सरकार का भी मानना है कि अकेले लड़ना बेहतर है, जिससे पार्टी मजबूत स्थिति में आए। पूर्व अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी भी यही वकालत करते रहे हैं। एक तथ्य यह भी है कि अगल दोनों दल अलग-अलग लड़े तो दो मजबूत पार्टियों के सामने वोटों का बिखराव और ज्यादा होगा, बीजेपी को फायदा हो सकता है। टीएमसी किसी से हाथ मिलाने के मूड में नहीं हैं, प्रचंड बहुमत से ममता बनर्जी जीत रहीं हैं।

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कांग्रेस को लेफ्ट के साथ जाने में दिक्कत क्या है? 

केरल में अप्रैल-मई 2026 में विधानसभा चुनाव होंगे। इसी वक्त में पश्चिम बंगाल में भी चुनाव होंगे। केरल में सीपीआई(एम) की LDF सरकार है और कांग्रेस की UDF विपक्ष में। दोनों सीधे एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। अगर बंगाल में गठबंधन हुआ तो केरल में इसका असर पड़ सकता है। दोनों दल, एक-दूसरे पर सियासी हमला भी बोलेंगे, बीजेपी और दूसरी विपक्षी पार्टियों को एक मुद्दा भी मिल जाएगा।