असम की 126 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी, असम में घुसपैठियों के दमन और हिंदुत्व की राजनीति पर आगे बढ़ रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस अल्पसंख्यक वोटों की लामबंदी में लगी है। भारतीय जनता पार्टी के पास अभी स्पष्ट बहुमत है, दूसरी तरफ कांग्रेस चुनावों से पहले ही गठबंधन की तलाश में जुटी है। कांग्रेस गठबंधन का सबसे मजबूत साथी, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) अब सबसे बड़ा सियासी दुश्मन है। असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने कहा है कि AIUDF की  वजह से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होता है। साल 2021 में दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, अब दोनों की राहें अलग-अलग हो गई हैं। 

विधानसभा में बीजेपी, कांग्रेस से दो गुनी ज्यादा सीटों पर काबिज है, वहीं लोकसभा में 3 गुनी। विधानसभा में कांग्रेस 29 सीटों पर है, बीजेपी 60 सीटों पर। लोकसभा में कांग्रेस के पास सिर्फ 3 सीटें हैं, बीजेपी के पास 9 सीटों पर। ऐसे में बीजेपी के हिंदुत्व के आगे, कांग्रेस के पास अल्पसंख्यक वोटों के एकीकरण का ही विकल्प है। कांग्रेस AIUDF को नाराज कर, अपना नुकसान कराती नजर आ रही है। कांग्रेस अब अल्पसंख्यकों की कोर पार्टी रही नहीं है, जबकि AIUDF और ऑल इंडिया इत्तेहादुल मजलिस-ए-मुस्लिमीन (AIMIM) अल्पसंख्यकों की कोर पार्टी कहलाती हैं। 

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कांग्रेस गठबंधन के समीकरण क्या हैं?

कांग्रेस ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), रायजोर दल, असम जातीय परिषद, सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी), जातीय दल असम और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन का प्लान बनाया है। कांग्रेस की नजर जनजातीय वोट बैंक के साथ-साथ अल्पसंख्यक वोटरों को भी साधने में है। अकेले कांग्रेस की स्थिति असम में खराब है। असम में साल 2016 के बाद से कभी सत्ता में नहीं आई। 2021 के चुनाव में भी करारी हार हुई थी। कंग्रेस हर संभव गठबंधन की तरफ आशा से देख रही है।  

कांग्रेस के सामने चुनौती क्या है?

कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) है। AIUDF साथ गठबंधन न करने के फैसले का सबसे बड़ा असर अल्पसंख्यक वोटों का बिखराव है। कांग्रेस भी मौजूदा सरकार पर अल्पसंख्यक उत्पीड़न के आरोप लगा रही है, कांग्रेस का कहना है कि असम सरकार, असम के वैध मुसलमान नागरिकों को भी घुसपैठिया कहकर बाहर निकाल रही है। वहीं AIUDF के नेता बदरुद्दीन अजमल का कहना है कि असम के जिन इलाकों में बुलडोजर चला है, वहां कांग्रेस खामोश रही है। 

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कितने सीटों पर उतरना चाह रही है कांग्रेस?

कांग्रेस 126 सीटों में से 100 से ज्यादा सीटों पर उतरना चाहती है। गठबंधन के दूसरे साथियों को कांग्रेस 26 से कम सीटों पर सिमटाना चाहती है। अगर AIUDF के साथ कांग्रेस उतरती तो ज्यादा सीटें देनी पड़ सकती थी। कांग्रेस, अब रायजोर दल, असम जातीय परिषद, CPI और CPM से गठबंधन करेगी। कांग्रेस का मानना है कि AIUDF से गठबंधन करने से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होता है और BJP को फायदा पहुंचता है। 

 AIUDF और कांग्रेस के बीच मन-मुटाव क्यों है?

गौरव गोगोई को बदरुद्दीन अजमल की अध्यक्षता वाली पार्टी  AIUDF अब सांप्रदायिक लगने लगी है। साल 2021 में दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन नतीजे बीजेपी के पक्ष में ही गए थे। दिसंबर 2025 तक दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते और तल्ख हो गए। गौरव गोगोई ने कहा कि AIUDF एक सांप्रदायिक पार्टी है और कांग्रेस इसका साथ कोई गठबंधन नहीं करेगी। 

गौरव गोई ने एलान किया कि कांग्रेस 126 में से 100 सीटों पर खुद लड़ेगी और बाकी सीटें अन्य सहयोगी दलों को देंगी। AIUDF को बाहर रखा जाएगा। उनका एक बयान बेहद सुर्खियों में रहा- 

गौरव गोगोई, कांग्रेस अध्यक्ष, असम:-
बदरुद्दीन अजमल हिमंत बिस्वा शर्मा की लाइफलाइन हैं। जब भी हिमंत को जरूरत पड़ती है, वे 108 नंबर डायल कर लेते हैं। इस बार अजमल अकेले काफी नहीं होंगे, इसलिए हिमंत असदुद्दीन ओवैसी को भी बुला रहे हैं। 

AIUDF-AIMIM को बीजेपी की बीम टीम क्यों बता रही है कांग्रेस?

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा हिंदुत्व के पोस्टबॉय बन चुके हैं। बीजेपी उन्हें कई अहम जिम्मेदारियां राष्ट्रीय स्तर पर दे रही है। विधानसभा चुनाव कहीं भी हो, उन्हें बीजेपी स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शुमार करती है। वह हिंदुत्व की बात करते हैं, बदरुद्दीन अजमल और असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम राजनीति के बड़े चेहरे हैं। कांग्रेस का कहना है कि इनकी राजनीति का फायदा बीजेपी को मिलता है। दोनों मुस्लिम ध्रुवीकरण करते हैं, बीजेपी के पक्ष में हिंदू एक हो जाते हैं। 

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असम में कितनी मजबूत है AIUDF?

असम में मुस्लिमों की संख्या करीब 34 फीसदी है।  ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF), पश्चिम बंगाल में बांग्ला भाषी मुसलमानों की चर्चित पार्टी है। राज्य में यह पार्टी, मजबूत स्थिति में है। साल 2006 में AIUDF के पास 10 विधानसभा सीटें थीं, 2011 तक यह पार्टी 18 सीटों पर आ गई। 2016 में 13 सीटों पर कामयाबी मिली फिर 2021 में 16 सीटों पर जीत मिली। 

असम में AIUDF मजबूत फैक्टर है, जिससे कांग्रेस गठबंधन करने से बच रही है। किसी जमाने में कांग्रेस का कोर वोटबैंक रहे अल्पसंख्यक मतदाता, अब AIUDF के साथ हैं। अब इसकी वजह से असम में कांग्रेस का जनाधार काफी गिर गया है। अलग बात है कि साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। लगातार 3 बार से चुनाव जीतने वाले बदरुद्दीन अजमल, खुद अपनी सीट गंवा बैठे। 

असम में कांग्रेस कितनी मजबूत है?

साल 2021 में AIUDF के साथ गठबंधन करने वाली कांग्रेस, अब उनकी सियासती दुश्मन है। 2016 में कांग्रेस ने पहली बार सत्ता गंवाई थी। बीजेपी के नेतृत्व में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायकंस (NDA) ने साल 2021 में 75 सीटों जीती थीं। मुख्यमंत्री बीजेपी के ही रहे। कांग्रेस का हाल बुरा रहा। कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को सिर्फ 50 सीटें मिल पाईं। साल 2016 में कांग्रेस वैसे तो 26 सीटों पर थी लेकिन इसे बड़ी बढ़त मानी गई थी। 

अभी कहां खड़ी है कांग्रेस?

असम में 14 लोकसभा सीटें और 126 विधानसभा सीटें हैं। साल 2024 के चुनाव में यहां बीजेपी ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की, कांग्रेस मुश्किल से 3 सीट जीत पाई। असम गण परिषद और यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल ने 1-1 सीटें जीती हैं। असम में बीजेपी के पास सबसे ज्यादा 60 सीटें हैं, कांग्रेस के पास 29 सीटें हैं। AIUDF के पास 16, असम गण परिषद के पास 9 सीटें, यूपीपीएल के पास 6 सीटें और एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई है। 5 अन्य दलों की सीटें हैं। दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी विधानसभा में दोगुनी, लोकसभा में 3 गुनी ज्यादा सीटें हैं।