असम में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और हर पार्टी विधानसभा चुनावों की तैयारी में लगी है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बड़े नेता दिल्ली से असम के दौरे कर रहे हैं लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच जंग होना तय है। जानकारों की मानें तो बीजेपी राज्यसभा की जंग में विपक्ष पर भारी पड़ सकती है। असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ऐलान कर चुके हैं कि बीजेपी तीनों सीटों पर चुनाव जीतेगी। वहीं, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल कम से कम एक सीट पर तो टक्कर देने की कोशिश करेंगे। 

 

चुनाव आयोग ने देशभर से 37 राज्यसभा सीटों पर चुनावों की घोषणा की है। असम में भी तीन राज्सभा की सीटें खाली हो रही हैं। बीजेपी के भुवनेश्वर कलिता और रामेश्वर तेली, और विपक्ष के समर्थन वाले अजीत कुमार भुइयां का कार्यकाल खत्म हो रहा है। ऐसे में अब इन तीन सीटों के लिए बीजेपी और विपक्ष के बीच टक्कर देखने को मिलेगी। अभी तक किसी भी पार्टी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन पांच मार्च से पहले सभी उम्मीदवारों को नामांकन करना होगा। 

 

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सीटों का गणित समझिए

राज्यसभा चुनावों में विधायक वोट करते हैं यानी जिस पार्टी के जितने ज्यादा विधायक उसकी जीत के उतने ज्यादा चांस। बीजेपी असम में सरकार चला रही है और उसके पास 64 विधायक हैं। उसके सहयोगी दलों में एजीपी के पास 9 और यूपीपीएल के पास 7 और बीपीएफ के पास 3 विधायक हैं। कुल मिलातक सत्ताधआरी गठबंधन के पास 83 विधायकों का समर्थन है। 

विपक्ष की बात करें तो कांग्रेस के पास 26 विधायक हैं और AIUDF के पास 15 विधायक हैं। सीपीआईएम का एक विधायक कांग्रेस का साथ दे सकता है। इसके अलावा विधानसभा में एक निर्दलीय विधायक भी मौजूद है। 

बीजेपी की दो सीटें पक्की

राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए एक उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 33 वोट चाहिए। ऐसे में सत्ताधारी गठबंधन आराम से 2 सीटें जीत सकता है लेकिन तीसरी सीट पर विपक्ष टक्कर दे सकता है। कांग्रेस भी इतनी आसानी से बीजेपी को तीसरी सीट जीतने नहीं दे सकती है। कांग्रेस के लिए तीनों सीटों पर हार से आने वाले विधानसभा चुनाव में गलत मैसेज जाएगी और पार्टी ऐसा कभी नहीं चाहेगी। 

सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने किया तीनों सीट जीतने का दावा

कुछ दिन पहले असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा था कि असम की तीनों राज्यसभा सीटों पर बीजेपी, असम गण परिषद और एनडीए मिलकर उम्मीदवार खड़ा करेंगे। सीएम ने कहा कि दो सीटों पर हमारी जीत पक्की है और तीसरी सीट भी हम जीत सकते हैं। हालांकि, हिमंत बिस्वा सरमा ने इस बात को भी माना की तीसरी सीट पर टक्कर है। 

मुश्किल में कांग्रेस

कांग्रेस किसी भी कीमत पर बीजेपी को तीसरी सीट पर जीत दर्ज करने से रोकने की कोशिश करेगी लेकिन ऐसा करने के लिए कांग्रेस एक अलग मुश्किल में फंस सकती है। कांग्रेस के पास कुल 26 विधायक हैं और एक विधायक सीपीएमआई का मिलाकर भी कुल संख्या 27 होती है। पार्टी को कम से कम 6 और विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। AIUDF के पास वह नंबर हैं जो कांग्रेस को चाहिए लेकिन AIUDF के 15 विधायकों के समर्थन के लिए कांग्रेस को संघर्ष करना पड़ सकता है। AIUDF और कांग्रेस असम में एक दूसरे के विरोधी हैं ऐसे में दोनों का साथ आना और वह भी विधानसभा चुनाव से पहले, बहुत मुश्किल है। दोनों पार्टियों के नेताओं की जुबानी जंग को देखते हुए इसके चांस और भी कम हो जाते हैं। 

 

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असम में प्रियंका गांधी वाड्रा

अगर कांग्रेस किसी तरह AIUDF का समर्थन हासिल कर भी लेती है और राज्यसभा सीट जीत भी जाती है तो पार्टी एक नई मुश्किल में फंस सकती है। असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा लगातार कांग्रेस पर मुस्लिम पार्टी होने का टैग लगा रहे हैं। कांग्रेस को हिंदू विरोधी बताकर हिमंता अपनी पार्टी की जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं। ऐसे में कट्टर इस्लामिक पार्टी AIUDF के साथ जाने से कांग्रेस पर बीजेपी का अटैक और तेज हो जाएगा। पार्टी पर मुस्लिम पार्टी होने का टैग लग सकता है। 

कांग्रेस के लिए यह प्लान काम करेगा

कांग्रेस की स्थिति आगे कुंआ और पीछे खाई वाली हो गई है। अगर AIUDF का समर्थन नहीं मिला तो राज्यसभा में हार और अगर समर्थन मिला तो बीजेपी से हमला तेज होगा और विधानसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान हो सकता है। ऐसे में अब कांग्रेस असमंजस की स्थिति में है। 2022 के राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय सांसद अजीत भुइयां ने जीत दर्ज की थी। बीजेपी और एनडीए ने अजीत के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा था लेकिन अब बीजेपी उम्मीदवार उतारने का मन बना चुकी है। कांग्रेस पार्टी भी 2022 वाली इसी रणनीति पर काम कर सकती है। पार्टी किसी निर्दलीय व्यक्ति को उम्मीदवार बना सकती है, जिसे कांग्रेस और AIUDF दोनों समर्थन करें। ऐसे में पार्टी अपने किसी नेता को राज्यसभा तो नहीं भेज पाएगी लेकिन बीजेपी को तीसरी सीट जीतने से रोक सकती है और AIUDF के साथ जाकर सांप्रदायिकता के टैग से भी बच सकती है।