ममता बनर्जी लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ एक मुखर आवाज के रूप में रही हैं। किसी मुद्दे पर मोदी सरकार की नीतियों का विरोध हो या फिर जमीन पर बीजेपी के खिलाफ लड़ना हो, ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस सबसे मुखर आवाज थी। इसकी वजह थी कि पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज टीएमसी लोकसभा और राज्यसभा में भी मजबूत रही। अब बंगाल में हार के बाद TMC के सामने बड़ा संकट आने वाला है। अब तक सत्ता के सहारे चल रही TMC के सामने लगभग डेढ़ दशक के बाद ऐसी चुनौती है जो उस पर काफी भारी पड़ने वाली है। अब कुछ साल में राज्यसभा में भी टीएमसी के सांसदों की संख्या कम होने वाली है, ऐसे में दिल्ली भी टीएमसी की आवाज कमजोर पड़ सकती है।

 

बंगाल का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं है बल्कि यह उस राजनीतिक व्यवस्था में दरार को दर्शाता है जिसे ममता बनर्जी ने पिछले डेढ़ दशक में खड़ा किया था। इस चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अब तक की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। साल 2011 से राज्य की राजनीति की मुख्य धुरी बनी तृणमूल कांग्रेस के लिए यह हार महज चुनावी नहीं उसके एजेंडा की भी हार है। बीजेपी ने उस व्यवस्था में निर्णायक सेंध लगाई है, जो केंद्रीकृत नेतृत्व, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत संगठनात्मक ढांचे पर आधारित थी।

 

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इस बारे में राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, 'तृणमूल का मॉडल सत्ता तक पहुंच पर आधारित था। जैसे ही यह धुरी बदलती है, पूरी संरचना को फिर से गढ़ना पड़ता है।' आंकड़े इस बदलाव की गहराई को दर्शाते हैं। बीजेपी का वोट शेयर 2021 के 38 प्रतिशत से बढ़कर करीब 44.8 प्रतिशत हो गया है, जो उसके आधार के विस्तार और मजबूती दोनों को दिखाता है। वहीं, TMC का वोट शेयर 48 प्रतिशत से घटकर लगभग 41.7 प्रतिशत रह गया, जो उसके सामाजिक आधार में लगातार हो रहे नुकसान को दर्शाता है, खासकर अर्ध-शहरी क्षेत्रों में।

TMC के गढ़ में लगाई गई सेंध

एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि 177 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या पिछली जीत के अंतर से अधिक थी। इन सीटों पर बीजेपी ने न केवल अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी, बल्कि तृणमूल के गढ़ों में भी जबरदस्त सेंध लगाई। एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, 'यह पारंपरिक अर्थों में लहर नहीं है, बल्कि राजनीतिक जमीन का रीडिस्ट्रीब्यूशन है। बीजेपी अब चुनौती देने वाली से व्यवस्था बदलने वाली ताकत बन गई है।' तृणमूल की सबसे बड़ी ताकत रहा केंद्रीकरण ही अब उसकी प्रमुख कमजोरी के रूप में उभरा है। 

 

शीर्ष नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भरता के कारण जब यह परत कमजोर होती है, तो पार्टी के पास संस्थागत सुरक्षा तंत्र सीमित रह जाता है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी (AAP) के उलट अन्य राज्यों में विस्तार न कर पाने के कारण तृणमूल का आधार लगभग पूरी तरह बंगाल तक सीमित रहा है, जिससे इस हार का प्रभाव और गहरा हो गया है। पार्टी के भीतर इसके असर तत्काल और संभावित रूप से अस्थिर करने वाले हो सकते हैं। प्रशासनिक नियंत्रण, संरक्षण तंत्र और चुनावी वर्चस्व पर आधारित संगठन को अब इन साधनों के बिना खुद को संभालने की चुनौती है। वैचारिक एकजुटता की कमी के बीच कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के दल बदलने की आशंका भी जताई जा रही है। यह स्थिति तृणमूल के लिए अस्तित्व के संकट जैसी हो सकती है।

 

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ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की निर्णायक लड़ाइयों में से एक माना जा रहा था। तीन कार्यकाल और लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद यह मुकाबला केवल सरकार बचाने का नहीं, बल्कि उनके बनाए राजनीतिक ढांचे को बचाने का भी था। 71 सालकी  की उम्र में और तीन कार्यकाल पूरे करने के बाद ममता की वापसी की राह पहले से अधिक कठिन नजर आती है। हालांकि, सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों से उभरने की उनकी क्षमता पहले देखी जा चुकी है लेकिन इस बार चुनौती का पैमाना अलग है, जहां समय, संगठनात्मक कमजोरी और मजबूत प्रतिद्वंद्वी एक साथ मौजूद हैं।

 

बिना सत्ता कैसे चलेगा काम?

फिर भी, ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर अक्सर संघर्ष की राजनीति से मजबूत हुआ है। सत्ता से बाहर होने पर वह पार्टी को फिर से विपक्षी ताकत के रूप में ढालने की कोशिश कर सकती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके असर दिखाई देंगे। बंगाल में हार से विपक्षी गठबंधन में उनकी तत्काल प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है। हालांकि, उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता पूरी तरह खत्म नहीं होती।</p><p>आने वाले समय में अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर भी नजर रहेगी, जिनकी संगठनात्मक जिम्मेदारी बढ़ सकती है। हालांकि, बिना सत्ता के सहारे आंतरिक चुनौतियों को संभालना आसान नहीं होगा।

 

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तृणमूल की हार के मूल में सत्ता विरोधी लहर का बढ़ता प्रभाव भी रहा। भ्रष्टाचार के आरोप, भर्ती घोटाले और विपक्ष की संगठित रणनीति ने पार्टी की स्थिति को कमजोर किया। बीजेपी के लिए यह परिणाम लंबे समय से प्रतीक्षित सफलता है लेकिन इसके साथ ही एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में शासन करने की चुनौती भी जुड़ी है, जहां उसका प्रमुख प्रतिद्वंद्वी अभी भी मजबूत बना हुआ है। इतना स्पष्ट है कि बंगाल अब एक नए राजनीतिक दौर में प्रवेश कर चुका है। तृणमूल के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती सत्ता में वापसी नहीं, बल्कि बिना सत्ता के खुद को नए सिरे से परिभाषित करना है। यह परिणाम उस राजनीतिक चक्र के अंत का संकेत भी है, जिसकी शुरुआत ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को समाप्त कर की थी।


राज्यसभा में कमजोर होगी TMC?

राज्यसभा में पश्चिम बंगाल के कुल 16 सांसद हैं जिसमें से 13 टीएमसी के और 3 बीजेपी के हैं। आने वाले समय में यह संख्या बदलने वाली है। कुल 6 सांसदों का कार्यकाल 2029 में खत्म होगा और 5 सांसदों का कार्यकाल 2030 में खत्म होगा। 2029 में रिटायर होने वाले सांसदों में 5 सांसद टीएमसी के हैं और एक सांसद बीजेपी के हैं। इसी तरह 2030 में रिटायर होने वाले पांच सांसदों में से चार टीएमसी के हैं और एक बीजेपी के हैं। यानी 11 में से 9 सांसद टीएमसी के हैं और 2 बीजेपी के हैं। मौजूदा विधायकों की संख्या के हिसाब से टीएमसी की संख्या बेहद कम हो जाएगी और पश्चिम बंगाल में बीजेपी के राज्यसभा सांसदों की संख्या 2030 तक काफी बढ़ जाएगी।