साल 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों में 18 से 25 साल के युवा वोटर अहम भूमिका निभा सकते हैं। चुनावी गणित, डेमोग्राफिक डेटा और राज्यों में उभरते राजनीतिक ट्रेंड बता रहे हैं कि Gen Z इस बार सिर्फ तमाशबीन नहीं है, बल्कि नतीजा बदलने वाली ताकत हैं। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के चुनावों में युवा वोटरों का हिस्सा इतना ज्यादा है कि वे सीधे सत्ता के समीकरण पर असर डाल सकते हैं।
भारतीय चुनाव आयोग के स्पेशल ब्रीफ रिव्यू 2024 के मुताबिक, देश में 96 करोड़ से ज्यादा रजिस्टर्ड वोटर हैं, जिनमें बड़ी संख्या 18-29 साल के उम्र के लोगों की है। यह उम्र वर्ग अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया है। अनुमान है कि देश में Gen Z की आबादी 37 करोड़ से ज्यादा है, जो किसी भी चुनावी हालात को पलटने की ताकत रखती है।
जिन राज्यों में 2026 में चुनाव होने हैं, वहां युवा वोटरों का प्रतिशत काफी ज्यादा है। असम में 30 पर्सेंट से ज्यादा, पश्चिम बंगाल में करीब 27 पर्सेंट, पुडुचेरी में करीब 23 पर्सेंट, तमिलनाडु में 22 पर्सेंट और केरल में 20 पर्सेंट युवा वोटर हैं। यह बताता है कि अगर युवाओं को किसी मुद्दे पर ऑर्गनाइज या इमोशनली लामबंद किया जाए, तो पारंपरिक वोट बैंक की पॉलिटिक्स को चुनौती दी जा सकती है।
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युवा वोटर्स के लिए रोजगार और महंगाई बड़े मुद्दे
युवा वोटर्स के लिए सबसे बड़े मुद्दे रोजगार और महंगाई हैं। एक सर्वे में 60 पर्सेंट से ज्यादा युवाओं ने रोजगार की कमी को अपनी बड़ी चिंता बताया है। कोविड-19 के बाद जॉब मार्केट में अस्थिरता और इनफॉर्मल नौकरियों की बढ़ती संख्या ने युवाओं में नाराजगी को और बढ़ा दिया है। यही वजह है कि राजनीतिक पार्टियां अब अपने मैनिफेस्टो में स्किल डेवलपमेंट, स्टार्टअप सपोर्ट और जॉब क्रिएशन पर खास जोर दे रही हैं।
केंद्र सरकार की 'पीएम-सेतु' स्कीम प्रोग्राम का मकसद इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट को मॉडर्न बनाकर युवाओं को नए टेक्निकल स्किल से लैस करना है। इसके तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक व्हीकल और सेमीकंडक्टर जैसे एरिया में ट्रेनिंग देने की बात कही गई है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि इन लंबे समय के प्लान के तुरंत चुनावी फायदे सीमित हो सकते हैं।
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राज्यवार चुनावी ट्रेंड
राज्यवार स्थिति अलग है। तमिलनाडु में एक्टर विजय की पार्टी के आने से युवाओं में जोश पैदा हुआ है, जो पारंपरिक डीएमके-आईएडीएमके ( DMK-IADMK) की राजनीति को चुनौती दे सकता है। पश्चिम बंगाल में वोटर रोल में बदलाव और घुसपैठ के मुद्दे ने ध्रुवीकरण बढ़ाया है, जबकि युवा रोजगार और माइग्रेशन जैसे मुद्दों पर ज्यादा फोकस करते दिख रहे हैं। केरल में सत्ता विरोधी रुझान और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट से नाराजगी युवाओं पर असर डाल रही है। वहीं, असम में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और शांति समझौतों ने युवाओं के एक हिस्से को सरकार के पक्ष में कर दिया है।
डिजिटल कैंपेन और सोशल मीडिया नैरेटिव
डिजिटल प्लेटफॉर्म इस चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं। Gen Z को ट्रेडिशनल मीडिया के बजाय सोशल मीडिया से राजनीतिक जानकारी मिलती है। इन्फ्लुएंसर कैंपेन, शार्ट वीडियो और AI से बना कंटेंट युवाओं की राय पर असर डाल रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि डिजिटल नैरेटिव पर टिकी पार्टियां बढ़त हासिल कर सकती हैं।
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Gen Z वोट बैंक नहीं, बदलाव की ताकत
ग्लोबल लेवल पर भी युवा मूवमेंट्स ने पॉलिटिकल बदलावों को तेज किया है, जिसका इंडियन यूथ पर साइकोलॉजिकल असर पड़ा है। वे अब जाति या धर्म के आधार पर राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते है बल्कि इकोनॉमिक और ट्रांसपेरेंट गवर्नेंस की उम्मीद कर रहे हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट्स का मानना है कि Gen Z कोई एक जैसा वोट बैंक नहीं है। उनका वोटिंग बिहेवियर स्टेट, लोकल इश्यूज और लीडरशिप की भरोसा पर निर्भर करेगा। हालांकि, यह साफ है कि 2026 के इलेक्शन युवा की उम्मीदों का टेस्ट होंगे। जो पार्टी रोजगार, शिक्षा , डिजिटल पारदर्शिता और सामाजिक न्याय के इश्यूज को भरोसेमंद तरीके से पेश करेगी, उसे युवा का सपोर्ट मिल सकता है।
