विधानसभा चुनाव हों या लोकसभा, भारतीय जनता पार्टी (BJP) चुनावों से ठीक पहले राष्ट्रीय स्वयं सेव संघ (RSS) के सर संघ संचालक, मोहन भागवत का आशीर्वाद चाहती है। जिस चुनाव में बीजेपी यह करने में चूकी, उसका असर, चुनावी नतीजों में झलक जाता है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों की बात थी, बीच चुनाव में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक इंटरव्यू में कह दिया था कि जब हम अक्षम थे, तब संघ की जरूरत पड़ती थी, आज हम बढ़ गए हैं तो हम खुद सक्षम है।
जेपी नड्डा के एक बयान का असर इतना उल्टा पड़ा कि कई राज्यों में बीजेपी की सीटें कम हुईं। बीजेपी के संगठन से जुड़े लोग, नाम छिपाने की शर्त पर बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर संघ कार्यकर्ताओं में इस बयान के प्रति इतना असंतोष हुआ कि उन्होंने बीजेपी को समर्थन देना ही छोड़ दिया। यूपी में बीजेपी को 29 सीटों का नुकसान हुआ।
2024 के चुनाव के बाद बीजेपी ने सबक लिया और मोहन भागवत को हर हाल में राजी करने की कोशिशों में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जुड़ गया। संघ खुश हुआ तो इसका चुनावी असर भी नजर आया। महाराष्ट्र में नवंबर 2024 में चुनाव हुए। झारखंड में भी चुनाव हुए। महाराष्ट्र में बीजेपी ने प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी की। झारखंड में कांटे की टक्कर हुई। साल 2025 में दिल्ली और बिहार में चुनाव हुए। दिल्ली में फरवरी तो बिहार में नवंबर में चुनावी नतीजे आए। दिल्ली में भी जीत मिली, बिहार में भी जीत मिली। इन बैठकों से पहले मोहन भागवत ने संगठनात्मक बैठकों के जरिए अपने कार्यकर्ताओं को बड़ा संदेश दिया।
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चुनावों से ठीक पहले बैठक करते हैं मोहन भागवत
मई 2024 में विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। नतीजे बीजेपी के पक्ष में होकर भी नहीं रहे। दो बार प्रचंड बहुमत से सत्ता में रहने वाली पार्टी, इस बार गठबंधन भरोसे हो गई। जीत तो एनडीए गठबंधन को मिली लेकिन सरकार कमजोर हो गई। नतीजों के तत्काल बाद, जून में योगी आदित्यनाथ और मोहन भागवत के बीच लंबी बैठक चली। पार्टी और संघ के बिगड़े सांगठनिक तालमेल पर चर्चा हुई। कहा गया कि बीजेपी, साल 2027 के लिए 2024 वाला रिस्क नहीं लेगी। मोहन भागवत कई बार सार्वजनिक मंचों पर परोक्ष रूप से बीजेपी नेताओं को फटकार लगा चुके हैं।
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- महाराष्ट्र: चुनाव से ठीक पहले मोहन भागवत राज्य में सक्रिय हुए। बीजेपी के कई बड़े नेताओं ने नागपुर में हाजिरी लगाई। नितिन गड़करी से लेकर देवेंद्र फडणवीस तक, संघ के दरबार पहुंचे। चुनावी नतीजे, हैरान करने वाले रहे। बीजेपी को ऐसी जीत, कभी नहीं मिली थी।
- झारखंड: 2024 में मोहन भागवत सक्रिय हुए। रांची में 'प्रांत प्रचारक बैठक' में हिस्सा लिया। उन्होंने सीधे किसी बड़े नेता से मिलने की जगह, राज्य के क्षेत्रीय प्रचारकों और बीजेपी के संगठन से जुड़े लोगों को बुलाया, बंद कमरे में बैठक हुई। एजेंडा तय हुई। मंत्र 'हिंदू एकता' का मिला। नतीजे को पक्ष में नहीं आए लेकिन बीजेपी ने कांटे की टक्कर दी।
- दिल्ली: फरवरी से पहले दिल्ली में अचानक मोहन भागवत दिल्ली में सक्रिय हुए। राजनेताओं से नहीं मिले, सामाजिक संवाद किया। कई स्तर पर छोटे कार्यकर्ताओं को सीधा मंत्र। मीडिया में इतनी सी खबर आई कि मोहन भागवत ने बीजेपी नेताओं संग बैठक की लेकिन क्या बात हुई, नहीं सामने आया। जब चुनावी नतीजे आए तो हैरान करने वाले रहे। आम आदमी पार्टी हाशिए पर आ गई थी। पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया अपनी सीट नहीं बचा पाए थे।
अब क्यों चर्चा में है मोहन भागवत की मुलाकात?
फरवरी 2026 में एक बार फिर मोहन भागवत और बीजेपी नेतृत्व की मुलाकात चर्चा में है। बुधवार को मोहन भागवत ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ 40 मिनट तक अहम बैठ की। वह लखनऊ के निरालानगर संघ कार्यालय में सीएम योगी से मिले। फिर ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य से मुलाकात हुई। साल 2027 में यूपी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, बीजेपी, संघ की नाराजगी का रिस्क नहीं लेना चाहती है।
काम कैसे करता है संघ, कैसे पलटती है चुनावी बाजी?
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के एक पूर्व पदाधिकारी ने बताया कि बीजेपी के लिए संघ के कार्यकर्ता प्रचार नहीं करते हैं। वह यह भी नहीं कहते कि किस पार्टी को वोट दो। मोहन भागवत का कार्यकर्ताओं का एक निर्देश होता है कि जो दल, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नजदीक हो, उस पर भरोसा जताओ। पूर्व पदाधिकारी ने बताया कि संघ राजनीतिक दल नहीं, एक सांस्कृतिक संगठन मानता है। पूर्व पदाधिकारी ने कहा कि लोग बीजेपी को संघ का अनुषांगिक संगठन बताते हैं। बीजेपी, संघ के प्रभावित है लेकिन संघ के इशारे पर काम नहीं करती है।
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मोहन भागवत, संघ प्रमुख:-
बीजेपी का रिमोट कंट्रोल RSS के हाथ में नहीं, स्वयंसेवक राजनीति में जाते हैं, लेकिन संघ पार्टी को नहीं चलाता।
पूर्व पदाधिकारी ने कहा कि संघ हिंदुत्व और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे को प्रासंगिक बनाए रखता है। चुनाव के दौरान संघ के स्वंयसेवक सीधे तौर पर चुनाव प्रचार नहीं करते, 'जन जागरण' करते हैं, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की बात करते हैं। उनका जोर, इन सिद्धांतों को समर्थन करने वाले दल के लिए लोगों के मतदान पर होता है। एक तरफ जहां बीजेपी आक्रामक कैंपेनिंग में भरोसा करती है, संघ के कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर बिना कुछ कहे, बड़ा संदेश दे जाते हैं। बीजेपी का अपना संगठन मजबूत है, संघ के साथ की वजह से पार्टी, दलगत राजनीति में हावी पड़ जाती है। यह काम इतनी शांति से होता है कि दूसरे दलों को भनक तक नहीं लगती है।
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बीजेपी के एक बूथ स्तरीय कार्यकर्ता आकाश शर्मा ने बताया, 'बीजेपी और संघ के बीच समन्वय के लिए खास प्रचारक नियुक्त होते हैं। संघ का जमीनी नेटवर्क मजबूत है। शिक्षण संस्थाओं से लेकर सांस्कृतिक समितियों तक संघ के लोग हैं। वे पार्टी की खामियां बताते हैं, जनता किस मुद्दे पर नाराज है, क्या शिकायतें हैं, किस नेता के खिलाफ क्या माहौल है, किसका काम अच्छा है, संघ सपाट फीडबैक देता है। बीजेपी, उन कमियों पर गौर करती है।'
संघ प्रमुख मोहन भागवत खुद कह चुके हैं कि बीजेपी का रिमोट कंट्रोल RSS के हाथ में नहीं है। टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार की रणनीति तक में यही होता है। जब बीजेपी के भीतर आंतरिक मतभेद होते हैं, सत्ता और संगठन का तालमेल बिगड़ता है, बात संघ मुख्यालय तक पहुंचती है। संघ की भूमिका बीजेपी के 'अभिभावक' की तरह है, जो बीजेपी को आजाद तो छोड़ता है लेकिन समय-समय पर यह बता भी देता है कि 'संगठन, सरकार से बड़ा है।'
