जनसुराज पार्टी संस्थापक के संस्थापक प्रशांत किशोर बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। पीके के यहां से उतरने से मुकाबला दिलचस्प हो गया, क्योंकि यह क्षेत्र बीजेपी का गढ़ है। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद सीट खाली हुई। 30 जुलाई को यहा मतदान होगा। बता दें कि प्रशांत किशोर ने पहले ही कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो वह स्वयं बांकीपुर से उपचुनाव लड़ेंगे।
जनसुराज के अलावा अभी तक किसी अन्य दल ने अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है। नितिन नवीन साल 2010 से यहां से लगातार विधायक थे। बीजेपी के सबसे मजूबत गढ़ में से एक में प्रशांत किशोर के उतरने से यह सियासी लड़ाई सीधे जन सुराज बनाम बीजेपी की बन चुकी है।
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क्यों खाली हुई सीट?
बांकीपुर से नितिन नवीन विधायक थे। मगर बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया। राज्यसभा सदस्य बनने के बाद नितिन नवीन ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। वे यहां से कुल चार बार विधायक रहे। चुनाव में प्रशांत किशोर के उतरने से मामला दिलचस्प हो गया और सम्राट चौधरी सरकार की पहली अग्निपरीक्षा भी होगी।
चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 13 जुलाई है। 14 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी। 16 जुलाई नामांकन वापसी की आखिरी तारीख है। 30 जुलाई को बांकीपुर विधानसभा सीट पर वोटिंग होगी। 3 अगस्त को मतगणना है। 4 अगस्त को चुनाव प्रक्रिया संपन्न हो जाएगी।
बांकीपुर बीजेपी का गढ़ कैसे?
बांकीपुर विधानसभा सीट को 2008 से पहले पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता है। परिसीमन के बाद बांकीपुर विधानसभा का गठन किया गया। नितिन नवीन पहली बार पटना पश्चिम विधानसभा सीट से 2006 में उपचुनाव जीता था। इससे पहले यहां उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा लगातार तीन बार चुनाव जीते। 2010 में बीजेपी ने नितिन नवीन को बांकीपुर सीट से प्रत्याशी बनाया। नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2022 और 2025 विधानसभा चुनाव में लगातार जीत हासिल की।
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बीजेपी के सामने चुनौतियां क्या?
- बांकीपुर विधानसभा सीट पर बीजेपी का 1995 से कब्जा है। सम्राट चौधरी के सीएम बनने के बाद यह पहला उपचुनाव है। इस लिहाज से चुनौती भी बड़ी है। पीके के मैदान में उतरने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। देखना यह होगा कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी अपना गढ़ बचा पाती है या नहीं।
- बांकीपुर का संबंध बीजेपी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से है। परंपरागत सीट होने की वजह से नितिन नवीन की प्रतिष्ठा भी यहां से जुड़ी है। अगर यहां अपेक्षित नतीजे नहीं आएं तो सियासी तौर पर इसका दूरगामी संदेश जाएगा। इसी से बचने की खातिर बीजेपी पूरी ताकत झोंकेगी।


