एक समय पर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में लोक सभा व विधानसभा के चुनाव में दमखम दिखाने वाली राष्ट्रीय लोक दल (RLD) यूपी के चंद जिलों में ही सिमट कर रह गई है। किसान नेता चौधरी चरण सिंह ने इस पार्टी की स्थापना की थी। पश्चिम उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के समय में पार्टी का जाट मुस्लिम समीकरण अजेय माना जाता था। इसके बाद उनके पुत्र अजीत सिंह ने पार्टी को नई बुलंदियों पर पहुंचाने का काम किया। साल 2013 के बाद से पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता ही चला गया।
जाट मुस्लिम का गठजोड़ टूटना बना कारण
रालोद को जाट मुस्लिम की पार्टी कहा जाता था। पश्चिम उत्तर प्रदेश में पार्टी का संगठन अन्य पार्टियों से मजबूत था। चौधरी चरण सिंह और अजीत सिंह की एक आवाज पर जाट एकजुट हो जाते थे। वर्ष 2013 में पश्चिम उत्तर प्रदेश में हुए दंगों के बाद से मुस्लिम और जाट में बिखराव हो गया। मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी में चले गए। इसके बाद से पार्टी का डाउनफाल शुरू हो गया।
यह भी पढ़ें: नए योगी कैबिनेट में पूजा पाल को BJP ने किया साइडलाइन, क्या है वजह?
लगातार बदले गठबंधन
लोकदल पार्टी के मुखिया अजीत सिंह व जयंत सिंह ने सत्ता में बने रहने के लिए कभी कांग्रेस, कभी समाजवादी तो कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया। इस तरह की अवसरवादी राजनीति के कारण कोर वोट बैंक दूर होता चला गया। वर्तमान में जाट वाटरों को साधना भी पार्टी के लिए मुश्किल साबित हो रहा है।
यह भी पढ़ें: 'वेणुगोपाल ने ही तो...', अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए क्या बोले वी डी सतीशन?
बीजेपी की आंधी में जाट वोटरों ने भी तोड़ा नाता
साल 2014 के लोक सभा व वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व का नारा देकर जाट सहित अन्य पिछडी जातियों को अपने पाले में कर लिया। इसके बाद से लोक दल का पारंपरिक वोट बैंक भी उसके हाथ से फिसल गया। वर्ष 2021 में अजीत सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र जयंत सिंह ने कमान संभाली। उन्होंने सपा से गठबंधन कर वर्ष 2022 का विधान सभा चुनाव में 33 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। इसमें उनकी पार्टी के 9 विधायक चुनाव जीते लेकिन गठबंधन की सरकार नहीं बन पाई। बाद में जयंत ने समाजवादी पार्टी का दामन छोडकर बीजेपी का हाथ थाम लिया।
