त्रिपुरा में इन दिनों विधानसभा चुनाव तो नहीं लेकिन इसी के टक्कर का चुनाव हो रहा है। यह ऐसा चुनाव है, जो विधानसभा चुनावों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। यह और कोई नहीं बल्कि त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) के चुनाव हो रहे हैं। कहा जाता है कि जो भी पार्टी 28 सदस्यों वाली इस काउंसिल की सत्ता पर आसीन होती है वही राज्य की विधानसभा में भी लगभग आसीन हो जाती है।
त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के चुनाव के लिए कैंपेन 10 अप्रैल को थम गया। अब राज्य के आठ जिलों की सभी 28 सीटों के लिए 12 अप्रैल को वोटिंग डाली जाएगी। इसके नतीजे 17 अप्रैल को आएंगे। त्रिपुरा की क्षेत्रिय और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच TTAADC एक अहम लड़ाई का मैदान बनकर उभरा है।
वर्तमान में त्रिपुरा काउंसिल पर प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा की टिपरा मोथा पार्टी की सत्ता है। काउंसिल पर अपना कंट्रोल बनाए रखने के लिए टिपरा मोथा ने इस बार भी जोरदार चुनावी कैंपेन चलाया। वहीं, बीजेपी मुख्यमंत्री माणिक साहा के नेतृत्व में टिपरा मोथा से काउंसिल की सत्ता छीनने की कोशिश कर रही है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) और कांग्रेस ने भी बड़े पैमाने पर चुनावी कैंपेन किया है।
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TTAADC काउंसिल जो त्रिपुरा के लगभग दो-तिहाई ज्योग्राफिकल एरिया को कवर करती है। इन 28 सीटों में लगभग 13 लाख लोग रहते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर त्रिपुरा ऑटोनॉमस काउंसिल जीतने वाली पार्टी क्यों राज्य के आदिवासियों के दिलों पर राज करती है...
चुनाव के लिए कड़ी तैयारी
राज्य चुनाव आयोग के सेक्रेटरी अनुराग सेन ने जानकारी देते हुए बताया है कि चुनावी कैंपेन का समय बिना किसी बड़ी घटना के खत्म हो गया। उन्होंने कहा कि राज्य में कुल 9,62,679 वोटर हैं। यही वोटर त्रिपुरा काउंसिल में चुनाव लड़ रहे 173 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे। इस चुनावी नतीजे से त्रिपुरा में आदिवासी राजनीति की दिशा तय होने की उम्मीद है।
काउंसिल एरिया में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। त्रिपुरा के डीजीपी अनुराग ने कहा कि फ्री और फेयर वोटिंग सुनिश्चित करने के लिए एक पुख्ता सुरक्षा इंतजाम किया गया है। त्रिपुरा स्टेट राइफल्स और स्टेट पुलिस के 12,000 से ज्यादा जवानों के साथ-साथ सेंट्रल पैरामिलिट्री फोर्स की 24 कंपनियों को तैनात किया गया है।
त्रिपुरा में 30 फीसदी आदिवासी समुदाय
दरअसल, त्रिपुरा की कुल आबादी में से 30 फीसदी आबादी आदिवासी समुदाय की है। राज्य में त्रिपुरी, रियांग (ब्रू), जमातिया, चकमा, हलम जैसे आदिवासी समुदाय रहते हैं। यह जनजातियां मुख्य रूप से त्रिपुरा के पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में रहती हैं। यह समुदाय अपने आदिवासी मुद्दे, ग्रेटर टिपरालैंड और आदिवासी अधिकारों की मांग के आधार पर वोट करता है। ऐसे में जो भी दल इनके अधिकारों की बात करता है, उनका वोट उसे ही जाता है। वर्तमान में आदिवासियों के सबसे बड़े नेता के तौर पर प्रद्योत देबबर्मा बनकर उभरे हैं।
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विधानसभा में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व
त्रिपुरा विधानसभा में कुल 60 विधानसभा सीटें हैं। इस 60 में से 20 सीटें सीटें आदिवासी समुदायों के लिए रिजर्व हैं। यानी लगभग एक-तिहाई सीटें सीधे आदिवासी वोटरों पर निर्भर हैं। ऐसे में इन 20 सीटों को काउंसिल कंट्रोल करती है। जो पार्टी TTAADC का चुनाव जीतती है, उसका विधानसभा चुनावों के गणित पर काफी असर होता है। काउंसिल में कुल 28 सीटें हैं। इसमें से टिपरा मोथा के पास 18 सीटें हैं। खास बात यह है कि 2021 में टिपरा मोथा पहली बार चुनाव लड़कर काउंसिल की सत्ता पर काबिज हुई थी। साथ ही राज्य विधानसभा की भी 13 सीटें जातने में कामयाबी हासिल की थी।
किंगमेकर की भूमिका में आदिवासी
यही आदिवासी समुदाय त्रिपुरा में किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं। कोई भी पार्टी सरकार बनाना चाहती है, तो उसे आदिवासी क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करना जरूरी है। राज्य में कई बार आदिवासी वोट सरकार बनाने या गिराने में निर्णायक साबित होते हैं। TTAADC कोई आम स्थानीय निकाय नहीं है। साल 1982 से संविधान के छठी अनुसूची के तहत इसे बनाया गया था। यह स्वायत्त बॉडी है, जो त्रिपुरा के लगभग 70 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर राज करती है। यह काउंसिल आदिवासियों के कल्याण के लिए काम करती है।
काउंसिल में पैसे का खेल
त्रिपुरा की 30 फीसदी आदिवासी आबादी की लंबे समय से शिकायतें हैं। उनकी शिकायतों में सीमित वित्तीय स्वायत्तता, TTAADC की सीमाओं के अंदर जमीन के मालिकाना हक का न होना, स्वास्थ्य और पीने के पानी की कम सुविधा और राजनीतिक संस्थाओं में कम प्रतिनिधित्व का कम होना है। त्रिपुरा में 2026-27 के बजट में ट्राइबल सब प्लान के लिए 7,542 करोड़ दिए गए। यह राज्य के कुल खर्च का 39.39 प्रतिशत है। मगर, TTAADC का इसमें हिस्सा मात्र 914.82 करोड़ रहा। क्षेत्रिय पार्टियों ने हमेशा से काउंसिल में फंड की कमी का आरोप लगाया है। इसके बदले में राज्य सरकारें काउंसिल के अंदर ही प्रशासनिक नाकामियों को गिनाती हैं।
