राजनीतिक पंडितों के बीच अक्सर जब चर्चा होती है तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठनात्मक ढांचे और उसके काम करने के तरीके की तारीफ होती है। यह कहा जाता है कि एक चुनाव खत्म होने से पहले ही BJP दूसरे चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है। ऐसा ही कुछ 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनाव होने हैं और 2025 के आखिरी दो दिन BJP के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में बिताए। इस बीच 1977 में पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर होने वाली कांग्रेस की तैयारियां न के बराबर दिख रही हैं। केंद्र की सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही कांग्रेस पश्चिम बंगाल में लगभग खत्म सी हो गई है। इसके बावजूद BJP के मुकाबले कांग्रेस की तैयारियां बेहद कमजोर स्थिति में हैं।

 

लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज कांग्रेस बीते 10 चुनाव में हर बार खराब होती गई है और वह अब शून्य के करीब पहुंच गई है। 2021 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीत पाई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ एक लोकसभा सीट पर चुनाव जीत पाई थी। यानी विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा में भी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व शून्य की ओर जा रहा है।

 

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पश्चिम बंगाल में क्या कर रही है कांग्रेस?

 

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कन्फ्यूजन की स्थिति में लगती है। कभी इंडिया गठबंधन के तहत कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस से गठबंधन की कोशिश करती है तो कभी उसी के खिलाफ चुनाव लड़ती है। इसका असर स्थानीय काडर पर पड़ा है और उसके हौसते पस्त हैं। सितंबर 2024 में पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष शुभांकर सरकार को बनाया गया। उन्होंने अधीर रंजन चौधरी की जगह ली जबकि अधीर रंजन तृणमूल कांग्रेस के प्रखर आलोचक रहे हैं।

 

शुभांकर सरकार की ना तो कोई मास अपील है और ना ही उन्हें जनाधार वाले नेताओं में गिना जाता है। हालांकि, लंबे समय तक कांग्रेस में रहने के कारण उन्हें प्रदेश का काडर जानता जरूर है। संगठन में अलग-अलग भूमिकाएं निभाने वाले शुभांकर अभी तक विधायक या सांसद नहीं बने हैं। शुभांकर के बारे में कहा जाता है कि जहां अधीर रंजन चौधरी तृणमूल कांग्रेस से किसी भी तरह के गठबंधन का विरोध करते थे, शुभांकर इसके पक्ष में थे।

क्या है बंगाल कांग्रेस की रणनीति?

 

अभी भी पश्चिम बंगाल कांग्रेस की रणनीति सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के बजाय विपक्षी बीजेपी से लड़ने की नजर आ रही है। हाल ही में जब अमित शाह पश्चिम बंगाल के दौरे पर पहुंचे तो पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष शुभांकर सरकार की अगुवाई में कांग्रेस कार्यकर्ता उनके विरोध में प्रदर्शन करते नजर आए। उससे कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल कांग्रेस का डेलिगेशन राज्यपाल सी वी आनंद बोस से मिला तो उसमें भी  बंगाल के बजाय बीजेपी शासित राज्यों में बंगालियों के खिलाफ हो रही घटनाओं का जिक्र था। इक्का-दुक्का मुद्दों को छोड़ दें तो पश्चिम बंगाल की कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस पर कम और केंद्र की बीजेपी सरकार पर ज्यादा हमलावर नजर आती है। 

 

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कुछ दिनों पहले राज्य इकाई ने कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को संदेश दिया है कि वह पश्चिम बंगाल में अकेले ही चुनाव लड़ना चाहती है। प्रदेश कांग्रेस की राय है कि अगर लेफ्ट के साथ गठबंधन हो तब भी 50-50 का अनुपात हो न कि पहले की तरह 2:1 के अनुपात में सीटें मिलें। यानी चुनाव कुछ महीनों में है और अभी भी कांग्रेस यह तक नहीं तय कर पाई है कि उसे अकेले चुनाव लड़ना है या फिर लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ना है।

 

दूसरी तरफ, 2021 में बंगाल में शानदार प्रदर्शन की बदौलत मुख्य विपक्षी पार्टी बनने वाली बीजेपी ने अभी से अपना अभियान तेज कर दिया है। दिल्ली और बिहार में शानदार सफलता के बाद बीजेपी का लक्ष्य बंगाल पर ही है। बीजेपी नेता न सिर्फ जमीन पर जा रहे हैं बल्कि योजनाबद्ध तरीके से ममता बनर्जी के सामने चुनौती भी पेश कर रहे हैं। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी लगातार अपने नेताओं को पश्चिम बंगाल भेज रहा है और बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक की तैयारियां खंगाली जा रही हैं।

चुनाव दर चुनाव बंगाल में कमजोर हो रही कांग्रेस

 

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल की 42 में से सिर्फ एक सीट जीत पाई थी और उसके दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी अपनी सीट तक हार गए थे। तब कांग्रेस का वोट प्रतिशत सिर्फ 4.7 प्रतिशत रह गया था। 2021 के विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस अकेले पूरे राज्य में लड़ने के काबिल भी नहीं बची थी। आखिर में कांग्रेस ने उन्हीं वामपंथी पार्टियों से गठबंधन किया जिन्होंने कभी कांग्रेस को पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर कर दिया था। हालांकि, इसका नतीजा भी लाभदायक नहीं रहा और कांग्रेस एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीत पाई। इसका जबरदस्त लाभ बीजेपी को मिला और वह प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई। वहीं, कांग्रेस का वोट सिर्फ 3 प्रतिशत रह गया। 

 

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कांग्रेस के लिए 2021 की हार बेहद शर्मनाक इसलिए भी थी कि 2016 में कांग्रेस के 44 विधायक जीते थे और पिछले 4 चुनावों में यह उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन था। 2021 में कांग्रेस 44 से 0 पर आ गई। यह दिखाता है कि पश्चिम बंगाल में बीते 4 दशक में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और फिर बीजेपी ने कांग्रेस को पूरी तरह से खत्म कर दिया है और अब उसके सामने बड़ी चुनौती है।

48 साल से सत्ता से बाहर है कांग्रेस

 

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे थे और उनका कार्यकाल 20 मार्च 1972 से 30 अप्रैल 1977 तक था। बंगाल में लेफ्ट के उदय के साथ ही कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन खोती गई। ज्योति बसु की सरकार थी और तब कांग्रेस की नेता रहीं ममता बनर्जी की इच्छा थी कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को खुली चुनौती देकर लड़ा जाए। हालांकि, कांग्रेस तब भी ऊहोपाह की स्थिति में थी। नतीजतन ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस छोड़ दी और 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस का गठन कर लिया। 

 

यहां से कांग्रेस दोफाड़ हो गई और ममता बनर्जी के समर्थक और लेफ्ट के विरोधी सभी लोग तृणमूल कांग्रेस के साथ हो गए। ममता बनर्जी ने नई पार्टी बनाकर सिर्फ 14 साल में ही लेफ्ट को पश्चिम बंगाल से बाहर कर दिया लेकिन सैकड़ों साल पुरानी कांग्रेस यहां भी चूक गई। सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने न सिर्फ लेफ्ट को लगभग खत्म सा कर दिया बल्कि उनके चलते ही कांग्रेस भी पश्चिम बंगाल में नहीं पनप पाई।

 

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन

 

लोकसभा चुनाव कांग्रेस की सीटों की संख्या
2024 1
2019 2
2014 4
2009 6
2004  6

 

विधान सभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन

 

 

विधानसभा चुनाव कांग्रेस की सीटों की संख्या
2021 0
2016 44
2011 42
2006 21
2001 26