तमिलनाडु में कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कजगम (DMK) के बीच गठबंधन तो है लेकिन इस गठबंधन की शर्त है कि सत्ता में हिस्सेदारी नहीं दी जाएगी। कांग्रेस पार्टी के विधायक गठबंधन की इस शर्त से परेशान हैं और राज्य में नए सियासी गठजोड़ की तलाश में हैं। कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि पार्टी को विजय थलापति की पार्टी तमिलगा वेत्री कजगम के साथ गठबंधन करना चाहिए, यह डीएमके गठबंधन से ज्यादा दमदार साबित होगा। कांग्रेस नेताओं ने डीएमके से नाराजगी के बीच दिल्ली में पार्टी के अलाकमान से मुलाकात भी की थी।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में तमिलनाडु के नेताओं को साफ निर्देश मिले हैं कि गठबंधन को लेकर बयानबाजी न की जाए। इंदिरा भवन मुख्यालय में हुई इस बैठक मल्लकार्जुन खड़गे, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कांग्रेस महासचिव और संगठन प्रभारी केसी वेणुगोपाल, तमिलनाडु के पार्टी प्रभारी गिरीश चूडांक और कांग्रेस की प्रदेश यूनिट के अध्यक्ष के सेल्वपेरुंथगई जैसे नेताओं ने सहमति जताई है। डीएमके के रुख से एक बार फिर साफ है कि कांग्रेस को सरकार में कोई हिस्सेदारी नहीं दी जाएगी। सरकार से दूर रखने के पीछे अतीत की कुछ कड़वी यादें भी हैं।
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दशकों पुराना गठबंधन फिर सरकार में हिस्सेदारी क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए क्योंकि जीतन राम मांझी केंद्र सरकार में मंत्री हैं। उनकी पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के पास एक लोकसभा सीट है। बिहार में 5 सीटों के साथ वह सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा हैं, उनकी पार्टी को मंत्रिमंडल में जगह मिली है। उपेंद्र कुशवाहा के साथ भी ऐसा ही है। अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) के 12 विधायक हैं, वह खुद केंद्र में मंत्री हैं। राम दास आठवले के पास एक भी सीट नहीं है, वह केंद्रीय मंत्री हैं।
जब दूसरे दल, गठबंधन धर्म निभाकर मत्रिमंडल में मौका देते हैं तो डीएमके कांग्रेस को क्यों नहीं मौका देती, आइए जानते हैं-
- तमिलनाडु में गठबंधन भरोसे है कांग्रेस: तमिलनाडु विधानसभा में कुल सीटें 234 हैं। साल 2021 में कांग्रेस को सिर्फ 25 सीटें मिली थीं, जिनमें 18 सीटों पर कांग्रेस की जीत हुई थी। 18 सीटों के बाद भी कांग्रेस को सत्ता में हिस्सेदारी इसलिए नहीं मिली, क्योंकि तमिलनाडु में डीएमके अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में है। कांग्रेस समर्थन दे या न दे, डीएमके को फर्क नहीं पड़ता है।
- बहुमत का दम, कांग्रेस को करता है बेदम: तमिलनाडु में डीएमके के पास पूर्ण बहुमत है। राज्य में 234 विधानसभा सीटें हैं, जिसमें बहुमत का आंकड़ा 118 है। डीएमके अकेले, बहुमत के आंकड़े को पार कर चुकी है। कांग्रेस सहयोगी भर है। वैसे भी जब किसी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत होता है, तो वह गठबंधन के साथियों को मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए मजबूर नहीं होती। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, यही करती हैं।
- जनाधार खोने का डर: तमिलनाडु में ऐसी भी राजनीतिक परंपरा रही है, जब गठबंधन के साथी सरकार में शामिल होने के बजाय बाहर से समर्थन देते हैं। अब डीएमके, राष्ट्रीय स्तर पर सीपीआई और वीसीके जैसी पार्टियों के साथ इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। अगर कांग्रेस को हिस्सेदारी मिलती है तो दूसरी पार्टियां भी डीएमके पर मंत्रिमंडल के लिए दबाव डाल सकती हैं। डीएमके सरकार इस टकराव से बचना चाहती है। डीएमके का तर्का है कि सत्ता का बंटवारा और प्रशासनिक जटिलताएं इन्हीं वजहों से बढ़ते हैं।
- कांग्रेस दबाव नहीं बना पाती है: कांग्रेस, तमिलनाडु में डीएमके पर दबाव की राजनीति नहीं कर पा रही है। प्रवीण चक्रवर्ती, मणिकम टैगोर, गिरिश चोडनकर जैसे नेता खुलकर कह रहे हैं कि सत्ता में हिस्सेदारी के लिए शीर्ष नेतृत्व को दबाव बनाना चाहिए, दूसरी तरफ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपने ही कार्यकर्ताओं को चुप रहने की नसीहत देता है। कांग्रेस तमिलनाडु में पिछले कई दशकों से एक कमजोर, शक्तिविहीन छोटे भाई की भूमिका में बना है।
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तमिलनाडु में कांग्रेस-DMK गठबंधन का इतिहास क्या है?
1971 में हुई रिश्तों की शुरुआत
कांग्रेस और डीएमके के बीच गठबंधन 5 दशक से ज्यादा पुराना है। कांग्रेस और डीएमके राजनीतिक तौर पर बेहद अलग विचारधारा की पार्टियां हैं। मार्च 1971 में हुए लोकसभा और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस और एम करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके ने साथ आने का फैसला किया। एमजी रामचंद्रन और एम करुणानिधि के बीच रिश्ते बेहद तल्ख हो गए थे, कांग्रेस ने सधे कदमों से डीएमके के साथ गठबंधन मजबूत किया।
जमीन पर सियासी लड़ाई आज भी डीएमके बनाम AIADMK के बीच होती है। एक के साथ पिछलग्गू की तरह कांग्रेस लगी है, दूसरे के साथ बीजेपी। साल 1969 में कांग्रेस ने तमिलनाडु में विभाजन का दौर देखा। के कामराज ने अलग पार्टी बनाई तो इंदिरा ने कांग्रेस (आर) अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एम करुणानिधि की डीएमके साथ हाथ मिलाया। डीएमके ने कांग्रेस को 9 लोकसभा सीटें तो दे दीं लेकिन विधानसभा में एक भी सीट नहीं दी। गठबंधन था, केंद्र में सरकार बचाने की मजबूरी थी तो कांग्रेस ने हामी भर दी।
जब डीएमके लिए विलेन हुईं इंदिरा गांधी
साल 1974 के बाद रिश्ते तल्ख हुए। साल 1975 में आपातकाल लगा और डीएमके के लिए इंदिरा गांधी विलेन हो गईं। इंदिरा गांधी और करुणानिधि के बीच मतभेद गहरे हुए। जनवरी 1976 में इंदिरा गांधी ने डीएमके की सरकार को बर्खास्त कर दिया। साल 1977 के चुनावों में कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़ दिया और एमजीआर (MGR) की नई पार्टी AIADMK के साथ गठबंधन कर लिया।
हर बार नए पार्टनर ढूंढने लगी कांग्रेस
इंदिरा गांधी को लगा कि उनसे गलती हुई है। 1980 के लोकसभा चुनाव से पहले समीकरण बदलने लगे थे। पुराने रिश्तों को बेहतर करने की बारी थी। इंदिरा गांधी और करुणानिधि ने एक बार फिर हाथ मिलाने का फैसला किया। इंदिरा गांधी ने करुणानिधि का आशीर्वाद हासिल किया। गठबंधन लोकसभा में तो असरदार रही लेकन 1980 के विधानसभा चुनाव में यह जोड़ी फ्लॉप साबित हुई। एमजीआर की तूती बोल रही थी और डीएमके-कांग्रेस का दांव ही नहीं चल पाया। कांग्रेस ने एक बार फिर पार्टनर बदला और साल 1983-84 तक कांग्रेस फिर से AIADMK के साथ दोस्ती में रही।
राजीव गांधी की हत्या और DMK से कांग्रेस का मोहभंग
साल 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस और डीएमके के रिश्ते और तल्ख हो गए। दोनों दलों में कड़वाहट बढ़ने लगी। कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि डीएमके, लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल एलम (LITTE) को बढ़ावा दे रही है। दोनों तरफ से बयानबाजियां खूब हुईं। कांग्रेस और डीएमके ने अलग होने का फैसला लिया।
जब जयललिता से हुई कांग्रेस की दोस्ती
साल 1996 तक, AIADMK को नई नेता मिल गईं थीं। जयललिता तमिल राजनीति की नई नेता थीं। कांग्रेस ने उनके साथ गठबंधन में जाने का फैसला किया। जीके मूपनार के नेतृत्व में कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने विद्रोह कर लिया। एक नई पार्टी तमिलनाडु में अस्तित्व में आई तमिल मनीला कांग्रेस जिसे TMC के तौर पर लोग जानते हैं। यह पार्टी, अब बीजेपी के साथ गठबंधन में है।
साल 1996 में टीएमसी और डीएमके ने कमाल किया। TMC ने डीएमके के साथ गठबंधन किया और 1996 में शानदार जीत हासिल की। 1990 के दशक के अंत में डीएमके ने केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली NDA सरकार को समर्थन दे दिया था। कांग्रेस और डीएमके की दूरी और बढ़ गई। 2000 तक दोनों दलों के रिश्ते तल्ख ही रहे।
दोबारा क्यों साथ आए कांग्रेस और डीएमके?
साल 2004 से 2013 तक कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन मजबूत हुआ। सोनिया गांधी और एम करुणानिधि के नेतृत्व वाला यह गठबंधन 9 साल तक चला लेकिन कांग्रेस को डीएमके ने सरकार में हिस्सेदारी नहीं दी। डीएमके केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार का हिस्सा रही लेकिन साल 2013 में ही 'श्रीलंकाई तमिल' मुद्दे पर डीएमके ने यूपीए से समर्थन वापस ले लिया था। साल 2016 में एक बार फिर दोनों पार्टियां साथ आईं। तब से लेकर अब तक साथ चल रहा है। कांग्रेस डीएमके साथ सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA) का हिस्सा है, केंद्र में यह गठबंधन, इंडिया गठबंधन का हिस्सा है।
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भविष्य क्या है?
कांग्रेस, डीएमके से 35–40 सीटों की मांग कर रही है। डीएमके कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने के पक्ष में नहीं है। प्रवीण चक्रवर्ती, मणिकम टैगोर, गिरिश चोडनकर और सचिन पायलट जैसे नेताओं की मांग है कि जब कांग्रेस के पास निर्णायक सीटें हैं तो क्यों न सत्ता में हिस्सेदारी भी मिले। डीएमके सत्ता में हिस्सेदारी देने तक को राजी नहीं है।
