बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमों मायावती एक लंबे समय से जनता की नजरों से ओझल हैं। वह कभी-कभी किसी बड़े मुद्दे पर पार्टी और अपनी राय रखने के लिए मीडिया में बयान देती हुई नजर आती हैं। इसके बीच में वह अधिकतर लखनऊ के पार्टी दफ्तर में बीएसपी नेताओं के साथ में समीक्षा बैठक करती हुई और निर्देश देती हुई नजर आती हैं। पार्टी ऑफिस में बैठक करते हुए उनकी तस्वीरें अक्सर सोशल मीडिया पर दिखती हैं। उत्तर प्रदेश की चार बार की मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती के मौके पर लखनऊ में दिखाई दीं। संविधान निर्माता आंबेडकर की जयंती के मौके पर उन्होंने पार्टी के सीनियर लीडरशिप और कार्कर्ताओं के साथ में श्रद्धासुमन अर्पित किया।
हालांकि, मायावती इस दिन को खास बनाने के लिए अपना शक्ति प्रदर्शन दिखाती रही हैं। 14 अप्रैल, 2025 को ही मायावती में लखनऊ में बड़ी रैली करके विपक्षी दलों की नींद उड़ा दी थी। मगर, इस बार उन्होंने कोई रैली नहीं की। ऐसे में उनके समर्थकों के साथ में प्रतिद्वंद्वी भी पूछने लगे हैं कि हाईटेक हो चुकी आज की राजनीति में मायावती कहां दिखाई देती हैं। जब सभी नेता और दल सोशल मीडिया के जमाने में हर जगह दिखाई दे रहे हैं तो मायावती जनता और मीडिया-सोशल मीडिया पर क्यों नहीं दिखाई देतीं... आइए इससे बसपा के लिए पैदा होने वाली चुनौतियों के बारे में जानते हैं।
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वर्तमान राजनीति हाईटेक सियासत का दौर
वर्तमान में जहां हाईटेक राजनीति का दौर चल रहा है, वहां बीएसपी और पार्टी अध्यक्ष मायावती पिछड़ती हुई दिखाई देती हैं। आज के दौर में सोशल मीडिया, डेटा एनालिटिक्स और आक्रामक चुनावी नैरेटिव की बात होती है। इनको अपनाकर देश में बड़े-बड़े चुनाव जीते जा रहे हैं। ऐसे दौर में मायावती और उनकी पार्टी बीएसपी की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं दिखती। हालांकि, बसपा अपने वोटरों में जमीनी पकड़ जरूर मजबूती के साथ रखती है। मगर, सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा। बीएसपी को सत्ता में आने के लिए अपने कोर वोटरों के साथ में अतिरिक्त वोट जोड़ने होंगे। इसके लिए उसे जेन ज़ी युवाओं, अलग जातियों में भी पैठ बनानी होगी।
आज की राजनीति में रैलियों, संवाद, कैडर जैसे पारंपरिक तरीकों के अलावा सोशल मीडिया चुनाव लड़ने का बहुत बड़ा माध्यम है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर लगातार मौजूद रहना जरूरी हो गया है। बीएसपी और मायावती इन प्लेटफॉर्म पर काफी सीमित और नियंत्रित तरीके से ही सक्रिय रहती है। मायावती खुद भी कम सार्वजनिक रैलियां और मीडिया इंटरैक्शन करती हैं। यहां कम सक्रिय होने से युवा और शहरी वोटर्स के बीच पार्टी की पकड़ कमजोर हुई है।
मायावती की सियायत के तौर तरीके
मायावती अभी भी वर्तमान राजनीति में लो-प्रोफाइल मॉडल अपना रही हैं। वह अब भी एक कंट्रोल्ड, कम-प्रचार वाली सियासत कर रही हैं। मायावती अपनी बात प्रेस नोट, सीमित बयान रखती हैं। वह किसी भी बड़े गठबंधन से दूरी बनाकर रखती हैं। दूसरी तरफ बीजेपी, कांग्रेस और सपा बड़े-बड़े गठबंधन करके चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। जबकि आज की राजनीति में लगातार नैरेटिव बिल्डिंग करते रहना जरूरी बन गया है।
कोर वोट बैंक में सेंधमारी
राजनीति में नेताओं और पार्टियों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें लगातार दिखना चाहिए और उनके बारे में चर्चा होती रहनी चाहिए। हाल के वर्षों में बीएसपी और उसके नेताओं की चर्चा बहुत कम हुई है (चुनावों को छोड़कर)। मायावती मीडिया और सोशल मीडियो दोनों ही जगहों पर बहुत कम दिखाई देती हैं। इसी बात का फायदा विपक्षी दलों ने उठाया है। दरअसल, बीएसपी और मायावती की सबसे बड़ी ताकत दलित वोट बैंक है। लेकिन अब बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए बीएसपी के वोटबैंक में सेंध लगाई है। चुनाव बाद कई आंकड़े सामने आए हैं, जिसमें दलितों के एक बड़े तबके ने बीजेपी को वोट किया है।
कौन कर रहा सेंधमारी?
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने भी दलित-पिछड़ा गठजोड़ बनाने की कोशिश की। इसके लिए सपा ने PDA का नारा ही दिया है, जिसमें डी का मतलब दलित है। इसका नतीजा ये हुए है कि बसपा का सॉलिड वोटबैंक पहले की तरह सॉलिड नहीं रहा बल्कि अब यह छिटकने लगा है। यूपी की सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने के लिए दलित वोट बैंक कितना अहम है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बसपा के साथ ही समाजवादी पार्टी और बीजेपी ने भी बाबा साहेब की जयंती पर मेगा इवेंट्स आयोजित किए। सपा ने गांव-गांव में पीडीए का झंडा बुलंद किया। दूसरी तरफ बीजेपी ने इसके लिए बड़ी तैयारी की थी। बीजेपी ने पूरे प्रदेश में 'युवा संवाद संगम' और मूर्ति सौंदर्यीकरण और 11 हजार दीप जलाने की बड़ी योजना चलाई।
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बसपा के चुनावी प्रदर्शन में गिरावट
पिछले आंकड़ों को देखें तो उत्तर प्रदेश में बसपा ने आखिरी बार 2007 के विधानसभा चुनाव में अपना सबसे बेस्ट प्रदर्शन किया था। इसके बाद 2012 के बाद से बसपा लगातार कमजोर हुई है। 2007 में 206 सीटें जीतने वाली बसपा को 2012 में 80 सीटें ही नसीब हुईं और उसका वोट प्रतिशत भी गिरकर 26 फीसदी पर आ गया, जो पिछले चुनाव में 30 फीसदी थी। इसके बाद पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य सीट पर सिमट गई। बसपा मायावती के नेतृत्व में 2017 का यूपी विधानसभा चुनाव भी बुरी तरह से हार गई।
2017 के चुनाव में पार्टी ने 2012 से भी खराब प्रदर्शन किया। बसपा को इस चुनाव में महज 19 सीटें ही मिलीं और उसका वोट प्रतिशत भी गिरकर 22 फीसदी पर आ गया। हालांकि, इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया और इस चुनाव में पार्टी के 10 सांसदों की जीत हुई। यह गठबंधन बहुत दिन तक नहीं चला और टूट गया।
बसपा ने 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भी पार्टी की दुर्दशा हुई। यूपी की सियायत में राज करने वाली बसपा महज एक सीट पर आकर सिमट गई। यही नहीं पार्टी का वोट प्रतिशत गिरकर 12.88 फीसदी पर आ गया। इस चुनाव में बीजेपी और सपा दोनों ने मिलकर बसपा के वोटबैंक में सेंधमारी की। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने 79 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। पार्टी का वोट प्रतिशत भी घटकर 9.39 फीसदी पर आ गया।
2027 के लिए कितनी तैयार बीएसपी?
बसपा को मायावती के नेतृत्व में चुनाव दर चुनाव बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा रहा है। लगातार हार मिलने से बसपा की विजयी पार्टी वाली छवि टूट गई है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2027 सर पर हैं। चुनाव में अब एक साल से भी कम समय बचा है। जब बीजेपी और सपा अपनी चुनावी कैंपेन को मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर मौजूद रहकर धार दे रही हैं तो ऐसे में बसपा और उसकी अध्यक्ष इन प्लेटफॉर्म पर बहुत कम सक्रिय हैं।
