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अपने नेताओं को छोड़ दूसरे दलों से आए नेताओं को CM क्यों बना रही BJP? समझिए

बीजेपी नेता सम्राट चौधरी बिहार के नए सीएम बन चुके हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत बीजेपी से नहीं की है लेकिन आज वह बिहार बीेजपी के शीर्ष नेता हैं। बीजेपी ने सम्राट के अलावा दूसरे दलों से आए कई अन्य नेताओं को भी सीएम बनने का मौका दिया है।

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सम्राट चौधरी, File Photo Credit: PTI

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बिहार में लंबे इंतजार के बाद आखिरकार भारतीय जनता पार्टी अपना मुख्यमंत्री बनाने में सफल रही है। कल यानी बुधवार 15 मार्च को बिहार राजभवन में राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। नए मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी के साथ ही सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर एक बार फिर चर्चा में बना हुआ है। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने उन्हें बधाई देते हुए उनका समाजवादी विचारधारा से पुराने रिश्ते की याद दिलाई। 

 

तेजस्वी यादव ने सम्राट चौधरी को 'प्रादुर्भाव से समाजवादी' बताकर बधाई दी। सम्राट चौधरी पहले लालू यादव की पार्टी में थे और उनके माता-पिता दोनों ही लालू यादव की पार्टी का हिस्सा रह चुके हैं। दोनों समता पार्टी से आरजेडी में आए थे। सम्राट चौधरी  आरजेडी, जेडीयू और हम से गुजरते हुए बीजेपी में आए हैं और आखिरकार अब उन्हें राज्य का सीएम बना दिया गया है। अन्य राज्यों में बीजेपी ने जहां अपनी पार्टी के टकसाली नेताओं और संगठन में काम करने वालों पर बल दिया वहीं बिहार में अल-अलग दलों से होकर आए सम्राट चौधरी को सीएम क्यों बना दिया, यह सवाल हर किसी के मन में है। 

 

यह भी पढ़ें: डिग्री, उम्र और परिवारवाद, सम्राट के CM बनने से BJP को सताते रहेंगे ये 3 सवाल 

क्यों बनाया सीएम?

सम्राट चौधरी को सीएम बनाना सिर्फ बीजेपी का नहीं बल्कि एनडीए गठबंधन का फैसला है। सीएम पद पर सम्राट की ताजपोशी के बाद बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने कहा, 'गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी के नाम का प्रस्ताव दिया है। हमारी त्याग, तपस्या और बलिदान से आज यह पल आया है।' विजय सिन्हा संघ के विचार के व्यक्ति हैं लेकिन पार्टी को जब सीएम के रूप में चुनने का मौका मिला तो पार्टी ने संघ के व्यक्ति के बजाय आरजेडी, जेडीयू से आए सम्राट चौधरी को चुना। इसका दर्द पार्टी के कार्यकर्ताओं में देखने को मिल रहा है। 

 

अब बीजेपी के इस फैसले पर बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि यह बीजेपी से ज्यादा नीतीश कुमार का फैसला है। जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार की इच्छा से ही सम्राट चौधरी सीएम बने हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, जेडीयू के नेता ललन सिंह ने पीएम मोदी से मिलकर उन्हें समझाया कि बीजेपी ने एक कुशवाहा नेता पर काफी निवेश किया है। ऐसे में अगर वह सम्राट चौधरी को सीएम नहीं बनाती तो कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा समाज में गलत मैसेज जाएगा। यानी नीतीश के आशीर्वाद के साथ-साथ सम्राट चौधरी की जाति ने भी उनके चयन में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, बीजेपी इसमें अपने मन की नहीं कर पाई ऐसे ज्यादातर राजनीतिक जानकारों का मानना है। 

हिमंत को बनाया सीएम?

यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने किसी दूसरी पार्टी से आए नेता को सीएम बनाया हो। इससे पहले भी कई राज्यों में ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें सबसे चर्चित नाम तो असम के सीएम हिमंत बिश्वा सरमा का है। हिमंत कांग्रेस के कद्दावर नेता थे और सीएम पद के दावेदार भी थे। सीएम पद ना मिलने के कारण वह कांग्रेस छोड़ बीजेपी में गए और आज सीएम के रूप में पांच साल पूरे कर चुके हैं। 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर हिमंत ने बीजेपी की जीत में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, उन्हें उस समय मंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा लेकिन पांच साल के इंतजार के बाद उन्हें वह मिला जिसका उन्हें लंबे समय से इंतजार कर रहे थे।

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2021 में हिमंत को सीएम के रूप में चुनना बीजेपी की रणनीति का हिस्सा था। हिमंत गौरव गोगोई के कट्टर विरोधी थे और बीजेपी की भाषा मुखरता से बोल रहे थे। उन्होंने साबित कर दिया था कि उनमें हर वह क्षमता है जो एक प्रखर नेता में बीजेपी को चाहिए थी। हिमंता बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की फर्स्ट चॉइस बन गए और 2021 में असम के सीएम चुन लिए गए। 

 

यह भी पढ़ें: बिहार में सम्राट युग की शुरुआत, निशांत डिप्टी CM क्यों नहीं बने? इनसाइड स्टोरी

अन्य किन नेताओं को और क्यों बनाया सीएम?

इन दो नामों के अलावा भी बीजेपी के हालिया इतिहास में कई ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपनी शुरुआत अन्य राजनीतिक विचारों या दलों से की थी। मणिपुर की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे एन बीरेन सिंह 2016 में बीजेपी में शामिल हुए थे और सिर्फ एक साल बाद ही बीजेपी ने चुनाव जीतने के बाद उन्हें सीएम बना दिया था। उनका बैकग्राउंड ना तो संघ का था और ना ही बीजेपी का। 2014 के बाद बीजेपी ने नेताओं को संदेश दिया कि अगर उनमें क्षमता है तो दूसरे दलों से आकर भी वह बीजेपी के सीएम बन सकते हैं। 2022 में भी बीजेपी ने एन बीरेन सिंह को ही सीएम बनाया। हालांकि, हिंसा के बाद उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। 

 

इसके बाद युमनाम खेमचंद को बीजेपी ने सीएम बनाया। उनका राजनीतिक बैकग्राउंड भी बीजेपी का नहीं है। वह भी 2013 में बीजेपी में शामिल हुए थे और आज मणिपुर के सीएम की कुर्सी पर बैठे हैं। इसके पीछे बीजेपी की रणनीति मानी जा रही है, जो अपना आधार बढ़ाने के लिए दूसरे दलों से आए नेताओं को मौका देने से पीछे नहीं हट रही है। 

 

पूर्वात्तर के एक अन्य राज्य अरुणाचल प्रदेश में भी बीजेपी ने दूसरे दलों से आए नेताओं को सीएम बनाया है। पेमा खांडू ने 2016 में बीजेपी का दामन थामा और बीजेपी ने उन्हें सीएम बना दिया। इसके बाद 2019 में और 2024 में भी बीजेपी ने उन्हें ही सीएम के रूप में चुना। इससे पहले बीजेपी ने गगोंप अपांग को भी बीजेपी की सत्ता की कमान सौंपी थी। इसके अलावा त्रिपुरा के मानिक शाह और कर्नाटक के पूर्व सीएम बसवराज बोम्मई को भी दूसरे दलों से लाकर सीएम की कु्र्सी पर बैठाया। 


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