आध्यात्मिक और धार्मिक परंपरा में सूर्यदेव की उपासना का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और इसी परंपरा का उदाहरण आदित्य हृदय स्तोत्र है। यह एक ऐसा शक्तिशाली स्तोत्र जिसे स्वयं भगवान राम ने अपने सबसे कठिन युद्ध से पहले जपा था। प्राचीन वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में वर्णित यह स्तोत्र आज भी संकट, तनाव और भय की स्थिति में विजय, मानसिक संतुलन और आत्मबल पाने का प्रमुख साधन माना जाता है।

 

नव ऊर्जा, आशा और सकारात्मकता के प्रतीक सूर्यदेव की महिमा का यह स्तोत्र न केवल शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला बताया गया है, बल्कि चिंता और शोक से मुक्ति, स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करने वाला भी माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब जीवन में विपरीत हालात आते हैं, चाहे वह युद्ध के मैदान की कठिनाई हो या हमारी रोजमर्रा की व्यक्तिगत चुनौतियां, आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ मनुष्य को आंतरिक शक्ति, आत्मविश्वास और स्पष्ट दिशा प्रदान कर सकता है। 

पूरा स्तोत्र अर्थ सहित

श्लोक 1

 

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥

 

अर्थ 


लंका युद्ध के दौरान भगवान श्रीराम निरंतर युद्ध करते-करते बहुत थक चुके थे। सामने रावण को युद्ध के लिए पूरी तैयारी के साथ खड़ा देखकर भगवान राम के मन में क्षणिक चिंता उत्पन्न हो गई। यह दर्शाता है कि मानव रूप में अवतरित भगवान भी परिस्थिति की गंभीरता को समझते हैं।

 

श्लोक 2

 

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥

 

अर्थ:


देवताओं के साथ महर्षि अगस्त्य युद्धभूमि में आए और प्रभु राम के पास जाकर उनसे संवाद किया। यह संकेत है कि देवता भी इस निर्णायक युद्ध की ओर दृष्टि लगाए हुए थे।

 

श्लोक 3

 

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥

 

अर्थ:


अगस्त्य मुनि बोले- हे महाबाहु राम! मैं तुम्हें एक ऐसा सनातन और रहस्यमय मंत्र बताता हूं, जिसके प्रभाव से तुम युद्ध में सभी शत्रुओं पर निश्चित विजय प्राप्त करोगे।

 

श्लोक 4

 

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥

 

अर्थ:


यह आदित्य हृदय स्तोत्र अत्यंत पवित्र है, सभी शत्रुओं का नाश करता है, विजय दिलाने वाला है और इसका जप कभी व्यर्थ नहीं जाता। यह कल्याणकारी और शुभ फल देने वाला है।

 

श्लोक 5

 

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥

 

अर्थ:


यह स्तोत्र सभी प्रकार के मंगल को बढ़ाने वाला, पापों का नाश करने वाला, चिंता-शोक को दूर करने वाला और आयु व स्वास्थ्य को बढ़ाने वाला श्रेष्ठ साधन है।

 

यह भी पढ़ें: नवग्रह मंदिर: जहां मंदिर में स्थित नौ शिवलिंग करते हैं नवग्रहों का प्रतिनिधित्व

 

श्लोक 6

 

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥

 

अर्थ:


हे राम! उदय होने वाले, प्रकाश से युक्त, देवताओं और असुरों के जरिए पूजित, सम्पूर्ण जगत के स्वामी सूर्यदेव की आराधना करो।

 

श्लोक 7

 

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥

 

अर्थ:


सूर्य सभी देवताओं के स्वरूप हैं। वे अत्यंत तेजस्वी हैं और अपनी किरणों से देव, असुर और सभी लोकों की रक्षा करते हैं।

 

श्लोक 8

 

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥

 

अर्थ:


सूर्य ही ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (पालन), शिव (संहार), स्कंद, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम और चंद्रमा के स्वरूप हैं।

 

श्लोक 9

 

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥

 

अर्थ:


सूर्य पितरों, वसुओं, साध्यों, अश्विनीकुमारों, मरुतों, मनु, वायु, अग्नि, प्राण और ऋतुओं के नियंता हैं।

 

यह भी पढ़ें: राम मंदिर में 22 जनवरी को हुई थी प्राण प्रतिष्ठा, फिर आज क्यों मना रहे वर्षगांठ?

 

श्लोक 10

 

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥

 

अर्थ:


सूर्य को आदित्य, सविता, भानु, दिवाकर कहा जाता है। उनका स्वरूप स्वर्ण जैसा तेजस्वी और ऊर्जा से भरपूर है।

 

श्लोक 11

 

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ ।

तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥

 

अर्थ

 

सात घोड़ों वाले सूर्य अंधकार का नाश करते हैं और सम्पूर्ण जगत को प्रकाश देते हैं।

 

श्लोक 12

 

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।

अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

 

अर्थ

 

सूर्य ही हिरण्यगर्भ हैं, ठंड को नष्ट करने वाले, अग्नि रूप और अदिति के पुत्र हैं।

 

श्लोक 13

 

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

 

अर्थ

 

वे आकाश के स्वामी हैं, अज्ञान को दूर करने वाले और वेदों के ज्ञाता हैं।

 

श्लोक 14

 

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।

कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

 

अर्थ

 

वे सबको तपाने वाले, मृत्यु के नियंत्रक, महान तेजस्वी और समस्त सृष्टि के मूल हैं।

 

श्लोक 15

 

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥

 

अर्थ:


हे सूर्यदेव! आप नक्षत्रों, ग्रहों और ताराओं के स्वामी हैं। आप पूरे विश्व का पालन-पोषण करने वाले हैं। आप तेजस्वियों में भी सबसे ज्यादा तेजस्वी हैं और आपके बारह स्वरूप हैं। आपको मेरा नमन है।

 

श्लोक 16

 

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥

 

अर्थ:


पूर्व दिशा के पर्वत को, पश्चिम दिशा के पर्वत को और प्रकाश के समस्त समूहों के स्वामी सूर्यदेव को नमस्कार है। हे दिन के स्वामी! आपको नमन है।

 

श्लोक 17

 

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥

 

अर्थ:


जो विजय दिलाने वाले हैं, मंगल करने वाले हैं और जिनके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है। हजारों किरणों वाले आदित्य को मेरा प्रणाम है।

 

श्लोक 18

 

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥

 

अर्थ:


हे उग्र, पराक्रमी और धनुर्धारी सूर्यदेव! आपको नमस्कार है। कमल को खिलाने वाले और अत्यंत प्रचंड स्वरूप वाले सूर्य को मेरा प्रणाम है।

 

श्लोक 19

 

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥

 

अर्थ:


आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी तेजस्वरूप हैं। देवताओं के भी देव हैं। सब कुछ भस्म करने वाले और रौद्र रूप धारण करने वाले सूर्यदेव को नमस्कार है।

 

श्लोक 20

 

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥

 

अर्थ:
जो अंधकार को नष्ट करने वाले, शीत को हरने वाले, शत्रुओं का नाश करने वाले हैं, जो कृतघ्नों को दंड देने वाले और ज्योतियों के स्वामी हैं, ऐसे सूर्यदेव को नमस्कार है।

 

श्लोक 21

 

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥

 

अर्थ:


तपाए हुए सोने के समान कांति वाले, संसार के रचयिता, अंधकार को नष्ट करने वाले और समस्त लोकों के साक्षी सूर्यदेव को प्रणाम है।

 

श्लोक 22

 

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥

 

अर्थ:


सूर्यदेव ही अंधकार को नष्ट करते हैं और प्रकाश की सृष्टि करते हैं। वही रक्षा करते हैं, वही तपन देते हैं और वही अपनी किरणों से वर्षा कराते हैं।

 

श्लोक 23

 

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥

 

अर्थ:


सूर्यदेव सोए हुए प्राणियों में भी चेतना बनाए रखते हैं और समस्त जीवों में स्थित हैं। यज्ञ और यज्ञ का फल भी वही प्रदान करते हैं।

 

श्लोक 24

 

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभुः ॥

 

अर्थ:


सभी देवता, यज्ञ, यज्ञों का फल और संसार में किए जाने वाले सभी कर्म इन सबके परम स्वामी सूर्यदेव ही हैं।

 

श्लोक 25

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥

 

अर्थ:


हे राघव! जो व्यक्ति संकट, कठिनाइयों, जंगल या भय की स्थिति में सूर्यदेव का स्मरण करता है, वह कभी भी दुखी या पराजित नहीं होता।

 

श्लोक 26

 

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥

 

अर्थ:


एकाग्रचित्त होकर देवों के देव और जगत के स्वामी सूर्यदेव की पूजा करो। इस स्तोत्र का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में निश्चित रूप से विजय प्राप्त करोगे।

 

श्लोक 27

 

अस्मिन्क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥

 

अर्थ:


हे महाबाहु राम! इसी क्षण तुम रावण का वध करोगे। ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य वहां से चले गए।

 

श्लोक 28

 

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥

 

अर्थ:


यह सुनकर तेजस्वी श्रीराम का शोक समाप्त हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्ध मन से इस स्तोत्र को धारण किया।

 

श्लोक 29

 

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥

 

अर्थ:


सूर्य की ओर देखकर इस स्तोत्र का जप करने से श्रीराम अत्यंत आनंदित हुए। उन्होंने तीन बार आचमन किया, शुद्ध होकर धनुष उठा लिया।

 

श्लोक 30

 

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥

 

अर्थ:


रावण को सामने देखकर श्रीराम विजय की भावना से भर गए और पूरे पराक्रम के साथ उसके वध में जुट गए।

 

श्लोक 31

 

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा… ॥

 

अर्थ:


सूर्यदेव राम को देखकर प्रसन्न हुए और देवताओं के बीच यह घोषणा की कि रावण का अंत निश्चित है।