सिख धर्म में पांच तख्तों का विशेष महत्व माना जाता है। सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने 15 जून, 1606 को अकाल तख्त की स्थापना की थी और यह सिख धर्म का पहला और सर्वोच्च तख्त है। सिख धर्म के पांचों तख्तों खासकर अकाल तख्त से दिए गए आदेश हर एक सिख के लिए बाध्यकारी होते हैं, फिर चाहे वह दुनिया के किसी भी हिस्से में रहते हों। इन तख्तों पर धर्म से जुड़े बड़े फैसले, मर्यादा और समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर विचार किया जाता है। इन पांचों तख्तों का संबंध सिख गुरुओं के इतिहास और उनकी शिक्षाओं से जुड़ा हुआ है।
सिख धर्म के पांच तख्तों की कहानी गुरु हरगोबिंद साहिब जी के समय से शुरू होती है। गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने 15 जून, 1606 को अकाल तख्त की स्थापना की थी। इसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में चार और तख्तों की स्थापना की गई। यह पांचों तख्त सिख धर्म में लौकिक सत्ता और धार्मिक अधिकार के सर्वोच्च केंद्र के हैं। यह पांचों तख्त मिलकर सिख धर्म की सर्वोच्च संस्थागत सत्ता का प्रतिनिधित्तव करते हैं।
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श्री अकाल तख्त साहिब
श्री अकाल तख्त की स्थापना 1606 में श्री हरमंदिर साहिब के सामने की गई थी। इसे गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने स्थापित किया था। गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने इसे 1606 में राजनीतिक संप्रभुता के प्रतीक के रूप में और एक ऐसे स्थान के रूप में स्थापित किया था जहां सिख सुमदाय आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों चिंताओं का समाधान कर सके। यह स्थान सिख धर्म में सबसे महत्वपूर्ण तख्त माना जाता है।
गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने यहां से सिखों को धर्म की रक्षा और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संदेश दिया। अकाल तख्त पर धार्मिक मामलों के साथ-साथ समाज से जुड़े फैसले भी लिए जाते रहे हैं। यहां से जारी आदेशों को सिख समुदाय में विशेष महत्व दिया जाता है। सिखों में इस तख्त का सबसे अधिक महत्व है।
तख्त श्री केसगढ़ साहिब, आनंदपुर साहिब
तख्त श्री केसगढ़ साहिब पंजाब के आनंदपुर साहिब में स्थित है। यह स्थान दसवें सिख गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसी जगह पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 ईसवीं की बैशाखी पर खालसा पंथ की सथापना की। वैशाखी के दिन, 14 अप्रैल 1699 को, दसवें गुरु ने अपने प्राणों की आहुति देने के इच्छुक स्वयंसेवकों को आमंत्रित किया। उनके पांच शिष्य आगे आए और गुरु गोविंद सिंह जी ने उन्हें अमृत पिलाकर खालसा की स्थापना की। खालसा पंथ की शुरुआत के कारण यह स्थान सिख इतिहास में विशेष महत्व रखता है और इसे खालसा की जन्मभूमि माना जाता है।
तख्त श्री दमदमा साहिब, तलवंडी साबो
तीसरा तख्त श्री दमदमा साहिब पंजाब के तलवंडी साबो में स्थित है। यह स्थान गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि यहां गुरु जी ने समय बिताया और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन और लेखन का कार्य किया। इसी वजह से तलवंडी साबो को सिख इतिहास में ज्ञान और शिक्षा के केंद्र के रूप में भी देखा जाता है। बाद में इसे पांच प्रमुख तख्तों में शामिल किया गया।
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तख्त श्री पटना साहिब, बिहार
चौथा तख्त श्री पटना साहिब बिहार में स्थित है। यह स्थान गुरु गोबिंद सिंह जी की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध है। गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म साल 1666 में पटना साहिब में हुआ था। सिख समुदाय के लिए यह स्थान गुरु जी के बचपन और जीवन से जुड़ी यादों के कारण बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। पटना साहिब सिख समुदाय के लिए एक बड़ा धार्मिक केंद्र है। देश और दुनिया से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
तख्त श्री हजूर साहिब, महाराष्ट्र
पांचवां तख्त श्री हजूर साहिब महाराष्ट्र के नांदेड़ में स्थित है। इसका संबंध गुरु गोबिंद सिंह जी के अंतिम समय से जुड़ा हुआ है। साल 1708 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने नांदेड़ में अंतिम समय बिताया था। अक्टूबर 1708 में, जब यह स्पष्ट हो गया कि गुरु गोविंद सिंह जी पहले हुए एक हत्या के प्रयास में बच नहीं पाएंगे, तो उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को अपना शाश्वत उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। महाराजा रणजीत सिंह ने 1832 और 1837 के बीच मौजूदा सरंचना का निर्माण करवाया। तख्त में गुरु ग्रंथ साहिब और दशम ग्रंथ, साथ ही दसवें गुरु के पवित्र अवशेष रखे हुए हैं। यहां स्थित गुरुद्वारा हजूर साहिब सिखों के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है।
कैसे होता है पांचों तख्तों का काम?
सिख धर्म के पांचों तख्त धार्मिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां सिख मर्यादा, परंपराओं और समुदाय से जुड़े विषयों पर विचार किया जाता है। पांचों तख्तों के जत्थेदार सिख समुदाय के धार्मिक नेतृत्व में अहम भूमिका निभाते हैं। अलग-अलग तख्तों से जुड़े धार्मिक कार्यक्रम और फैसले सिख समाज के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अकाल तख्त को सबसे ऊंचा धार्मिक स्थान माना जाता है। यहां से जारी होने वाले आदेशों और फैसलों को सिख समुदाय में विशेष सम्मान मिलता है और सिखों के लिए बाध्यकारी भी होता है। गुरु परंपरा के बाद अब सिख धर्म में इन्हीं तख्तों का फैसला सर्वोच्च माना जाता है।


