बांग्लादेश में तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली है। पिछले कुछ महीनों से शेख हसीना की सरकार के अपदस्थ होने के बाद से ही देश की बागडोर मोहम्मद यूनुस के हाथों में थी। वह अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में काम कर रहे थे। हालांकि, बांग्लादेश में हुए आंदोलन के बाद से ही न सिर्फ वहां की आर्थिक स्थिति काफी खराब बो गई बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचा है।

 

एक समय में दक्षिण एशिया की तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने वाले बांग्लादेश के सामने आज एक बुनियादी सवाल खड़ा है क्या नई सरकार आर्थिक सुधारों के माध्यम से राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित कर पाएगी, या आर्थिक दबाव सामाजिक-राजनीतिक संकट को और गहरा देंगे? पिछले डेढ़ दशक में बांग्लादेश ने 6–7 प्रतिशत औसत GDP वृद्धि दर्ज की है, रेडीमेड गारमेंट (RMG) निर्यात में वैश्विक पहचान बनाई है और सामाजिक सूचकांकों में काफी सुधार दर्ज किए हैं।

 

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हालांकि, इस आंदोलन के बाद से  विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट देखी गई, टका पर दबाव बढ़ा, फ्यूल में महंगाई और निर्यात बाज़ारों में अनिश्चितता ने आर्थिक स्थिरता को चुनौती दी है, तो देखते हैं कि बांग्लादेश के सामने कौन कौन सी चुनौतियां हैं और क्या वह इन पर खरा उतर भी पाएगा?

विदेशी मुद्रा भंडार कम हुआ

हाल के वर्षों में विदेशी मुद्रा भंडार में काफी कमी आई है। ऊर्जा, खाद्य और कच्चे माल के आयात बिल ने भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ाया। टका की गिरावट ने आयातित महंगाई को और तेज़ किया। IMF से लोन लेना अल्पकालिक सोल्यूशन हो सकता है लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।

 

आंकड़ों की बात करें तो बांग्लादेश में पिछले पांच सालों में विदेशी मुद्रा भंडार में तेजी से गिरावट देखी गई है। 2011 में यह 46 अरब डॉलर था जो कि 2022 में घटकर 34 अरब डॉलर रह गया। इसकेबाद 2023 में विदेशी मुद्रा भंडार 21 अरब डॉलर रह गया और 2024 में इसमें थोड़ी सी गिरावट आई और यह 21.39 अरब डॉलर रह गया।

 

अब ऐसी स्थिति में विदेशों से आयात को बनाए रखने के लिए तारिक रहमान को विदेश मुद्रा भंडार को बढ़ाना पड़ेगा। यह काफी बड़ा चैलेंज है क्योंकि बांग्लादेश के अंदर भी व्यापार की स्थिति काफी खराब हो चुकी है ऐसे में बांग्लादेश काफी चीजों के लिए आयात पर निर्भर रहेगा।

कपड़ों का व्यापार

बांग्लादेश का लगभग 80% रेडीमेड कपड़ा निर्यात किया जाता है, जो मुख्यतः यूरोप और अमेरिका को भेजा जाता है। ऐसे में वैश्विक मांग में थोड़ी गिरावट भी उत्पादन, रोजगार और विदेशी मुद्रा पर सीधा असर डालती है। ऐसे में फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाएं, इंजीनियरिंग और जहाज निर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश; क्षेत्रीय व्यापार समझौतों का विस्तार होने में दिक्कत होती है।


रेडीमेड कपड़ों का व्यापार बांग्लादेश की बैकबोन है, ऐसे में इसे फिर से पटरी पर लाना होगा।

महंगाई एक बड़ी चुनौती

खाने-पीने की चीजों और प्यूल की महंगाई ने निम्न-मध्यम वर्ग के लिए काफी परेशानी पैदा की है। शहरी बेरोज़गारी और वास्तविक आय में गिरावट से लोगों में असंतोष पनप सकता है, जिसे नियंत्रित करना काफी मुश्किल होगा।


हालांकि, यह राहत देने का काम तारिक रहमान को राजकोषीय घाटा बढ़ाए बिना करना होगा। हालांकि, इसके लिए सब्सिडी से ज्यादा छोटे उद्योगों को सस्ता ऋण उपलब्ध करा के करना होगा।।

बैंकों की कमजोर हालत

पिछले पांच सालों में बांग्लादेश में एनपीए बहुत तेजी से बढ़ा है। साल 2021 में एनपीए 6-8 प्रतिशत था, 2022 में 8.72 प्रतिशत था, 2023 में 9.57 प्रतिशत था। हालांकि, 2024 में यह बढ़कर लगभग 20.2 प्रतिशत हो गया और 2025 में यह बढ़कर 24. 1 हो गया। ऐसे में यदि बैंकिग सिस्टम में या वित्तीय सुधार नहीं किए गए तो स्थिति काफी खराबा हो जाएगी।

 

इसके लिए सरकार को बैंकों की मॉनीटरिंग को बेहतर बनाना होगा, टैक्स-जीडीपी अनुपात को बेहतर रखना हो, सार्वजनिक उपक्रमों में पारदर्शी बनाना होगा। हालांकि, शुरुआत में यह काफी मुश्किल कदम होगा क्योंकि बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता है लेकिन लंबे समय में यह काफी आवश्यक है।

राजनीतिक अस्थिरता

आर्थिक सुधार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है राजनीतिक वातावरण। इसलिए राजनीतिक वातावरण को बेहतर बनाना होगा। हालांकि, यह मौजूदा सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी क्योंकि अभी चुनाव के नतीजे आए हैं और जमात-ए-इस्लामी ने कुछ सीटों पर धांधली किए जाने के आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं।

 

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इसके अलावा बांग्लादेश को पड़ोसियों से भी अपने संबंध बेहतर बनाने होंगे। भारत और चीन दोनों बांग्लादेश में बड़े निवेशक और साझेदार हैं। ऐसे में भारत के साथ ऊर्जा, कनेक्टिविटी और बिजली व्यापार के अवसर हैं, जबकि चीन बुनियादी ढांचे में निवेश करता रहा है। इन दोनों अवसरों का उपयोग अगर बांग्लादेश कर पाता है तो उसके लिए बेहतर आर्थिक प्रगति के रास्ते खुल सकते हैं।

 

हालांकि, बात यह भी है कि यदि सुधारों को टाला गया, मुद्रा पर दबाव और महंगाई बढ़ती रही और वित्तीय पारदर्शिता नहीं आई तो संकट गहरा सकता है, जिसका असर अर्थव्यवस्था पर काफी गहरा होगा।