लगभग तीन साल बीत जाने के बाद भी मणिपुर में हिंसा जारी है। राज्य में फैली यह अशांति कब कर सामान्य होगी, यह ना तो केंद्र सरकार और ना ही मणिपुर सरकार को मालूम है। हालांकि केंद्र की मोदी सरकार राज्य में शांति बहाल करने के लिए लगातार कोशिशें कर रही है लेकिन उसे अभी तक कामयाबी नहीं मिली है। इन्हीं कोशिशों में केंद्र सरकार ने मणिपुर में स्थितियां सामान्य करने के लिए 4 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति शासन हटाते हुए एक बार फिर से नई सरकार के गठन की कवायद शुरू की। इसके बाद बीजेपी के युमनाम खेमचंद सिंह ने 4 फरवरी को ही मणिपुर के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली।
एक ही दिन में इन दो बड़े फैसलों के बाद लगा कि मणिपुर में शांति बहाल हो जाएगी, लेकिन इन घटनाक्रमों के बीच 5 फरवरी को एक बार फिर से मणिपुर में हिंसा भड़क उठी। दरअसल, बीजेपी ने खेमचंद सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई तो, सरकार को चार कुकी-जो समुदाय के विधायकों ने अपना समर्थन दिया। कैबिनेट में कुकी-जो और नागा प्रतिनिधियों को शामिल कर जातीय संतुलन बनाने की कोशिश की गई, लेकिन इससे हिंसा फिर भड़क उठी।
5 फरवरी को अचानक फैली हिंसा
मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में 5 फरवरी को अचानक से विरोध-प्रदर्शन होने लगे, जिससे तुइबोंग इलाके में तनाव बढ़ गया। प्रदर्शनकारियों ने राज्य में नई बनी बीजेपी की खेमचंद सिंह सरकार का खुलकर विरोध शुरू कर दिया। प्रदर्शन की वजह से पूरे दिन हालात खराब हैं। हालात को बिगड़ने से रोकने के लिए नई नवेली सरकार ने भारी सिक्योरिटी फोर्सेज को तैनात करना पड़ा।

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ऐसे में भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के सामने मणिपुर में हालात को फिर से सामान्य करना बड़ी चुनौती बनी हुई है। मणिपुर संकट बीजेपी के लिए कितना बड़ा है? यह पूर्वोत्तर के लिए आज सबसे बड़ा सवाल है। मोदी मोदी सरकार इस संकट से कैसे निपटेगी? आइए जानते हैं...
मणिपुर संकट में अबतक सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों की तादात में लोगों का विस्थापन हुआ है। मगर, सेंट्रल फोर्सेज के हजारों जवानों की तैनाती भी राज्य में नॉर्मलेंसी नहीं ला सकी है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो बीजेपी के लिए राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा चुनौती बना हुआ है। यह संकट बीजेपी की छवि, चुनावी प्रदर्शन और शासन क्षमता पर गहरा असर डाल रहा है।
बीजेपी के लिए कितना बड़ा संकट?
बीजेपी के लिए यह संकट बहुआयामी हैं। मणिपुर संकट बीजेपी के लिए इतना बड़ा है कि यह पार्टी की राष्ट्रीय छवि और उत्तर-पूर्व की राजनीति को प्रभावित कर रहा है। इस संकट की वजह से पूर्वोत्तर के साथ में राष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचनाओं की सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस के साथ में समूचा विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा रहे हैं कि लगभग तीन सालों में वह मणिपुर का एक दौरा नहीं कर सके हैं।
मणिपुर में अशांति की वजह से ही 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी मणिपुर की दोनों लोकसभा सीटें हार गई। पार्टी के हारने के पीछे राज्य में जारी संघर्ष को ही माना गया। यह हार पार्टी के लिए किसी झटके से कम नहीं था, क्योंकि राज्य में बीजेपी की सरकार थी।

इसके अलावा मणिपुर में अगले साल 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। वर्तमान में बीजेपी के पास 60 सदस्यीय विधानसभा में 37 विधायक हैं, लेकिन असल में जमीन पर पार्टी के लिए समर्थन कमजोर होता जा रहा है। बीजेपी ने एक बार फिर से राज्य में नई सरकार बनाने की कवायद शूरू तो जरूर की, मगर सरकार गठन के बाद ही हिंसा फैल गई। कांग्रेस ने बीजेपी के इस कदम को सत्ता की भूख कहा।
राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां
दरअसल, बीजेपी की केंद्र और राज्य सरकारों पर आरोप है कि उन्होंने संकट को समय पर नहीं संभाला। कांग्रेस सांसद बिमोल अकोइजाम जैसे नेताओं ने कहा है कि विधायकों ने जनता का विश्वास खो दिया है और दिल्ली से निर्देशित सरकार समस्या हल नहीं कर सकती।
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कुकी-जो समुदाय अलग प्रशासन की मांग कर रहा है, जो बीजेपी की एकता वाली नीति से टकराती है। पार्टी के अपने विधायक बागी हो सकते हैं। 2026-27 बजट में मणिपुर के लिए कोई विशेष पैकेज नहीं, जो राहत, पुनर्वास या पुनर्निर्माण की कमी को दर्शाता है। इससे विपक्ष को हमला करने का मौका मिलेगा।
इस संकट ने बीजेपी की 'डबल इंजन सरकार' की छवि को नुकसान पहुंचाया है। सोशल मीडिया और संसद में आलोचना हो रही है कि पार्टी चुनावी फायदे के लिए राज्य को जलने दे रही है। साथ ही यह उत्तर-पूर्व में बीजेपी की विस्तार नीति पर असर डाल रही है।
मणिपुर संकट की वजह
मणिपुर संकट 3 मई, 2023 से अबतक जारी है। इस हिंसा की मुख्य वजह मेतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा है। दरअसल, मणिपुर हाई कोर्ट ने 27 मार्च 2023 को राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने पर विचार करने का निर्देश दिया था। इससे कुकी और अन्य आदिवासी समुदायों में विरोध बढ़ गया। कुकी समुदाय को डर सताने लगा कि इससे उनकी जमीन और आरक्षण प्रभावित होगा। 3 मई 2023 को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन मणिपुर ने पहाड़ी जिलों में 'आदिवासी एकजुटता मार्च' निकाला था।
इन सबके बीच बीजेपी को कुकी और मेतेई समुदायों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाकर बात करनी होगी और उनसे राज्य में शांति कायम रखने की अपील करनी होगी। इसके लिए बीजेपी को हर उस तरीके का सहारा लेना होगा, जो राज्य के हित के लिए ठीक हो। साथ ही पार्टी को इस समय नफा-नुकसान को किनारे रखते हुए विपक्ष को भी विश्वास में लेना होगा।
