ज्यूरिसप्रूडेंस या न्यायशास्त्र में एक सिद्धांत है, 'न्याय में देरी, न्याय से वंचित होने के समान है।' कई बार, अदालतों को सच तक पहुंचने में इतना वक्त लग जाता है कि जिस व्यक्ति पर आरोप लगते हैं, वह बेदाग निकलता है लेकिन उसे जेल की सलाखों के भीतर रहना पड़ता है। ऐसे एक नहीं, कई मामले हैं, जब आरोपी, व्यवस्थाओं का शिकार होता है, परेशान होता है, जब तक न्याय होता है, वह बहुत कुछ खो चुका होता है। अगर कुछ न भी खोए तो सूरदास की एक कहावत का उस पर असर तो हो ही चुका होता है-

'काजल की कोठरी में कैसो हूं सयानो जाए, एक लीक काजर की लागि है पे लागि है।'

सार्वजनिक जीवन में जब आरोप लगते हैं तो उनसे पीछा छुड़ाना, लगभग असंभव हो जाता है। अदालतें बरी भी कर दें लेकिन जनता बरी नहीं कर पाती है। दोषमुक्ति को 'बड़ी पहुंच' का नतीजा माना जाता है। हो भी क्यों न, भ्रष्टाचार कुछ इस हद तक, समाज में घुला-मिला है।

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लेकिन आज हम इसका जिक्र क्यों कर रहे हैं? वजह क्या है, आइए समझते हैं-

दिल्ली आबकारी नीति केस, केजरीवाल और सिसोदिया

अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को हाल ही में दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली आबकारी नीति केस में हुए कथित घोटाला कांड से आरोप मुक्त किया था। आरोपमुक्त होने का मतलब यह था कि जांच एजेंसियां, यह साबित ही नहीं कर पाईं कि भ्रष्टाचार में इनकी संलिप्तता थी। 27 फरवरी 2026 को आए इस फैसले पर हर कोई चौंक गया था। सबके मन में यह सवाल था कि अगर कोई आरोप ठहरता ही नहीं तो फिर मनीष सिसोदिया 17 महीने और अरविंद केजरीवाल 150 दिनों से ज्यादा वक्त तक, जेल में क्यों रहे।

तत्कालीन आम आदमी पार्टी सरकार ने 17 नवंबर 2021 को दिल्ली के लिए नई आबकारी नीति (2021-22) लागू की थी। जुलाई 2022 में दिल्ली के तत्कालीन मुख्य सचिव नरेश कुमार ने उपराज्यपाल वीके सक्सेना को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें भ्रष्ट्राचार के आरोप लगाए गए। 17 अगस्त 2022 को CBI ने केस दर्ज किया।

ED ने मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज किया। 31 जुलाई 2022 तक यह नीति रद्द हो गई, पुरानी व्यवस्था लागू की गई। आरोप लगे कि 100 करोड़ का यह घोटाला है, अरविंद केजरीवाल इस घोटाले के 'मुख्य साजिशकर्ता' हैं। मनीष सिसोदिया 17 महीने, अरविंद केजरीवाल 150 दिनों से ज्यादा जेल में रहे। राउज एवेन्यू कोर्ट ने केस ही डिसार्ज कर दिया। अगली सुनवाई 16 मार्च को है। ईडी केस अभी हाई कोर्ट में लंबित है।  

 

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गुरमीत राम रहीम सिंह और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड मामले में बरी कर दिया। CBI स्पेशल कोर्ट ने गुरमीत को हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। वह सजा सुनाए जाने के 7 साल बाद बरी हो गया। वह अभी जेल में ही है और 2017 में उसके खिलाफ अपनी 2 शिष्याओं के साथ बलात्कार के दोष में 20 साल की सजा मिली थी।

मई 2024 में हाई कोर्ट ने CBI स्पेशल कोर्ट के एक और फैसले को पलट दिया था। साल 2002 में डेरा के पूर्व प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या के मामले में राम रहीम और चार अन्य को बरी किया गया था। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को अक्टूबर 2002 में उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी। वह पूरा सच नाम से अखबार निकालते थे। उनके अखबार में महिला अनुयायियों की गुमनाम चिट्ठियां प्रकाशित हुईं थीं, जिनमें यौन शोषण का जिक्र था। पत्रकार की हत्या हुई थी। राम रहीम आरोपी था, 2006 में केस की जांच CBI ने संभाली। 2019 में CBI स्पेशल कोर्ट ने उसे दोषी माना र उम्रकैद की सजा सुना दी।

 

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निठारी कांड: नरभक्षी, लाश से रेप, बच्चों के कंकाल, दोषी 'आजाद'

साल 2006 की बात है। नोएडा के निठारी गांव में अचानक बच्चे और लड़कियां लापता होने लगीं। कई पीड़ित परिवार बताते हैं कि लोग पुलिस के पास जाते, शिकायत करते, पुलिस नजर अंदाज करती रही। पुलिस यह मानने को तैयार तक नहीं थी कि ऐसा कोई मामला हुआ होगा।

स्थानीय विरोध और हंगामे के बाद जांच शुरू हुई। मोनिंदर सिंह पंधेर के घर डी-5 के पीछे के नाले से करीब 19 कंकाल बरामद हुए। मोनिंदर सिंह पंधेर और उसका नौकर सुरिंदर कोली गिरफ्तार हुआ। यह मामला इतना सुर्खियों में रहा कि यूपी पुलिस की खूब आलोचना हुई। केस की जिम्मेदारी CBI को सौंपी गई। CBI को कई नर कंकाल, मानव अंग, 40 से ज्यादा पैकेट मिले, जिनमें शरीर के हिस्से थे।

मोनिंदर सिंह पंधेर और उसका नौकर सुरिंदर कोली केस के गुनाहगार माने गए। सुरिंदर कोली ने पुलिस के सामने कबूला कि उसने कई बच्चों और लड़कियों को लालच देकर घर में बुलाया, गला दबाकर मार डाला, उनके साथ गलत काम किए, शरीर के टुकड़े किए और नाले में फेंक दिए। लाश के साथ रेप किया।

कुछ रिपोर्ट में दावा किया गया कि सुरिंदर कोली नरभक्षी था। इस मामले में 16 से 19 केस दर्ज हुआ। सुरिंदर कोली को 13 मामलों में मौत की सजा सुनाई। मोनिंदर सिंह पंधेर को भी सजा मिली। अदालती कार्यवाही में यह सामने आया कि यहां जांच में बहुत गड़बड़ियां थीं। पुलिस ने देर से केस दर्ज किया। सबूत ठीक से नहीं इकट्ठा किए। कबूलनामा जबरदस्ती लिया गया लगता था। कोई मेडिकल चेकअप नहीं हुआ, अंग व्यापार की बातें साबित नहीं हो पाईं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2023 में कोली को 12 मामलों में बरी कर दिया और मोनिंदर सिंह पंधेर को पहले ही बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2025 में हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंदर कोली की क्यूरेटिव पिटीशन भी मान ली, उसे बरी कर दिया। 19 साल जेल में रहने के बाद सुरेंद्र कोली नवंबर 2025 में जेल से आजाद हो गया। मोनिंदर सिंह पंधेर भी 2023 में छूट चुका था।

अगर सुरिंदर कोली दोषी नहीं था, पंधेर दोषी नहीं था तो दोषी कौन था? सच साबित करने की जिम्मेदारी किसकी थी। परिवार वाले आज भी दुखी हैं। उनका कहना है कि अगर इन दोनों ने हत्या नहीं की तो किया किसने? सच कौन छुपा रहा है? आज तक असली हत्यारा पकड़ा नहीं गया?

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2G स्पेक्ट्रम घोटाला, ए राजा की खिंचाई और 14 बरी

2जी स्पेक्ट्रम को भारत का सबसे बड़ा घोटाला माना जाता था। साल 2010 में महालेखाकार और नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि साल 2008 में हुआ स्पेक्ट्रम आवंदन संदेहास्पद है। 2जी स्पेक्ट्रम स्कैम में कंपनियों को नीलामी नहीं 'पहले आओ और पहले पाओ' की नीति पर लाइसेंस दिया गया। इस फैसले से 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये का अनुमानित नुकसान सरकार को हुआ। प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्री पी चिदंबरम तक पर सवाल उठे। CBI ने पूर्व दूर संचार मंत्री ए राजा इस केस के मुख्य आरोपी बने। 15 महीनों तक जेल में रहे, तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की बेटी कनिमोझी तक जेल में रहीं। इनके अलावा तत्कालीन दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा, आरके चंदोलिया, शाहिद बलवा, सजंय चंद्रा, विनोद गोयंका, गौतम दोषी, सुरेंद्र पिपारा और हरि नायर सहित 14 अन्य आरोपी जेल तक पहुंचे। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने 14 आरोपियों और 3 कंपनियों को बरी कर दिया।

कॉमवेल्थ स्कैम, कांग्रेस की बदनामी का हिसाब क्या है?

साल 2010 में भारत में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हुआ था। CAG रिपोर्ट और आरोपों के आधार पर CBI ने इस केस में 12 से ज्यादा केस दर्ज किए।  आरोप लगे कि टेंडर देने में धांधली बरती गई। साल 2010 में केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार थी। मनमोहन सिंह तब प्रधानमंत्री थे और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री। कॉमनवेल्थ गेम्स की ऑर्गेनाइजिंग कमेटी के हेड सुरेश कलमाड़ी, ललित भनोट और कई अन्य लोग जांच के दायरे में आए।

 

अप्रैल 2011 तक सुरेश कलमाड़ी को बर्खास्त कर दिया गया। जेल भेज दिया गया। जनवरी 2012 तक वह जेल में रहे। मई में तत्काल CBI ने सुरेश कलमाड़ी और 10 अन्य लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। जनवरी में 2012 में सुरेश कलमाड़ी को जमानत मिल गई। करीब 7 महीने बाद CBI के भ्रष्टाचार और पैसों के अवैध लेन-देन को लेकर ईडी ने भी केस दर्ज कर लिया। कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के ऐसे संगीन आरोप लगे कि सरकार की मुश्किलें बढ़ गईं।

जनवरी 2014 तक CBI कोर्ट में सबूत नहीं दे पाई, क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी पड़ी। अप्रैल 2025 में ईडी को मनी लॉन्ड्रिंग में सबूत नहीं ढूंढ पाई, अदालत में क्लोजर रिपोर्ट फाइल हुई। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज संजीव अग्रवाल ने ईडी की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया।

कोर्ट ने कहा कि ED की गहन जांच के बावजूद PMLA का कोई अपराध नहीं बना, इसलिए केस आगे नहीं चल सकता। सवाल यह उठा कि अगर कुछ था ही नहीं तो इतना बड़ा सियासी बवंडर मचा क्यों?
 

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आरुषि हेमराज मर्जर केस और बरी तलवार दंपति

नोएडा में साल 2008 में हुए एक हत्याकांड ने देशभर को हिलाकर रख दिया था। 14 साल की आरुषि की गला रेतकर हत्या हुई थी। पहले शक हुआ कि आरुषि के घर नौकर के तौर पर काम करने वाले हेमराज ने उसकी हत्या की लेकिन उसी की लाश घर के छत पर मिली। दोनों की हत्या के आरोप डॉ. राजेश तलवार और डॉ. नूपुर तलवार पर लगे। दोनों की बेटी आरुषि थी।

CBI की जांच में यह सामने आया कि तलवार दंपति दोषी हैं। साल 2013 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आरोप लगे कि उन्होंने आरुषि और हेमराज को शारीरिक संबंध बनाते देख लिया था, इसलिए मार डाला। माता-पिता पर बेटी के कत्ल के आरोप ट्रायल कोर्ट में सच साबित हुए। यह मामला हाई कोर्ट में गया। साल 2017 में हाई कोर्ट ने कहा कि सबूत अपर्याप्त थे, CBI सच साबित नहीं कर पाई। अभियुक्तों को संदेह का लाभ मिला। तलवार दंपति बरी हो गए। यह आज तक पता नहीं चल पाया कि हत्यारा कौन था।

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सलमान खान और हिट एंड रन केस

28 सितंबर, 2002 को सलमान खान की BMW कार, बांद्रा की फुटपॉथ पर सोए 5 लोगों पर चढ़ गई थी। एक शख्स की मौत हो गई थी, वहीं 4 लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे। यह तथ्य सामने आया कि सलमान खान नशे की हालत में गाड़ी चला रहे थे। सलमान ने इसे खारिज किया। 13 साल तक यह केस चलता रहा। हर दिन यह केस सुर्खियों में रहा। सलमान खान जेल पहुंचे, बाहर आए, गिरफ्तारी की तलवार लटकती रही।

सेशन कोर्ट ने उन्हें 5 साल की सजा सुनाई। सलमान खान ने अपील की। बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिसंबर 2015 में फैसला सुनाया कि केस का मुख्य गवाह पूरी तरह भरोसेमंद नहीं था। उसकी गवाही में कई कमियां थीं और कोई दूसरा गवाह उसकी बात की पुष्टि नहीं कर सका। कोर्ट ने कहा कि ये साबित नहीं हो सका कि सलमान ही शराब पीकर गाड़ी चला रहे थे। सलमान बरी हो गए।