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जरूरत है या मजबूरी, आखिर मैन्युफैक्चरिंग पर इतना जोर क्यों दे रहा भारत?

इस साल के बजट में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने पर खास जोर दिया गया है। लक्ष्य है कि आने वाले समय में न सिर्फ घरेलू इस्तेमाल की चीजों की मैन्युफैक्चरिंग की जाए बल्कि निर्यात की जाने वाली चीजें भी बनाई जाएं।

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मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दे रहा है भारत। Photo Credit- Khabargaon

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब 1 फरवरी को बजट पढ़ना शुरू किया तो कुछ ही देर में एक कीवर्ड चमका और वह था- मैन्युफैक्चरिंग। जब बजट भाषण खत्म हुआ और निष्कर्ष निकाले जाने लगे तो तमाम पहलुओं में एक यह था कि भारत अब मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने पर जोर देगा। इसका मतलब हुआ कि जिन चीजों को विदेश से मंगाया जाता है, उन्हें अपने ही देश में बनाया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि इससे डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं की धमकियां बेअसर की जा सकेंगी और आए दिन आंख दिखाने वाले चीन पर निर्भरता भी कम होगी। 

 

यही वजह थी कि अपने बजट भाषण में निर्मला सीतारमण ने कहा, 'हमारा पहला कर्तव्य मैन्युफैक्चरिंग और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाते हुए आर्थिक विकास को तेज और सतत बनाए रखना और विश्व में बदल रही परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता को विकसित करना है।'

 

कमोबेश ऐसी ही एक शुरुआत 12 साल पहले यानी साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। तमिलनाडु के तिरुपुर से 'मेक इन इंडिया' मिशन की शुरुआत की गई। ख्वाब यही अब वाला ही था कि मैन्युफैक्चरिंग के मामले में भारत आत्मनिर्भर बने। इसी क्रम में साल 2025-26 के बजट में नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन की शुरुआत की गई। इस एक दशक के आंकड़े देखें तो इलेक्ट्रॉनिक सामान जो उत्पादन साल 2014-15 में 1.9 लाख करोड़ रुपये का था, वह 2024-25 में बढ़कर 11.3 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इसका असर निर्यात में भी दिखा और 8 गुना की बढ़ोतरी आई। ऐसी ही रफ्तार मोबाइल फोन निर्माण और फार्मा सेक्टर में भी देखी गई। हालांकि, अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।

 

मैन्युफैक्चरिंग के बारे में भारत के पीछे रह जाने के मामले पर भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन अपनी किताब 'A Sixth of Humanity' पर एक चर्चा के दौरान कहते हैं, 'सरकारी नौकरियों में ज्यादा सैलरी मिलने के चलते लोग मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम करने से बचते हैं। इसका नतीजा होता है कि चीजों की कीमत बढ़ती है और यह सेक्टर कमजोर हो जाता है।'

 

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मैन्युफैक्चरिंग में भारत कहां पिछड़ रहा है, कितना सुधार हुआ है और कितना बाकी है और जो प्रयास हो रहे हैं वे कितने प्रभावी हैं, आइए इन सबके बारे में  समझते हैं।

क्या है मैन्युफैक्चरिंग और क्यों जरूरी है?

 

एकदम आसान भाषा में समझिए तो मामला यह है कि सुबह से शाम तक हम जितनी चीजों का इस्तेमाल करते हैं, अगर हम उन सबको अपने देश में बना सकें तो मामला दुरुस्त समझा जाएगा। आपको अगर लगता है कि सबकुछ इधर ही तो बनता है तो आइए आपकी आंखें खोल देते हैं। सबसे पहले आप अपनी दिनचर्या में इस्तेमाल होने वाली चीजें देखिए। टूथब्रश, पेस्ट, साबुन, शैंपू, खाने-पीने की चीजें, खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला तेल, कपड़े, गहने, जूते, गाड़ी, गाड़ी का तेल मोबाइल और बिस्तर आदि।

 

इसमें से भारत सबसे ज्यादा कच्चे तेल का आयात करता है। गहने, इलेक्ट्रॉनिक आइटम, केमिकल, प्लास्टिक और दवाओं के कच्चे माल का खूब आयात करता है। पहले मोबाइल का भी खूब आयात होता था लेकिन अब मोबाइल भारत में बनता है और उसे बनाने के लिए कच्चा माल दूसरे देशों से आयात किया जाता है। अब इतना सारा आयात होता है तो इस आयात में देश का बहुत सारा पैसा दूसरे देशों में चला जाता है। पैसा तो जाता ही है, अपने देश के लोगों की बजाय दूसरे देश के लोगों को ज्यादा काम भी मिलता है। मुख्य समस्या यही है और इसी को दूर करना है।  

भारत की GDP में कितनी है मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी?

 

भारत की GDP में सबसे मजबूत हिस्सा सर्विसेज का है। 2026 के बजट से ठीक पहले पेश किए गए इकनॉमिक सर्वे में भारत सरकार ने बताया कि जीडीपी में सर्विस सेक्टर ही हिस्सेदारी 53.6 पर्सेंट है। वहीं, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी लंबे समय से 17 से 18 प्रतिशत ही है।

 

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सारी लड़ाई इसी प्रतिशत को बढ़ाने की है। दिसंबर 2025 में बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) और Z47 ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट ने उम्मीद जताई थी कि साल 2047 तक भारत की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत और कुल 25 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है।

कौन सबसे आगे?

 

दिसंबर 2025 में आई कोटक म्यूचुअल फंड की रिपोर्ट बताती है कि सबसे ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट चीन का है। कुल मिलाकर 4.16 ट्रिलियन डॉलर का। दूसरे नंबर पर अमेरिका है 2.49 ट्रिलियन डॉलर के साथ, तीसरे नंबर पर जापान 1 ट्रिलियन डॉलर के साथ, जर्मनी 0.85 ट्रिलियर डॉलर के साथ चौथे नंबर पर है और भारत 0.78 ट्रिलियन डॉलर के साथ पांचवे नंबर पर है।

 

अगर भारत की तुलना इस मामले में अमेरिका और चीन से की जाए तो वह अमेरिका से लगभग तीन गुना और चीन से लगभग 5 गुना पीछे है। अब भारत का लक्ष्य इसी लिस्ट में खुद को मजबूत करने का है। एक लक्ष्य है कि खुद का उत्पादन कई गुना बढ़ाया जाए और इस उत्पादन से अच्छी कमाई भी की जाए। साथ ही साथ, निर्यात पर निर्भरता कम की जाए।

आयात में कितना खर्च हो जाता है?

 

अभी-अभी निर्मला सीतारमण ने जो बजट पेश किया वह 53 लाख करोड़ रुपये का है। यानी भारत एक साल में इतने पैसे खर्च करने जा रहा है। वहीं, भारत की जीडीपी लगभग 376 लाख करोड़ है। दोनों अलग चीजें हैं लेकिन एक अनुमान के लिए यहां इसे बता रहे हैं। साल 2024-25 के आंकड़े देखें तो भारत ने साल भर में 77.5 लाख करोड़ रुपये की चीजें दूसरे देशों से खरीदीं। इसी साल लगभग 70 लाख करोड़ रुपये की चीजों का निर्यात भी हुआ। मतलब आयात ज्यादा निर्यात कम। 

 

मौजूदा वक्त में भारत सबसे ज्यादा आयात जिन चीजों का कर रहा है, उनमें कच्चे तेल का आयात सबसे ज्यादा है। इसके अलावा, तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगने वाली इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, सोना, हीरा, गैस, कोयला आदि चीजों का आयात भारत भरपूर करता है। अब कच्चा तेल और गैस जैसी चीजों का विकल्प तो एक झटके में नहीं मिल सकता है।

 

india import vs export

 

भारत में इसकी मांग और खपत हर साल बढ़ रही है। यही वजह है कि भारत ऊर्जा के नए स्रोतों पर जोर लगा रहा है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस बनाकर सौर ऊर्जा पर जोर दिया जा रहा है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों, बिजली से चलने वाली ट्रेनों, बिजली से चलने वाली फैक्ट्रियों, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा में निवेश किया जा रहा है ताकि इस क्षेत्र में आयात को कम किया जा सके। 

 

फिर आता है खाने वाला तेल, सोना और हीरा। खाने वाले तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन साल 2021-22 में शुरू किया गया है और पाम ऑयल की खेती के क्षेत्रफल को बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है। आर्टिफिशियल डायमंड का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है ताकि हीरा के आयात में कमी लाई जा सके।

परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स क्या है?

 

इंस्टिट्यूट फॉर सप्लाई मैनेजमेंट ने एक मानक यानी परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) बनाया है जिसके जरिए यह देखा जाता है कि किसी सेक्टर में कितना विकास हो रहा है। इस इंडेक्स को देखने से समझ आ जाएगा कि किसी देश के मार्केट का क्या हाल है। इसे 0 से 100 के बीच मापा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे हम लोगों को एग्जाम में नंबर मिलते हैं। इसमें पासिंग मार्क 50 है। अगर 50 से नीचे है तो समझ लीजिए मामला कमजोर है और किसी देश का PMI 50 से ऊपर है तो समझिए मामला सही दिशा में चल रहा है।

 

अब अगर भारत का PMI देखें तो औसतन यह 50 से ऊपर ही चल रहा है। साल 2012 से 2025 तक के आंकड़े देखने पर पता चलता है कि सिर्फ साल 2020 में PMI 47.5 यानी 50 से कम था। 2025 का औसत PMI 56.5 था। एक चिंता वाली बात यह थी कि नवंबर 2025 में जो PMI 56.6 था वह दिसंबर 2025 में गिरकर 55.0 हो गया जो कि पिछले 2 साल में सबसे कम था। हालांकि, अभी हम महीने दो महीने की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं पिछले एक दशक और आगे आने वाले कई दशकों की।

विकल्प क्या हैं?

 

कुछ ऐसी चीजें है जिनकी मांग में कमी लाने के विकल्प खोजे जा रहे हैं क्योंकि उनका उत्पादन भारत में नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए-कच्चा तेल। यही वजह है कि भारत उन चीजों की मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान दे रहा है जिनका निर्माण भारत में संभव है। इसमें सबसे अहम हैं- इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनें, प्लास्टिक, केमिकल, दवाएं और रक्षा उपकरण। भारत ऐसे उत्पादों की पहचान के काम में जुटा हुआ है जिनका उत्पादन कम समय में शुरू किया जा सकता है या फिर जिनका उत्पादन हो रहा है और उसे बढ़ाया जा सकता है।

 

यही वजह है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में एलान किया कि इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए 40 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। इसके अलावा, दो हाई टेक टूल्स रूम स्थापित करने की भी बात कही गई है ताकि कैपिटल गुड्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया जा सके।

कैपिटल गुड्स क्या हैं?

 

इसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए पूंजीगत निवेश 12.2 लाख करोड़ किया गया है। यानी इतना पैसा निर्माण कार्यों में लगाया जाएगा। मसलन, सड़कें, इमारतें और अन्य आधारभूत ढांचे तैयार किए जाएंगे ताकि स्थापित हो रहे उद्योंगो या चल रहे उद्योगों को अपना कामकाज करने में आसानी हो। 10 हजार करोड़ रुपये कंटेनर निर्माण योजना के लिए रखे गए हैं ताकि कंटेनर विदेश से न खरीदने पड़ें और दूसरे देशों को इन्हें बेचा भी जा सके।

 

मैन्युफैक्चरिंग का काम करने के लिए जो मशीनें, प्लांट, उपकरण या उनसे जुड़ी चीजें मंगाई जाती हैं उन्हीं को कैपिटल गुड्स कहते हैं। कैपिटल गुड्स पर निवेश करने की एक वजह यह भी है कि इसके आयात में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। साल 2025-26 के इकनॉमिक सर्वे के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में इसमें 6.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई और तीसरी तिमाही में यह बढ़ोतरी 13.4 प्रतिशत रही।

अब तक का हासिल क्या है?

 

बीते एक दशक में भारत ने मोबाइल निर्माण, फार्मा सेक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग पर खास जोर दिया है। इन सेक्टर में इसका असर भी देखने को मिल रहा है। हालांकि, अभी भी कई सेक्टर ऐसे हैं जिनमें भारत मैन्युफैक्चरिंग के नाम पर असेंबलिंग का ही काम कर रहा है। आने वाले वक्त में जरूरी है कि असेंबलिंग के मामले में खुद को गढ़ बनाने के साथ-साथ भारत ऐसे प्रोडक्ट पर ध्यान दे जिनका कच्चा माल भी भारत में उपलब्ध हो और कच्चे माल के लिए भी उसे किसी और पर निर्भर न होना पड़े।

 

इलेक्ट्रॉनिक और मोबाइल निर्माण में आया बूम

 

साल 2014-15 में भारत में कुल 1.9 लाख करोड़ रुपये के इलेक्ट्रॉनिक सामान का उत्पादन हुआ जिसमें से सिर्फ 38 हजार करोड़ के सामानों का निर्यात हुआ। साल 2024-25 में 11.3 लाख करोड़ के इलेक्ट्रॉनिक सामान का उत्पादन हुआ और 3.27 लाख करोड़ का निर्यात हुआ।

 

मोबाइल निर्माण के लिए 2014-15 में सिर्फ 2 कंपनियां थीं जो 2024-25 में 300 तक पहुंच गईं। दो कंपनियां मिलकर 2014-15 में 18 हजार करोड़ के मोबाइल फोन बना रही थीं जो 2024-25 में बढ़कर 5.45 लाख करोड़ तक पहुंच गया। तब निर्यात सिर्फ 1500 करोड़ का हो रहा था और अब यह बढ़कर 2 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। 2014-15 में भारत में जितने मोबाइल फोन का इस्तेमाल हो रहा था, उसका 75 प्रतिशत आयात किया जाता था। अब यह सिर्फ 0.02 प्रतिशत पर आ गया है।

electronics and mobile manufacturing in india
इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल निर्माण में भारत ने पकड़ी रफ्तार, Photo Credit: Notebook LM

 

 

फार्मा सेक्टर

 

भारत जिन सेक्टर पर ज्यादा जोर दे रहा है, उनमें फार्मा भी प्रमुख है। अगर वॉल्यूम के हिसाब से देखें तो भारत विश्व में तीसरे नंबर पर आता है और प्रोडक्शन सप्लाई के मामले में 14वें नंबर पर आता है। भारत सरकार का अनुमान है कि 2030 तक यह इंडस्ट्री 11 लाख करोड़ की हो जाएगी और साल 2047 तक यह 40 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगी। यही वजह है कि इस सेक्टर को आगे बढ़ाने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव के जरिए 15 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। 

 

रफ्तार देगी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री?

 

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की GDP में ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का योगदान लगभग 7.1 प्रतिशत है। वहीं, मैन्युफैक्चरिंग GDP की बात करें तो अकेले यही इंडस्ट्री 49% की हिस्सेदार है। साल 2025 में भारत ने कुल 3.10 करोड़ गाड़ियां बनाईं और ऑटोमोबाइल प्रोडक्शन के मामले में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश बना।

 

टेक्सटाइल इंडस्ट्री

 

भारत की इकॉनमी के लिए टेक्सटाइल इंडस्ट्री भी बेहद अहम है। अनुमान है कि साल 2030 तक यह इंडस्ट्री 31 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगी। अगर नौकरियों के हिसाब से बात करें  कृषि क्षेत्र के बाद यह दूसरा सेक्टर ऐसा है जिसमें सबसे ज्यादा लोग रोजगार पाते हैं। अनुमान है कि आने वाले समय में लगभग 3.5 करोड़ लोग रोजगार पाएंगे।

 

इस बार के बजट में भी इसी को ध्यान में रखते हुए समर्थ 2.0 शुरू करने का एलान किया गया है। इसके जरिए टेक्सटाइल इंडस्ट्री को मॉडर्न बनाया जाएगा और पूरी वैल्यू चेन में प्रोडक्टिविटी बढ़ाई जाएगी। साथ ही, मेगाटेक्सटाइल पार्क बनाया जाएगा और एक इंटीग्रेटेड प्रोग्राम शुरू किया जाएगा। इस प्रोग्राम के तहत रेशम, ऊन, जूट जैसे नेचुरल फाइबर, मानव निर्मित फाइबर और नए जमाने के फाइबर के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नेशनल फाइबर स्कीम शुरू की जाएगी। 

रेयर अर्थ पर जोर

 

इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों, सोलर प्लेट्स और डिजिटल ईकोसिस्टम की लहर आने का असर यह हुआ है कि दुनियाभर में रेयर अर्थ मटीरियल की मांग तेजी से बढ़ी है। ऐसे में भारत ने भी इश बजट में एलान किया है कि केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में डेडिकेटेडे रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाया जाएगा। इसके जरिए, रेयर अर्थ पर्मानेंट मैगनेट्स की माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने का काम किया जाएगा।

 

भारत की कोशिश है कि अपने पास मौजूद मोनाजाइट भंडार को निकालने और उसे प्रोसेस करने का काम किया जाए। साथ ही, रिसर्च को बेहतर करके न सिर्फ नए भंडार खोजे जाएं बल्कि मौजूद भंडार का खनन और प्रोसेसिंग भी की जाए।

क्या-क्या कर रही है भारत सरकार?

 

हालिया एलानों के अलावा बीते एक दशक में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने पर कई तरीकों से जोर दिया गया है। 'मेक इंडिया', PLI, GST सरलीकरण, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। मोदी सरकार का कहना है कि वह कारोबार करने का माहौल देने के लिए कागजी कार्रवाई कर रहे हैं, सिंगल विंडो सिस्टम को बढ़ावा दे रही है, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ट्रांसपोर्ट सुविधाएं बढ़ा रही और टैक्स के सिस्टम को आसान बनाने के लिए लगातार काम कर रही है।

 

india increased capital expenditure

 

साथ ही, कई उद्योगों के लिए विदेश से आने वाले कच्चे माल पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाने, आयात पर रोक हटाने, उन देशों से संबंध बेहतर रखने जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं। इसके अलावा, ऐसे उत्पादों की तलाश जारी है जिनका उत्पादन बढ़ाकर भारत आसानी से खुद को मजबूत स्थिति में ला सकता है।

कहां हो रही चूक?

 

इसे विस्तार से समझाने के लिए हमें अरविंद पनगणढ़िया के लेख को पढ़ना चाहिए। अगस्त 2024 में वह लिखते हैं, 'अगर मुझे इस सवाल का जवाब देने को कोई कहे तो मैं लेबर का प्रभावी इस्तेमाल न कर पाने में हमारी विफलता पर उंगली उठाऊंगा। 75 साल बाद भी हमारा 85 पर्सेंट वर्कफोर्स या तो कृषि क्षेत्र में काम कर रहा है या फिर ऐसी जगहों पर काम कर रहा है जहां 10 से भी कम लोग काम करते हैं। पूंजी की कमी के कारण ये छोटे उद्योग वैश्विक मार्केट में कंपीट नहीं कर पाते हैं।'

 

वह आगे लिखते हैं, 'हम PLI का उदाहरण दे सकते हैं लेकिन अफसोस कि इसमें अतनी कठोर शर्ते हैं कि कोई भी कारोबारी इसे आसानी से पूरा नहीं कर सकता है।'

 

भारत से ग्लोबल कंपनियां क्यों नहीं पैदा हो पाईं? इस सवाल के जवाब में बिजनेस वर्ल्ड के पूर्व संपादक और प्रोजेक व्यू संस्था के फाउंडर प्रसेनजित दत्ता वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की बातों का जिक्र करते हैं। पीयूष गोयल ने एक बर कहा था, 'भारतीय उद्योग जगत के लिए भारत के 140 करोड़ लोगों का बाजार सहज और आरामदेह बन गया है इसलिए दुनिया के दूसरे देशों में वे नए अवसर खोजने के लिए नहीं जाते हैं।'

 

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए प्रसेनजित दत्ता लिखते हैं, 'इक्का-दुक्का कंपनियों को छोड़ दें तो वे किसी एक प्रोडक्ट का ग्लोबल ब्रांड बनने की बजाय अलग-अलग प्रोडक्ट और सर्विसेज में खुद को फैलाते जाते हैं। टाटा, बिरला, गोदरेज और महिंद्रा जैसे ब्रांड ने अलग-अलग क्षेत्रों में उतरने में रुचि दिखाई है। सरकारों ने भी घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता बढ़ाने या उपभोक्ताओं के लिए लागत कम करने का कोई प्रयास नहीं किया। नतीजा यह हुआ है कि जिन देशों को हम निर्यात करते हैं, वहां बेचे जाने वाले प्रोडक्ट की क्वालिटी ज्यादा अच्छी होने के चलते भारतीय उत्पाद उनका मुकाबला नहीं कर पाते। इसका असर वैश्विक कंपनियों पर भी देखने को मिलता है और वे भारत में जो उत्पाद उतारती हैं उनकी गुणवत्ता कम कर देती हैं।'

 

ऐसे ही मुद्दों पर दिए एक इंटरव्यू में इंडिया SME फोरम के अध्यक्ष विनोद कुमार कहते हैं, 'भारत पुरानी मशीनी और प्रोडक्शन क्वालिटी पर निर्भर है। कई यूनिट्स में 20 से 40 साल पुरानी मशीनें चल रही हैं जो प्रोडक्टिविटी में रुकावट बनती हैं। सिर्फ 56 प्रतिशत कंपनियां ऐसी हैं जिन्हें AI बेस्ड ऑटोमेशन के बारे में पता है लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ 3 प्रतिशत लोग ही कर पा रहे हैं। अगर भारत में मॉडर्न टेक्नॉलजी को अपना लिया जाएगा तो हम प्रोडक्टिविटी बढ़ाई जा सकती ह और निर्यात फुटप्रिंट को बढ़ाते हुए एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग के बड़े मौके हासिल कर सकते हैं।'


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