बैंकिंग फ्रॉड में कितनी जिम्मेदारी ग्राहक की, क्या है जीरो लायबिलिटी पॉलिसी?
डिजिटल बैंकिंग फ्रॉड को लेकर अक्सर इस बात की बहस होती है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है और इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा। इस लेख में इसी बात का जवाब मिलेगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: PTI
डिजिटल बैंकिंग के विस्तार ने भारत में फाइनेंशियल लेनदेन को पहले से कहीं अधिक तेज़, सुविधाजनक और सुलभ बना दिया है। UPI, नेट बैंकिंग, मोबाइल वॉलेट और डेबिट-क्रेडिट कार्ड के बढ़ते उपयोग ने आम नागरिक को बैंक शाखा पर निर्भरता से काफी हद तक मुक्त कर दिया है। लेकिन इसी डिजिटल क्रांति के साथ-साथ बैकिंग और साइबर अपराधों में भी काफी बढ़ोत्तरी देखी गई है। हाल ही में चंडीगढ़ में आईडीएफसी बैंक में हुए 590 करोड़ के कथित फ्रॉड ने फिर एक बार इस पर चर्चा छेड़ दी है। फिशिंग लिंक, फर्जी कॉल, सिम-स्वैप, ओटीपी धोखाधड़ी और अनधिकृत ऑनलाइन ट्रांजैक्शन जैसे मामलों ने कस्टमरों के सामने एक नया जोखिम खड़ा कर दिया है।
ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि यदि किसी कस्टमर के साथ अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन हो जाता है, तो उस आर्थिक नुकसान को कौन भरेगा, कस्टमर या बैंक? इसी बात को स्पष्ट करने के लिए और डिजिटल बैंकिंग में भरोसा बनाए रखने के उद्देश्य से Reserve Bank of India ने 6 जुलाई 2017 को 'Customer Protection Limiting Liability of Customers in Unauthorised Electronic Banking Transactions' संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए। इन्हें आम तौर पर 'Zero Liability Policy' के नाम से जाना जाता है। इस नीति ने साइबर फ्रॉड के मामलों में कस्टमर और बैंक की जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर डिजिटल फाइनेंशियल सिस्टम को एक सुरक्षा प्रदान की।
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क्या है जीरो लायबिलिटी?
Zero Liability Policy का मूल सिद्धांत यह है कि यदि किसी अनाधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन में कस्टमर की कोई गलती नहीं है और उसने समय पर बैंक को सूचना दे दी है, तो उसकी कोई भी फाइनेंशिलय लायबिलिटी नहीं होगी। विशेष रूप से दो स्थितियों में कस्टमर की जिम्मेदारी शून्य मानी जाती है। पहली स्थिति तब होती है जब धोखाधड़ी बैंक के सिस्टम की कमजोरी, तकनीकी त्रुटि या इंटरनल कंट्रोल की कमी के कारण हुई हो। ऐसे मामलों में कस्टमर चाहे जब भी रिपोर्ट करे, पूरी जिम्मेदारी बैंक की होती है। दूसरी स्थिति तब होती है जब कस्टमर की कोई लापरवाही न हो और वह तीन वर्किंग डेज के भीतर अनधिकृत लेनदेन की सूचना बैंक को दे दे। इस स्थिति में कस्टमर को हुए नुकसान की पूरी भरपाई बैंक द्वारा की जानी चाहिए।
हालांकि, यदि कस्टमर चार से सात कार्य दिवस के बीच सूचना देता है, तो उसकी सीमित जिम्मेदारी मानी जाती है। RBI ने अलग अलग प्रकार के खातों जैसे बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट, सामान्य बचत खाता, प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट, एमएसएमई या करंट अकाउंट के लिए अधिकतम देयता की एक सीमा निर्धारित की है। इस सीमा से अधिक राशि का भार बैंक पर आता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कस्टमर पूरी तरह असुरक्षित न महसूस करे, लेकिन साथ ही वह समय पर सूचना देने की जिम्मेदारी भी निभाए।
कब किसी जिम्मेदारी
यदि जांच में यह पाया जाता है कि कस्टमर ने खुद ओटीपी, पासवर्ड या कार्ड की डीटेल साझा की है तो उसे लापरवाही की श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे मामलों में रिपोर्ट करने से पहले हुए नुकसान की जिम्मेदारी कस्टमर पर आ सकती है। हालांकि जैसे ही कस्टमर बैंक को सूचना देता है, उसके बाद होने वाले किसी भी अतिरिक्त नुकसान की जिम्मेदारी बैंक की होती है, क्योंकि सूचना मिलने के बाद खाते की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी बैंक की होती है।
RBI के निर्देशों के अनुसार बैंकों को शिकायत दर्ज करने के लिए 24×7 सुविधा उपलब्ध करानी होती है और अनधिकृत ट्रांजैक्शन की सूचना मिलने के दस कार्य दिवस के भीतर कस्टमर के खाते में अस्थायी क्रेडिट देना आवश्यक है। अंतिम निपटान अधिकतम 90 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। यह समयसीमा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कस्टमरों को लंबी अनिश्चितता का सामना नहीं करना पड़ता और बैंकिंग प्रणाली पर भरोसा बना रहता है।
बैंको पर बढ़ी जिम्मेदारी
Zero Liability Policy ने बैंकों पर भी जिम्मेदारी बढ़ा दी है। उन्हें मजबूत साइबर सिक्युरिटी सिस्टम स्थापित करने, रियल-टाइम ट्रांजैक्शन अलर्ट भेजने, टू-स्टेप वेरिफिकेशन लागू करने और संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी के लिए उन्नत फ्रॉड-डिटेक्शन सिस्टम अपनाने की आवश्यकता पड़ी है। साथ ही, कस्टमर्स को जागरूक करने के लिए रेग्युलर कैंपेन चलाना भी बैंकों की जिम्मेदारी का हिस्सा बन गया है।
क्या हैं चुनौतियां?
फिर भी व्यवहारिक स्तर पर कुछ चुनौतियां बनी रहती हैं। 'कस्टमर की लापरवाही' को लेकर कई बार विवाद उत्पन्न होते हैं। कुछ मामलों में जांच प्रक्रिया लंबी हो जाती है या अस्थायी क्रेडिट समय पर नहीं मिलता। डिजिटल भुगतान के मामले में जहां थर्ड पार्टी ऐप शामिल होते हैं या पेमेंट गेटवे इत्यादि शामिल होते हैं, वहां जिम्मेदारी तय करना काफी मुश्किल हो जाता है।
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देखा जाए तो जीरो लायबिलिटी पॉलिसी कस्टमर को पूरी तरह से सुरक्षा तो देती है लेकिन साथ ही साथ यह इस बात को भी निर्धारित करती है कस्टमर खुद भी अपनी जिम्मेदारी को समझे और समय पर रिपोर्ट करें।
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