पिछले 3 सालों से पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर अशांत है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार राज्य में शांति बहाल करने के लिए लगातार कोशिशें कर रही है लेकिन उसे अभी तक कामयाबी नहीं मिल पाई है। इन्हीं कोशिशों में बीजेपी की केंद्र सरकार ने मणिपुर में नॉर्मलाइजेशन लाने के लिए 4 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति शासन हटाते हुए एक बार फिर से नई सरकार के गठन की कवायद शुरू की। जिसमें बीजेपी के युमनाम खेमचंद सिंह ने 4 फरवरी 2026 को मणिपुर के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। एक ही दिन (4 फरवरी) में इन दो बड़े फैसलों के बाद लगा कि मणिपुर में शांति बहाल हो जाएगी, मगर इन घटनाक्रमों के बीच 5 फरवरी को एक बार फिर से मणिपुर में हिंसा भड़क उठी।

 

मणिपुर के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के 9 फरवरी 2025 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद 13 फरवरी 2025 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। दरअसल, मणिपुर में लंबे समय से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा चल रही है। इसी वजह से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता भी बनी हुई है।

 

 

ऐसे में गंभीर सवाल उठ रहा है कि मणिपुर में नए मुख्यमंत्री के ऐलान और शपथ ग्रहण होने, राष्ट्रपति शासन हटने के बाद भी हिंसा क्यों हो रही है? आइए इस स्टोरी में इसी बात को जानने की कोशिश करते हैं...

 

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फिर से क्यों सुलगा मणिपुर?

मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में गुरुवार, 5 फरवरी को अचानक से विरोध प्रदर्शन होने लगे, जिससे तुइबोंग इलाके में तनाव बढ़ गया। प्रदर्शनकारियों ने राज्य में नई बनी बीजेपी की खेमचंद सिंह सरकार का खुलकर विरोध शुरू कर दिया। प्रदर्शन की वजह से पूरे दिन हालात खराब रहे। हालात को बिगड़ने से रोकने के लिए नई नवेली सरकार ने भारी सिक्योरिटी फोर्सेज को तैनात कर दिया।

 

 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरुवार की सुबह तुइबोंग में सरकार विरोधी प्रदर्शन के बाद हिंसा फैली। बताया गया है कि यह प्रदर्शन कुकी विधायकों के बीजेपी सरकार को समर्थन देने के बाद शुरू हुआ। कुकी विधायकों से यह समुदाय गुस्से में है। प्रदर्शनकारियों ने विधायकों के ऊपर कुकी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया। इसमें समुदाय ने सबसे बड़ा आरोप लगाया कि कुकी विधायकों ने अलग अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग के साथ में घोखा किया है।

 

बता दें कि राज्य में कुकी-जो के 10 विधायक हैं। इसमें से सात विधायक बीजेपी के हैं। बीजेपी के सातों विधायकों में से कोई भी इंफाल में मैजूद नहीं था। सरकार का समर्थन करने वाले तीन विधायक भी थोड़ी देर के लिए वर्चुअली कार्यवाही में शामिल हुए।

प्रदर्शनकारियों का कड़ा रुख

कुकी प्रदर्शनकारी अभी कड़ा रुख अपनाए हुए हैं। उनका कहना है कि जब तक अलग प्रशासनिक व्यवस्था की उनकी मांग पूरी नहीं होती, उनका समुदाय बीजेपी सरकार को समर्थन नहीं देगा। कुकी विधायकों में राज्य के नए डिप्टी सीएम नेमचा किपगेन, एल.एम. खौटे और नगुरसंगलुर सनाटे शामिल थे।

 

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प्रदर्शनकारियों ने कुकी विधायकों के इस कदम को समुदाय के साथ और उनकी उम्मीदों के साथ धोखा बताया है। इनके द्वारा बीजेपी सरकार को समर्थन देने के आंदोलन ने तब एक बड़ा मोड़ ले लिया जब दो प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर विरोध में खुद को जलाने की कोशिश की। हालांकि, पुलिसकर्मियों ने समय पर दखल देकर हादसे को टाल दिया। 

 

 

हालांकि, इन झड़पों के दौरान कई प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं। ताजा जानकारी के मुताबिक, मणिपुर में हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। राज्य और केंद्र के सुरक्षाकर्मी इलाके में पूरी तरह नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहे हैं। बता दें कि कुकी समुदाय ने पहले ही अपने समुदाय के विधायकों को चेतावनी दी थी कि अगर बीजेपी सरकार बनी तो वे उसका सपोर्ट ना करें। मगर, समुदाय की भावना के विपरीत जाकर सरकार को समर्थन देना एक बार फिर से मणिपुर में हिंसा लेकर आ गया है।

मणिपुर हिंसा का मुख्य कारण और शुरुआत

मणिपुर में सबसे पहली बार बड़े स्तर पर जातीय हिंसा 3 मई 2023 को भड़की थी। यह हिंसा मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच शुरू हुई। यह हिंसा आज भी जारी है। आगामी 3 मई को हिंसा को तीन साल पूरे हो जाएंगे।

 

दरअसल, मणिपुर हाई कोर्ट ने 27 मार्च 2023 को राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने पर विचार करने का निर्देश दिया था। इससे कुकी और अन्य आदिवासी समुदायों में विरोध बढ़ गया। कुकी समुदाय को डर सताने लगा कि इससे उनकी जमीन और आरक्षण प्रभावित होगा। 3 मई 2023 को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन मणिपुर ने पहाड़ी जिलों में 'आदिवासी एकजुटता मार्च' निकाला था।

 

चुराचांदपुर जिले के तोरबंग इलाके में यह मार्च हिंसक हो गया (यह वही इलाका है जहां 5 फरवरी को फिर से हिंसा भड़की है), जहां मैतेई और कुकी समूहों के बीच झड़पें शुरू हो गईं। दोनों समुदायों मे एक दूसरे के घरों में आग लगा दी और हमले किए। देखते ही देखते यह हिंसा इम्फाल घाटी और आसपास के जिलों में फैल गई। यह हिंसा मणिपुर में आज भी जारी है।