भारत का सबसे पुराना संगीत समारोह बनारस के संकटमोचन मंदिर में होने वाला  संकटमोचन संगीत समारोह है। इस संगीत समारोह को 103 साल हो गए है। हर साल छह दिन तक इस मंदिर के प्रांगण में संगीत प्रेमी जमा होते हैं और संगीत का आनंद लेते हैं। संकटमोचन मंदिर एक ऐसा धार्मिक स्थल है जहां गीत-संगीत के साथ ही भाईचारा, कौमी एकता और सौहार्द भी देखने को मिलता है। इस हिंदू मंदिर में होने वाले संगीत समारोह में मुस्लिम समुदाय के लोग भी शामिल होते हैं और इसका मुस्लिम कलाकार इस कार्यक्रम में अपनी कला का प्रदर्शन भी करते हैं। काशी की गंगा-जमुना तहजीब को यह संगीत समारोह आज भी जिंदा रखे हुए है। 

 

इस साल इस संगीत समारोह का आयोजन 6 अप्रैल से 11 अप्रैल तक किया जा रहा है। इस साल पहली बार ऐसा होगा कि मंच से 14 मुस्लिम कलाकार प्रस्तुती देंगे। इस साल 11 पद्म पुरस्कार से सम्मानित कलाकार भी इस बार अपनी प्रस्तुति देंगे, जिनमें से कई पहली बार इस संगीत कार्यक्रम में प्रस्तुति देंगे। खास बात यह है कि इस कार्यक्रम में प्रस्तुति देने के लिए कलाकारों को कोई पैसा नहीं दिया जाता लेकिन फिर भी कलाकार यहां प्रदर्शन करने आते हैं। इस साल 150 से ज्यादा कलाकार इस मंच से प्रस्तुति देने वाले हैं। इनमें मालिनी असवस्थी, शिवमणि और साजन मिश्र जैसे प्रसिद्ध कलाकार भी शामिल हैं। 

 

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गंगा-जमुनी तहजीब का प्रदर्शन

इस मंदिर की खास बात यही है कि सांप्रदायिक तनाव के बावजूद भी इस मंदिर में गंगा जमुना तहजीब की हर साल नई गाथा लिखी जाती है। भगवान हनुमान के दरबार में हिंदु-मुस्लिम कलाकार धर्म का भेद छोड़कर एक साथ प्रदर्शन करते हैं। इस मंदिर परिसर में 7 मार्च 2006 को आतंकवादियों ने बम धमाका किया था। इसके बाद से काशी में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया था। कई संगठनों ने प्रदर्शन करने की भी कोशिश की। 

 

इस हमले के दो साल बाद ही तात्कालीन महंत पंडित वीरभद्र मिश्र ने इस संगीत समारोह में मुस्लिम कलाकारों को आमंत्रित करना शुरू किया। शरुआत में कुछ लोगों ने इसका विरोध किया लेकिन बाद में महंत के आग्रह पर सभी लोग शांत हो गए। इसके बाद इस समारोह में गजल गायकी भी काफी प्रसिद्ध हुई। 

मंदिर की ड्योडी से हुई थी शुरुआत

इस संगीत समारोह का आयोजन 1923 में पहली बार संकटमोचन मंदिर की ड्योडी से हुआ था। गर्भगृह के बाहर बैठकर कलाकार गायन-वादन की प्रस्तुतियां देते थे। पंडित अमरनाथ मिश्र संगीत समारोह की पूरी जिम्मेदारी निभाते थे। 25 साल तक यह संगीत समारोह सिर्फ एक दिन का होता था। इस समारोह में जब भीड़ बढ़ने लगी तो बड़े महंत पंडित बांकेराम मिश्र ने कुएं की जगत को मंच बनवा दिया। कलाकार कुएं की जगत पर बैठकर प्रस्तुतियां देने लगे थे। 

 

इसके बाद 40वें साल में आयोजन स्थल गर्भगृह के पास बरामदे में इस कार्यक्रम का आयोजन होने लगा और यह आयोजन दो दिन तक चलने लगा। इस समारोह की प्रसिद्धि को देखते हुए बाद में इस कार्यक्रम को तीन दिनों का कर दिया था। धीरे-धीरे 2014 के बाद से इस कार्यक्रम को 6 दिन का कर दिया गया। 

तुलसीदास से है नाता

इस संगीत समारोह का नाता तुलसीदास से जुड़ा है। पद्मश्री राजेश्वर आचार्य के अनुसार, संकटमोचन मंदिर में गीत-संगीत की परंपरा करीब पांच सौ साल पुरानी है। इसे गोस्वामी तुलसीदास ने ही शुरू कराया था। 1923 में इस कार्यक्रम को आधिकारिक तौर पर संकटमोचन मंदिर में करवाया जाने लगा। इस कार्यक्रम की सबसे खास बात इसका शास्त्रीय संगीत है। यह समारोह पूरी रात चलता है। 

छह दिन बैठे रहते हैं दर्शक

इस कार्यक्रम में बिहार से आए काशी प्रसाद खरवार ने कहा, 'यहां आने पर लगभग 6 हजार का नुकसान हो जाता है, रहने-खाने का 2 हजार और कमाई का 4 हजार। फिर भी हर साल आकर तीन दिन रुकता हूं, क्योंकि यहां से जो ऊर्जा मिलती है उससे साल भर काम में मन लगा रहता है और लाखों रुपये कमाता हूं।'

निर्मल सिंह

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बच्चे से बूढ़े तक उम्र का बंधन टूटा

इस संगीत समारोप में बच्चे से बूढ़ तक हर उम्र वर्ग के लोग शामिल होते हैं। इस कार्यक्रम में लोग 25-25 सालों से आ रहे हैं। इस कार्यक्रम में निर्मल सिंह, 12 साल के लड़के ने बताया कि वह पिछले 4 सालों से संगीत समारोह में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि शास्त्रीय संगीत उन्हें काफी ज्यादा पसंद है और हर साल पूरे छह दिन इस कार्यक्रम का आनंद लेते हैं। बनारस की ही एक महीला ने बताया है कि पिछले 10 साल से वह इस कार्यक्रम में आ रही हैं।