राजस्थान के अजमेर से 22 किलोमीटर दूर नसीराबाद के दिलवाड़ा गांव के स्टेडियम में शाम 7 बजे फ्लड लाइट जल जाती है। इस स्टेडियम में रोजाना 100 से ज्यादा लड़कियां घंटों फुटबॉल का अभ्यास करती हैं। कभी बंजर जमीन रही यह जगह अब सपनों का मैदान बन चुकी है जहां, दिलवारा गांव की लड़कियां फुटबॉल के जरिए अपनी पहचान गढ़ रही हैं।
गांव के युवाओं और खिलाड़ियों के सामूहिक प्रयास से कांटों और पत्थरों से भरी जमीन को खेल मैदान में बदला गया है। घास का मैदान तैयार करने का काम भी जारी है। स्थानीय निवासी राकेश प्रजापत ने न्यूज एजेंसी PTI को बताया कि उनका सपना फुटबॉलर बनने का था लेकिन आर्थिक कारणों से अधूरा रह गया। अब वह चाहते हैं कि गांव की बेटियां उनका सपना पूरा करें।
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दिलवाड़ा से निकली नेशनल लेवल फुटबॉलर
पांच साल पहले दिलवाड़ा गांव में केवल पांच लड़कियां खेलती थीं। आज यह संख्या 100 से अधिक हो चुकी है। इनमें से एक खिलाड़ी नेशनल लेवर पर खेल चुकी है और 6-7 राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग ले चुकी हैं। फल की दुकान चलाने वाले कोच जयंत रोजाना 2-3 घंटे खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करते हैं। वह खुद भी नेशनल लेवल के फुटबॉलर रह चुके हैं और फिलहाल बीपीएड कोर्स के अंतिम वर्ष में हैं। उनका कहना है कि अब यह मैदान बड़े टूर्नामेंट की मेजबानी कर सकता है।
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कृष्णा जाट तीन साल से अभ्यास कर रही हैं और राज्य स्तर पर तीन बार और नेशनल लेवर पर दो बार खेल चुकी हैं। उनका कहना है कि परिवार का सहयोग उनके संकल्प को और मजबूत करता है। सोनम चौधरी ने बताया कि वह रोजाना मुफ्त कोचिंग के साथ अभ्यास करती हैं और उनका सपना है कि नेशनल लेवर पर खेलकर गांव और जिले का नाम रोशन करें। वहीं अंजु चौधरी पशुपालन की जिम्मेदारियों के साथ-साथ जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं की तैयारी कर रही हैं।
दिलवाड़ा गांव की ये बेटियां इस बात की मिसाल हैं कि संकल्प, सामुदायिक सहयोग और बाधाओं को पार करने की इच्छाशक्ति कैसे युवा लड़कियों को खेलों के माध्यम से अपना भविष्य गढ़ने की ताकत देती है।
