इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शनिवार को यूपी पुलिस के 'हाफ एनकाउंटर' के तरीके पर कड़ी फटकार लगाते हुए नाराजगी जताई। कोर्ट ने आरोपियों के पैरों में गोली मारकर बाद में उसे मुठभेड़ बताने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा पुलिस को लेकर सख्त कमेंट किया। हाई कोर्ट के कमेंट के बाद यूपी पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान लग गए हैं। कोर्ट ने कहा कि दंड देने का अधिकार केवल न्यायालयों के पास है, पुलिस के पास नहीं।

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, 'पुलिस अधिकारी सिर्फ तारीफ, समय से पहले प्रमोशन और सोशल मीडिया पर वाहवाही के लिए अनावश्यक रूप से गोली चला रहे हैं।' कोर्ट ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा न्यायिक अधिकार क्षेत्र में किसी भी तरह का अतिक्रमण अस्वीकार्य है, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां शासन कानून के तहत चलता है।

 

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हाईकोर्ट ने 6 पॉइंट में गाइडलाइंस जारी की

साथ ही हाईकोर्ट ने 6 पॉइंट में गाइडलाइंस जारी की है। सुनवाई जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की बेंच कर रही थी। उन्होंने साफ चेतावनी देते हुए कहा, 'अगर पुलिस एनकाउंटर मामलों में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन नहीं हुआ तो जिले के SP, SSP और पुलिस कमिश्नर व्यक्तिगत रूप से कोर्ट की अवमानना के दोषी माने जाएंगे।'

डीजीपी और गृह सचिव से जवाब तलब

इसके बाद हाईकोर्ट ने यूपी के डीजीपी और गृह सचिव से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि क्या पुलिस अधिकारियों को आरोपियों के पैरों या शरीर के अन्य हिस्सों में गोली मारने के संबंध में कोई मौखिक या लिखित निर्देश जारी किए गए हैं। कोर्ट ने कमेंट किया कि ऐसे एनकाउंटर अब एक नियमित घटना बनते जा रहे हैं, जिनका मकसद कथित तौर पर वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना या आरोपियों को सबक सिखाना हो सकता है।

 

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कोर्ट का गंभीर सवाल

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि उसके सामने अक्सर ऐसे मामले आते हैं, जिनमें मामूली अपराधों में भी पुलिस अंधाधुंध गोलीबारी कर घटनाओं को एनकाउंटर का रूप देती है। दरअसल, कोर्ट ने यह कमेंट मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार और दो अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान किया है। यह दोनों लोग यूपी पुलिस की कथित मुठभेड़ों में घायल हुए थे। कोर्ट ने कहा कि ऐसा क्यों है कि इन एनकाउंटर की घटनाओं में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आती, जिससे बल प्रयोग की आवश्यकता और अनुपातिकता पर सवाल उठते हैं।