13 साल पुराने एक मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी और उसके डीलर को बड़ा आदेश दिया है। आयोग ने कहा है कि या तो खराब स्कॉर्पियो SUV बदल दो या फिर ग्राहक को पूरी खरीद राशि 12.27 लाख रुपये वापस कर दो।
यह फैसला 13 मई 2013 को राजस्थान के अजमेर में खरीदी गई महिंद्रा स्कॉर्पियो SUV का है। ग्राहक का नाम काना राम जाट है। गाड़ी खरीदने के कुछ ही महीनों में इंजन में बार-बार खराबी आने लगी। कई बार ठीक करवाने के बावजूद समस्या नहीं सुलझी। आखिरकार NCDRC ने 7 अप्रैल 2025 को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
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क्या हुई था समस्या?
गाड़ी खरीदने के दो-तीन महीने बाद ही सितंबर 2013 में इंजन में समस्या शुरू हो गई। इसके बाद कानाराम जाट इसे वर्कशॉप ले गए। 16 सितंबर को गाड़ी दी और 20 सितंबर को वापस ली लेकिन समस्या जस की तस रही। फिर दिसंबर 2013 में फिर वर्कशॉप जाना पड़ा। गाड़ी 27 दिसंबर से 21 जनवरी 2014 तक वहां रही।
2014 में सितंबर में इंजन पूरी तरह खराब हो गया। डीलर ने लगभग दो महीने गाड़ी रखी और पूरा इंजन बदल दिया लेकिन इंजन बदलने के बाद भी गाड़ी में बार-बार खराबी आती रही। दिसंबर 2014 में एयर वैक्यूम ट्यूब की समस्या सामने आई। जनवरी 2015 में गाड़ी को फिर दूसरे अधिकृत सर्विस सेंटर पर छोड़ दिया गया और वह उसे वापस नहीं ले पाए क्योंकि समस्या बनी रही।
राजस्थान राज्य आयोग का फैसला
परेशान होकर काना राम जाट ने 2015 में राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग में शिकायत की। उन्होंने कहा कि कंपनी ने खराब सेवा दी और गलत व्यापारिक प्रथा अपनाई।
1 दिसंबर 2016 को राज्य आयोग ने कानाराम जाट के पक्ष में फैसला सुनाया। उसने महिंद्रा को गाड़ी बदलने या 12.27 लाख रुपये वापस करने का आदेश दिया। साथ ही लोन पर 10.5% ब्याज और 4 लाख रुपये मुआवजे का भी आदेश था। राज्य आयोग ने महिंद्रा की दलील खारिज कर दी कि गाड़ी व्यावसायिक उपयोग में थी। कंपनी के पास इसके लिए कोई सबूत नहीं था।
महिंद्रा ने भी की अपील
महिंद्रा कंपनी ने 2017 में NCDRC में अपील की। कंपनी ने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट साबित करने के लिए कोई एक्सपर्ट ओपिनियन नहीं है। गाड़ी का दुरुपयोग हुआ और अनाधिकृत मैकेनिक से सर्विस कराई गई। इंजन तो वारंटी में बदल दिया गया था।
NCDRC के बेंच (प्रिसाइडिंग मेंबर डॉ. इंदरजीत सिंह और मेंबर जस्टिस डॉ. सुधीर कुमार जैन) ने महिंद्रा की अपील खारिज कर दी। आयोग ने साफ कहा कि गाड़ी में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट था। समस्या खरीद के तुरंत बाद शुरू हुई और बार-बार रिपेयर के बावजूद ठीक नहीं हुई।
आयोग ने कहा, ‘रिपेयर रिकॉर्ड खुद गवाही देते हैं। इतनी बार वर्कशॉप जाना और वारंटी में इंजन बदलना ही डिफेक्ट साबित करता है। हर मामले में एक्सपर्ट ओपिनियन जरूरी नहीं होता।’
NCDRC ने राज्य आयोग के मुख्य फैसले को सही माना। गाड़ी बदलने या 12.27 लाख रुपये वापस करने का आदेश बरकरार रखा। मुआवजे को 4 लाख से घटाकर 50,000 रुपये कर दिया। लोन ब्याज का आदेश हटा दिया क्योंकि ग्राहक ने इसे खासतौर पर नहीं मांगा था।
महिंद्रा और डीलर दोनों पर जॉइंट जिम्मेदारी तय की गई। सर्विस सेंटर को छोड़ दिया गया। दोनों को दो महीने में आदेश का पालन करना होगा, वरना 9% सालाना ब्याज लगेगा।
आयोग ने क्या-क्या कहा?
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गाड़ी खरीदने के कुछ महीनों में समस्या शुरू होना मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट का मजबूत सबूत है।
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बार-बार एक ही समस्या के लिए वर्कशॉप जाना सिस्टमैटिक डिफेक्ट दिखाता है।
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वारंटी में इंजन बदलना भी कंपनी द्वारा डिफेक्ट स्वीकार करने जैसा है।
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'कमर्शियल यूज' की दलील बिना सबूत के नहीं च लती।
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'कोई एक्सपर्ट नहीं' वाली दलील खारिज, क्योंकि रिकॉर्ड साफ हैं।
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एक्सपर्ट की जरूरत नहीं
NCDRC ने साफ किया कि मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट साबित करने के लिए हमेशा एक्सपर्ट की जरूरत नहीं होती है। अगर रिपेयर रिकॉर्ड, बार-बार खराबी और वारंटी में बड़े पार्ट्स बदलना हो तो कोर्ट इसे मान लेता है। यह फैसला फोर्ड ईकोस्पोर्ट एयरबैग मामले (अप्रैल 2025) जैसा है, जहां बिना एक्सपर्ट के ही डिफेक्ट मान लिया गया था।
