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कैसे सुलझेगी ग्राहकों की समस्या? 18 राज्यों में तो आयोग के पास अध्यक्ष ही नहीं

ग्राहकों की समस्याओं का निपटारा करने के लिए जिले, राज्य और देश में आयोग बनाए गए हैं। इन आयोगों के सैकड़ों पद आज भी खाली पड़े हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI

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देश के आम नागरिक तमाम तरह की खरीदारी हर दिन करते हैं। अब अगर खरीदारी में किसी तरह की धोखाधड़ी हो, कोई घटतौली करे, नकली सामान दे, ज्यादा पैसे लेकर कम सामान दे तो इसकी शिकायत की जा सकती है। इसी के लिए नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रीड्रेसल कमीशन (NCRDC) का गठन किया गया है। इस संस्था की जिम्मेदारी है कि अगर ग्राहक शिकायत करें तो उन पर सुनवाई करे और उनकी समस्या हल करे। हर राज्य में इस आयोग का एक अध्यक्ष होता है लेकिन हैरानी की बात है कि 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में से 18 में तो आयोग के पास कोई अध्यक्ष ही नहीं है। बाकी भी तमाम पद खाली ही पड़े हैं और इसका असर शिकायतों के निपटारे में भी देखने को मिल रहा है।

 

साल 1988 में बने इस आयोग का सिस्टम ऐसा है कि एक राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हैं। सभी राज्यों में इस आयोग के अध्यक्ष और सदस्य होते हैं और जिलों में भी आयोग के अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त किए जाने चाहिए। मौजूदा वक्त में राष्ट्रीय आयोग में एक अध्यक्ष के अलावा 8 अन्य सदस्य शामिल हैं। सदस्यों में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व या मौजूदा जज, पूर्व सैन्य अधिकारी और कई मौजूदा अधिकारी भी शामिल हैं।

 

इसी को लेकर सांसद के सुधाकरन ने कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन मंत्रालय से जवाब मांगा था। उन्होंने यह भी पूछा था कि इन आयोगों के सामने कितने केस पेंडिंग हैं और कितने पद खाली पड़े हैं? साथ ही, यह भी पूछा था कि क्या सरकार जीरो-वैकेंसी पॉलिसी के लिए काम कर रही है ताकि केस पेंडिंग न रहें? इसी का जवाब राज्यमंत्री बी एल वर्मा ने संसद में लिखित रूप में दिया है।

क्या है मौजूदा स्थिति?

 

देश के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर कुल 36 राज्य आयोग अध्यक्ष होने चाहिए लेकिन सिर्फ 18 ही नियुक्त हैं। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर इन आयोगों के 75 सदस्यों के पद खाली हैं। मणिपुर, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और बिहार ही ऐसे हैं जिनके राज्य आयोगों में कोई पद खाली नहीं है।

 

अब अगर जिला आयोगों की बात करें तो देश के 806 जिलों में से 169 जिलों में जिला आयोग के अध्यक्ष का पद खाली है। पश्चिम बंगाल के 18, यूपी के 21, कर्नाटक के 15, झारखंड के 11 और छत्तीसगढ़ के 17 जिलों में आयोग के अध्यक्ष का पद खाली है। इसी तरह जिलों के आयोग में सदस्यों के 379 पद खाली हैं।

 

कितने केस पेंडिंग?

कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट, 2019 की धारा 38 (7) के मुताबिक, कोई शिकायत आने के बाद जब दूसरे पक्ष को इसका नोटिस मिल जाए, तब से सिर्फ 3 महीने में शिकायत का निपटारा करना होता है। जहां चीजों की जांच करने की जरूरत हो उस स्थिति में अधिकतम 5 महीने का समय लिया जा सकता है।

 

इसके बावजूद राष्ट्रीय आयोग यानी NCRDC के पास अभी भी 16382 केस पेंडिंग हैं। इसी तरह राज्यों के आयोगों के पास 1,21,922 केस और जिलों के आयोगों के पास कुल 4,46,029 केस पेंडिंग हैं। यानी कुल मिलाकर 5,74,333 ग्राहकों की शिकायतें ऐसी हैं जो अभी भी फैसले का इंतजार कर रही हैं।

 

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इन पदों को कौन भरेगा?

 

कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट के तहत राज्यों के आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त करने का काम राज्यों का है। जिलों के आयोग और सदस्य नियुक्त करने का काम भी राज्यों का है। किसी जिले में आयोग के अध्यक्ष या सदस्य का पद खाली होने की स्थिति में राज्य सरकार किसी दूसरे जिले के अध्यक्ष या सदस्य को काम सौंप सकती है।

क्या है NCRDC?

 

कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट 1986 के तहत साल 1988 में इस संस्था का गठन किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज या फिर हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस इस आयोग के अध्यक्ष होते हैं। इसी के चलते मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे अमरेश्वर प्रताप साही इस आयोग के अध्यक्ष हैं।

 

कंज्यूमर प्रोटेक्शन ऐक्ट 1986 की धारा 21 के तहत अगर शिकायत दो करोड़ से ज्यादा के मामले से जुड़ी हो तो उस पर राष्ट्रीय आयोग काम करता है और अगर शिकायत इससे छोटी हो तो उस पर राज्य या जिले का आयोग काम करता है। अगर कोई शख्स आयोग के फैसले से संतुष्ट न हो तो वह 30 दिन के भीतर सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है।


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