पंजाब में कांग्रेस और नवजोत सिंह सिद्धू का रिश्ता कई दौर से गुजरा है। कभी कांग्रेस से रूठने, कभी मानने वाले नवजोत सिंह सिद्धू, पार्टी से ऐसे हताश हुए कि सक्रिय राजनीति से ही दूर हो गए। अब उनकी पत्नी ने लंबे निलंबन के बाद पार्टी को अलविदा कह दिया है। नवजोत कौर का इस्तीफा चर्चा में है। वजह यह है कि कांग्रेस में उनकी तो संभावनाएं अब शून्य हो गईं हैं, अब उनकी अगली सियासत क्या होने वाली है, इस पर सबकी नजरें टिकीं हैं। 

कांग्रेस से इस्तीफा देने से कुछ दिन पहले ही नवजोत कौर, वृंदावन गईं थीं। उन्होंने गौरी गोपाल आश्रम के प्रमुख अनिरुद्धाचार्य से मुलाकात की थी। वहां उन्होंने दावा किया कि गोमूत्र से स्नान और उसके सेवन से उनका कैंसर ठीक हो गया। उनका परिचय कराते हुए अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि नवजोत, हर दिन गोमूत्र से स्नान करती हैं, उन्होंने चौथे सस्टेज का कैंसर ठीक कर लिया है। 

अनिरुद्धाचार्य से उनकी मुलाकात को नई राजनीतिक संभावनाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। जब तक सिद्धू कांग्रेस में रहे, बीजेपी समर्थकों से उनकी तना-तनी रही। अनिरुद्धाचार्य, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं, बीजेपी के करीब हैं। अब अटकलें लगाई जा रहीं हैं कि नवजोत सिद्धू और उनकी पत्नी भारतीय जनता पार्टी में वापसी कर सकते हैं। 

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पुराने रिश्ते को नया करेंगे सिद्धू?

नवजोत कौर सिद्धू एक जमाने में भारतीय जनता पार्टी के मजबूत सिपाही रहे हैं। वह अमृतसर संसदीय सीट से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे हैं। उनकी राजनीतिक पारी ही बीजेपी से शुरू हुई थी। साल 2004 में वह पहली बार अमृतसर से सांसद बने थे। साल 2006 में उन्होंने अपने खिलाफ रोड मामले में सजा आने के बाद इस्तीफा दे दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने जब उनकी सजा पर रोक लगाई एक बार फिर वह अमृतसर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े। साल 2014 तक भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर वह चुनाव जीतते रहे।

साल 2016 में जब बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा भेजा तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनका बीजेपी से मोहभंग हो गया था। वजह यह थी कि उनकी सीट से अरुण जेटली को लड़ा दिया गया था। सिद्धू की पारंपरिक सीट थी, उनका कहना था कि अगर इस सीट से नहीं तो कहीं से भी नहीं चुनाव लड़ूंगा। साल 2017 तक सिद्धू ने अपना नाता बीजेपी से तोड़ लिया औऱ बीजेपी में शामिल हो गए।  बीजेपी से कई बार सासंद चुने जा चुके नवजोत सिंह सिद्धू अब एक बार फिर पार्टी में शामिल कराया। 

कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब रहे हैं सिद्धू

एक जमाने में पंजाब कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे रहे, नवजोत सिंह सिद्धू के परिवार ने कांग्रेस से किनारा कर लिया है।  नवजोत कौर सिद्धू ने दावा किया था कि पंजाब में मुख्यमंत्री की कुर्सी 500 करोड़ रुपये खर्च करने पर मिलती है। उन्होंने शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ कई आपत्तिनजक बयान दिए थे, जिस पर हंगामा हुआ था। कांग्रेस पार्टी ने अनुशासनहीनता के आरोप में उन्हें निलंबित कर दिया था। अब नवजोत कौर ने राजा वड़िंग पर आरोप लगाया है कि वह आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार से खुद को बचाने के लिए साठगांठ कर रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं है, सिद्धू की बयानबाजी ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाई हैं। वह कई बार कांग्रेस के लिए मुसीबत साबित हुए हैं। 

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सिद्धू की ईमानदारी, कांग्रेस पर कैसे रही भारी?

सिद्धू खुद को ईमानदार राजनेता बताते रहे हैं। यह ईमानदारी कांग्रेस पर भारी पड़ती रही है। साल 2017 में कैप्टन सरकार के खिलाफ उन्होंने खुला मोर्चा खोल दिया था और कहा था कि सरकार का प्रदर्शन ठीक नहीं है, कांग्रेस के सीनियर नेताओं की उन्होंने जमकर आलोचना की। पंजाब प्रदेश के तत्कालीन अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर भी वह तब भी कई आरोप लगा चुके हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई से शीर्ष नेतृत्व बचता रहा लेकिन वह कांग्रेसी नेताओं को फटकारते रहे। वह कभी प्रताप सिंह बाजवा से उलझते, कभी राजा वड़िंग से। उनकी वजह से पार्टी में घमासान की स्थिति बनी रही। जब नवजोत कौर सिद्धू ने इस्तीफा दिया तो सुखविंदर सिंह रंधावा इतने खुश हो गए कि वह खुद को लिखने से नहीं रो पाए, 'चलो छुटकारा तो मिला।'

कांग्रेस में कैसी थी सिद्धू की राजनीति?

साल 2017 में जब सिद्धू कांग्रेस पार्टी में गए थे, उन्होंने बीजेपी की जमकर आलोचना की थी। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की खूब खुशामद की थी। पंजाब में तब विधानसभा चुनाव होने वाले थे। राज्य में कांग्रेस की कमान कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथों में थी। वह पार्टी के स्टार प्रचार रहे, शीर्ष नेतृत्व में शामिल रहे। जब सरकार बनी तो कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू को पर्यटन और सांस्कृतिक मामलों का मंत्री बना दिया। कुछ महीने ठीक से गुजरे लेकिन साल 2018 सिद्धू और कांग्रेस, दोनों के लिए मुश्किलों भरा रहा। साल 1988 में गुरनाम सिंह रोड रेज केस में सिद्धू दोषी करार दिए गए थे, यह मामला, 2018 में फिर खुल गया। पंजाब सरकार ने नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ हलफनामा दे दिया। सिद्धू को यह बात खटक गई, जबकि यह सामान्य प्रक्रिया थी। 

पाकिस्तान में क्रिकेटर इमरान खान साल 2018 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए। नवजोत सिंह सिद्धू को पाकिस्तान आने का न्योता मिला। वह इमरान खान की तारीफ में कसीदे पढ़ने लगे। कैप्टन अमरिंदर ने साफ कहा कि इस कार्यक्रम में शरीक न हो। सिद्धू नहीं माने, वह वाघा बॉर्डर के जरिए पाकिस्तान गए, पाकिस्तानी सेना प्रमुक कमर जावेद से भी मिले। 

यह बात कैप्टन अमरिंदर को खटक रही थी। साल 2019 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कैबिनेट में बदलाव किया और सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया। सिद्धू ने शपथ ग्रहण लिए बिना इस्तीफा दे दिया। नवजोत सिंह सिद्धू, मंत्री रहने के दौरान भी बालू माफियाओं को लेकर सरकार को घेरते रहे। अमरिंदर सिंह सरकार में बिजली के भ्रष्टाार का मुद्दा उठाते रहे। 

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नवजोत सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर की अदावत इतनी बढ़ गई कैप्टन अमरिंदर को इस्तीफा देने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने फोन कर दिया। सोनिया गांधी के निर्देश पर कैप्टन अमरिंदर ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। वह 2021 में पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने। नवजोत सिंह सिद्धू ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया। वह खुद सीएम बनना चाहते थे लेकिन उनकी विवादित छवि की वजह से बात नहीं बन पाई। कुछ महीने की सरकार में उनकी चरणजीत सिंह चन्नी के साथ भी नहीं बनी। वह अपनी सीट भी गंवा बैठे।
 

अब कहां जाएंगे नवजोत सिद्धू?

नवजोत सिंह सिद्धू और उनके परिवार की राजनीति समझनी है तो पहले  यह जानना होगा कि पंजाब की सियासत में सक्रिय राजनीतिक दल कौन से हैं। पंजाब की सत्तारूढ़ पार्टी है आम आदमी पार्टी। आम आदमी पार्टी की जमकर आलोचना करते हैं, उनकी पत्नी ने AAP के खिलाफ मोर्चा खोला है तो अब AAP में जाने का तुक बनता नहीं है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस है। अकाली दल अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। अकालियों के सबसे बड़े राजनीतिक फिरके शिरोमणि अकाली दल की हालत यह है कि पार्टी के अलाकमान अपनी सीट नहीं बचा पा रहे हैं। बीजेपी हाशिए पर है। कावयदें यह चल रहीं हैं कि अब एक बार फिर सिद्धू परिवार, बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। 

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बीजेपी में क्यों जाने की अटकलें लग रहीं हैं?

राज्य में 117 विधानसभा सीटें हैं। 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल सिर्फ 3 सीट जीत पाई थी, बीजेपी 2 सीट। भारतीय जनता पार्टी पंजाब में अपनी सियासी जमीन तलाश रही है। शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी में अब गठबंधन नहीं है। बीजेपी को एक बड़े चेहरे की तलाश है। बिना बड़े सिख चेहरे के पंबाज में बीजेपी की राह आसान नहीं होने वाली है। नवजोत सिद्धू की शुरुआती विचारधारा ही राष्ट्रवाद रही है। 

शिरोमणि अकाली दल से अलगाव की स्थिति है। अब बीजेपी की जरूरी है कि पंजाब में एक कद्दावर और लोकप्रिय सिख चेहरे आए। इस जरूरत पर सिद्धू खरे उतरते हैं। उनकी जनसभाओं में खूब भीड़ होती है, लोग उन्हें पसंद करते हैं। सिद्धू ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बीजेपी से ही की थी और वह तीन बार अमृतसर से बीजेपी के सांसद रह चुके हैं। उनके पुराने साथियों और आलाकमान के साथ व्यक्तिगत संबंध आज भी खत्म नहीं हुए हैं। कांग्रेस में रहने के दौरान उन्होंने कांग्रेस नेताओं की आलोचना ज्यादा की थी, केंद्र सरकार की आलोचना कम की थी। ऐसे में संभावनाएं अब भी बनी हैं। 

नवजोत सिंह सिद्धू भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हैं, पंजाब मॉडल बनाने की बात करते हैं। वह बीजेपी के विचारधारा के करीब लगते हैं। कांग्रेस से सिद्धू का मोहभंग हो चुका है। अब बीजेपी को भी एक नेता की जरूरत है, सिद्धू परिवार को एक पार्टी की। नवजोत सिद्धू या नवजोत कौर सिद्धू दोनों ने अभी तक बीजेपी में शामिल होने के बारे में कुछ नहीं कहा है लेकिन अटकलें लगाई जा रहीं हैं कि सिद्धू परिवार बीजेपी में शामिल हो सकता है।