31 मार्च 2026। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि डेडलाइन यही रही, पूरे देश से नक्सलवाद मिट जाएगा। उन्होंने कहा कि हथियारबंद सशस्त्र माओवादी और नक्सलवादी आंदोलनों के लिए अब देश में कोई जगह नहीं है, सबको संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा होना होगा, हथियारों की भाषा अब नहीं बर्दाश्त की जाएगी। कमोबेश यही एलान, छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने भी किया। नक्सलवाद खत्म हो चुका है, इसका जिक्र अमित शाह राज्यसभा में कर चुके हैं, विजय शर्मा छत्तीसगढ़ में।
हम अक्सर सुनते हैं कि विचारधारा कभी खत्म नहीं होती। नक्सलवाद और माओवाद एक विचारधारा है, वैचारिक तौर पर यह जिंदा रह सकती है, लेकिन इस पर अमल करने वाले कैडर या तो मुख्यधारा में मिल गए हैं, या उन्हें खत्म कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 की समयसीमा तय की थी। अब तक नक्सलियों के कई बड़े काडर मारे जा चुके हैं, कई मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं। कुछ नक्सली आज भी हैं, जिनसे सरेंडर के लिए बातचीत चल रही है।
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क्यों कहा जा रहा है खत्म हो गया नक्सलवाद?
- बड़े नक्सलियों का खात्मा हो गया: नक्सलियों का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह खत्म हो गया है या वे सरेंडर कर चुके हैं। CPI (माओवादी) गुट का महासचिव और सबसे बड़ा रणनीतिकार रहा नम्बाला केशव राव उर्फ बसवराजू को सुरक्षाबलों ने मई 2025 को छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ ऑपरेशन में ढेर किया था। सेंट्रल कमेटी का कुख्यात सदस्य रहा माड़वी हिड़मा मारा जा चुका है। एनाल दा उर्फ पतिराम मांझी, टॉप कमांडर था, खत्म हो गया। फरवरी 2016 में हुए इस एनकाउंटर में करीब 16 अन्य माओवादी भी मारे गए। प्रभाकर राव, पारकल वीर, स्वामी, पडकाला स्वामी, लोकेटी चंदर राव जैसे केंद्रीय‑स्तर के कमांडर भी हाल‑के एनकाउंटरों में मारे गए। कट्टा रामचंद्र रेड्डी, कदारी सत्यनारायण रेड्डी, गजरला रवि, बालकृष्ण, नरसिम्हा, चेलम जैसे कमाडंर और कार्यकर्ता मारे गए, जिसके बाद नक्सलवाद की कमर टूट गई।
- रणनीतिकारों ने सरेंडर किया: सुरक्षाबलों के सामने जिन माओवादियों ने सरेंडर किया, वे बड़ी संख्या में हथियार लेकर आए थे। हथियार की सशस्त्र आंदोलन को जिंदा रख रहे थे। वे खुद मुख्यधारा में लौटे, हथियार भी लेकर आए जो चौंकाने वाले रहे। दंडकारण्य जोनल कमेटी के बड़े नाम पापा राव ने अपने 17 नक्सली साथियों के साथ बीजापुर में सरेंडर कर दिया। वह आखिरी बड़े कमांडर थे, जिन्होंने सरेंडर किया। उनसे पहले सेंट्र कमेटी मेंबर और शूटिंग कमांडर रहे रामधेर मज्जी ने समर्पण किया था। उन पर 1 करोड़ रुपये का इनाम था। उनके सरेंडर के बाद महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ (MMC जोन) को नक्सलमुक्त घोषित किया गया। राम तुलवी उर्फ जीवन तुलवी, सोनू दादा और रूपेश जैसे सेंट्रल कमेटी स्तर के नेताओं ने सरेंडर किया। जिन नेताओं के सहारे नक्सलवाद फल-फूल रहा था, उनके ही सरेंडर करने के बाद नक्सल आंदोलन की रीढ़ टूट गई। ज्यादातर बड़े नक्सली मुख्यधारा में लौट आए।
कैसे खत्म हुआ नक्सलवाद?
छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने 31 मार्च को कहा था, 'राज्य में हथियारबंद नक्सली कैडर पूरी तरह से समाप्त हो गया है और अब मुख्य चुनौती पर्यावरण तथा आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के साथ बस्तर का विकास है। दो वर्ष पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय करना, तकनीक आधारित खुफिया तंत्र और सुरक्षा बलों द्वारा सटीक अभियान ने इस दिशा में अहम भूमिका निभाई।'
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विजय शर्मा, डिप्टी सीएम, छत्तीसगढ़:-
हथियारबंद नक्सलवाद से मुक्ति का जो विषय था, वह अब पूरा हो चुका है। छत्तीसगढ़ में सशस्त्र नक्सलियों का पूरा कैडर समाप्त हो गया है। आज जब हम बात कर रहे हैं, तो मेरा मानना है कि जो 15-20 नक्सली शेष हैं, वे भी पुनर्वास की प्रक्रिया में हैं। 31 मार्च 2026 की निर्धारित समयसीमा तक राज्य में नक्सली संगठन का सशस्त्र कैडर पूरी तरह समाप्त हो चुका है। आपको बस यह रात गुजारनी है, छत्तीसगढ़ में नक्सली संगठन असल में खत्म हो चुका है। नक्सल विरोधी भियान इतने सटीक थे कि सुरक्षा कर्मियों को खरोंच तक नहीं आई, जबकि कई नक्सली मारे गए। पिछले दो वर्षों में हमारी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि नक्सलवाद पर नियंत्रण पाना रही है।
अब छत्तीसगढ़ के लिए क्या संभावनाएं हैं?
विजय शर्मा ने कहा है कि बस्तर और नक्सल प्रभावित इलाकों से सुरक्षाबल फिलहाल नहीं हटेंगे। जनता का भरोसा, जब तक कायम नहीं होता है, तब तक राज्य की सुरक्षा, सरकार की जिम्मेदारी है।
विजय शर्मा, डिप्टी सीएम, छत्तीसगढ़:-
यह सच है कि पूरा कैडर खत्म हो चुका है, लेकिन लोगों को इसे पूरी तरह स्वीकार करने में समय लगेगा। एहतियाती इंतजाम जारी रहेंगे। अंदरूनी इलाकों में मौजूद करीब 400 सुरक्षा शिविरों को धीरे-धीरे पुलिस थानों, स्कूलों, अस्पतालों या पंचायत भवनों जैसे आधारभूत ढांचों में बदला जाएगा।
विजय शर्मा की तारीफ क्यों हुई?
विजय शर्मा, डिप्टी सीएम, छत्तीसगढ़:-
अगर नक्सली नेटवर्क पूरी तरह समाप्त हुआ है तो यह केंद्र और राज्य सरकार दोनों के लिए बड़ी उपलब्धि है। आखिर, एक समय देश में होने वाली 80 प्रतिशत नक्सली गतिविधियां छत्तीसगढ़ में केंद्रित थीं। बस्तर में अब सबसे बड़ी चुनौती विकास की है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण, आदिवासी संस्कृति को बचाए रखना और युवाओं के लिए आर्थिक अवसर सृजित करना शामिल है।
छत्तीसगढ़, नक्सलवाद का केंद्र रहा है। यह सच है कि दंतेवाड़ा क्षेत्र में ही 80 फीसदी से ज्यादा नक्सली घटनाएं होती थीं, जिनमें आदिवासी और सुरक्षाबलों के जवान मारे जाते थे। आंध्र प्रदेश और दक्षिण से आए नक्सली, इसी बेल्ट में सक्रिय थे। नक्सली संगठनों पर आरोप लगते रहे हैं कि इन्हें बहकाने वाले बड़े नेता तो आमतौर पर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के होते हैं, मासूम अदिवासियों को फंसाकर शोषण किया जाता है। विजय शर्मा ने आदिवासियों को समझाने की कोशिश की।
उन्होंने पत्रकारों का सहारा लिया, नक्सलियों से संवाद की कोशिश की। घर-घर जाकर उन्होंने नक्सलियों के परिवारों से मुलाकात की, उन्हें समझाया कि मुख्य धारा में लाने के लिए अपने परिवार को राजी करें। उन्होंने गांवों में घूम-घूमकर आश्वासन दिया कि सरकार उन्हें सुरक्षा देगी, पुनर्वास देगी। अमित शाह ने जनवरी 2024 में छत्तीसगढ़ सरकार के गठन के बाद एक ठोस रणनीति तैयार की थी। उनका प्लान केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें 'सुरक्षा, विकास और संवाद' का ध्यान रखा गया था। विजय शर्मा की पहल कुछ ऐसी ही रही।
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पिछले दो साल में छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान तेज कर दिए गए थे। खुद गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में बताया कि बीते 3 साल में 4,839 नक्सलवादियों ने आत्मसमर्पण किया, 706 मारे गए और 2218 गिरफ्तार हुए। विजय शर्मा ने नक्सलियों से सीधे बातचीत की अपील की और सरेंडर करने वालों के लिए बेहतर पुनर्वास नीति पर जोर दिया। वह माड़वी हिड़मा की मां से मिलने गए थे, उनसे अपील की थी कि उसे मुख्य धारा में आने के लिए राजी करें। अलग बात है कि उसे आंध्र प्रदेश में हुए एक एनकाउंटर में ढेर कर दिया गया। बड़ी संख्या में वह पुनर्वास कराने में सफल भी हुए।
क्या पूरी तरह मिट गया है नक्सलवाद?
विजय शर्मा ने हाल में दिए गए कई इंटरव्यू में कहा कहा है कि नक्सलियों का संगठनात्मक ढांचा टूट गया है, अब गिने-चुने कैडर बचे हैं। वे मुख्यधारा में लौटने की तैयारी कर रहे हैं। उनके ज्यादातर हथियार सुरक्षाबल रिकवर कर चुके हैं। CRPF और इंटेलिजेंस जो बचे हैं, उन्हें भी तलाश रहे हैं। अगर वे लौटते हैं तो ठीक नहीं तो उन्हें ढेर कर दिया जाएगा। जिस छत्तीसगढ़ में दशकों से नक्सली आंतक फल-फूल रहा था, वही नक्सलवाद के अंतिम सांसों का गवाह भी बना।
विजय शर्मा कौन हैं, कैसे सियासत में आए, सब जानिए
विजय कुमार शर्मा, दिसंबर 2023 से राज्य के उप मुख्यमंत्री पद की कमान संभाल रहे हैं। उनका जन्म 19 जुलाई 1973 को कवर्धा में हुआ था। उनके पिता रतन लाल शर्मा किसान थे। विजय शर्मा ने फिजिक्स में BSC और MSC की है। वह MCA भी हैं। टेकीकॉम सेक्टर की नौकरी से लेकर सियासत तक का सफर उनका दिलचस्प रहा है। उन्होंने अपनी राजनीति, भारतीय जनता युवा मोर्चा से की। फिर वह छत्तीसगढ़ बीजेपी के युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। साल 2016 से 2020 तक, यह जिम्मेदारी उनके पास रही।
विजय शर्मा, बाद में बीजेपी के प्रदेश सचिव बने और फिर प्रदेश महासचिव बन गए। वह कबीरधाम जिले में बीजेपी अध्यक्ष और जिला पंचायत सदस्य भी रहे हैं।
साल 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कवर्धा सीट से कांग्रेस के मोहम्मद अकबर को 39,592 वोटों के बड़े अंतर से हराया। पहली बार विधायक बने। उन्हें बीजेपी ने नया चेहरा होने के बाद भी उप मुख्यमंत्री बना दिया। 13 दिसंबर 2023 को उन्होंने अपने पद और गोपनीयता की शपथ ली। तब से लेकर अब तक, वह राज्य में लगातार चर्चा में बने हुए हैं।
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कौन-कौन से विभाग संभाल रहे हैं विजय शर्मा?
- गृह और जेल
- पंचायत एवं ग्रामीण विकास
- तकनीकी शिक्षा और रोजगार
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी
क्यों चर्चा में रहते हैं?
विजय शर्मा की तारीफ, कानून-व्यवस्था को लेकर होती है। वह जमीन पर सक्रिय नजर आते हैं, लोगों के गांव-गांव घूमकर मुलाकात करते हैं। वह राज्य में कानून-व्यवस्था, ग्रामीण विकास, नक्सल विरोधी अभियान और तकनीकी शिक्षा जैसे मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं। वह नक्सल प्रभावित इलाकों में जाते हैं, नक्सलियों के परिवारों से बात करते हैं, उनसे वापस लौटने का आग्रह करते हैं। उन्होंने कहा है कि कानूनी तरीके से आप लड़िए, आपको अधिकार दिया जाएगा लेकिन हथियार बंद किसी आंदोलन की इजाजत नहीं दी जा सकती है।
