संजय सिंह, पटना: बिहार की राजनीति इन दिनों एक बड़े सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? करीब दो दशक बाद यह सवाल एक बार फिर ‘यक्ष प्रश्न’ बनकर पाटलिपुत्र की राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के भीतर कई ऐसे चेहरे उभरकर सामने आए हैं, जो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में बताए जा रहे हैं। पार्टी के अंदरूनी समीकरण, जातीय संतुलन, संगठनात्मक पकड़ और केंद्रीय नेतृत्व की पसंद आदि के बीच छह नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति में आने वाले समय में बीजेपी की रणनीति और नेतृत्व चयन बेहद अहम साबित होगा। मुख्यमंत्री की संभावित रेस में उपमुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री और संगठन के मजबूत खिलाड़ी तक शामिल हैं।
सम्राट चौधरी: आक्रामक शैली और ‘लव-कुश’ समीकरण
बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इस दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा है। वह राज्य कैबिनेट में मुख्यमंत्री के बाद सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके सम्राट चौधरी कोइरी (कुशवाहा) समुदाय से आते हैं। बिहार की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में रहा ‘लव-कुश’ यानी कुर्मी-कोइरी समीकरण उनके पक्ष में जाता है। राज्य की आबादी में कोइरी समुदाय लगभग 4.2 प्रतिशत माना जाता है। सम्राट की सबसे बड़ी पहचान उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली और विपक्ष पर तीखे हमले हैं। हालांकि, उनके राजनीतिक करियर में आरजेडी और जेडीयू से जुड़ा अतीत विपक्ष की ओर से बड़ा मुद्दा बनाया जा सकता है।
यह भी पढ़ें: कोई दिग्गज नेता या फिर डार्क हॉर्स? बिहार में CM के नाम पर माथापच्ची शुरू
नित्यानंद राय: शाह के भरोसेमंद, यादव समीकरण की कुंजी
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय बीजेपी के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिन पर केंद्रीय नेतृत्व खासकर अमित शाह का भरोसा है। एबीवीपी पृष्ठभूमि से आने वाले राय बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। यादव समुदाय से आने वाले नित्यानंद राय को बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा माना जाता है, जिसमें आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो अन्य ओबीसी और ईबीसी समुदायों में असंतोष पैदा हो सकता है।
विजय सिन्हा: सख्त तेवर और साफ छवि
बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा भी मुख्यमंत्री पद की चर्चा में प्रमुख नाम हैं। वह एक प्रखर वक्ता और आक्रामक राजनीतिक शैली के लिए जाने जाते हैं। विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी निष्पक्ष और सख्त कार्यप्रणाली की काफी चर्चा हुई थी। सदन में अनुशासन और नियमों के पालन को लेकर उनकी सख्ती ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। भूमि राजस्व विभाग से जुड़े उनके कई फैसलों की भी सराहना होती रही है। भूमिहार समुदाय से आने वाले विजय सिन्हा सवर्ण वर्ग के एक मजबूत राजनीतिक चेहरे माने जाते हैं, जिससे बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक को मजबूती मिल सकती है।
यह भी पढ़ें: UGC नियमों का असर दिखने लगा? बिहार-झारखंड में BJP-ABVP को मिली हार
संजय जायसवाल: सौम्य छवि, वैश्य समाज में पकड़
पश्चिम चंपारण से लगातार सांसद और बिहार बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल भी संभावित चेहरों में शामिल हैं। 2009 से संसद में प्रतिनिधित्व कर रहे जायसवाल की पहचान एक सौम्य लेकिन प्रभावी नेता के रूप में है। वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखने वाले संजय जायसवाल पार्टी संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के करीब माने जाते हैं। विपक्ष से टकराव के बजाय संयमित लेकिन मजबूत राजनीतिक शैली उनकी खासियत मानी जाती है। जातीय समीकरण के लिहाज से भी उनका नाम बीजेपी की रणनीति में फिट बैठता है।
दिलीप जायसवाल: संगठन के भरोसेमंद खिलाड़ी
बिहार सरकार में उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल को बीजेपी के मजबूत संगठनात्मक नेताओं में गिना जाता है। वह उस दौर में बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष थे जब विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 202 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वैश्य (कलवार) समुदाय से आने वाले दिलीप जायसवाल को केंद्रीय नेतृत्व, खासकर अमित शाह का करीबी माना जाता है। किशनगंज से आने वाले जायसवाल को शांत, व्यवहारिक और संगठन को मजबूत करने वाला नेता माना जाता है।
यह भी पढ़ें: दिल्ली में बन गई रिंग लाइन मेट्रो, PM मोदी करने वाले हैं उद्घाटन
जनक राम: दलित चेहरे के रूप में उभार
बीजेपी के वरिष्ठ नेता जनक राम भी इस सूची में शामिल हैं। वह बिहार में पार्टी के प्रमुख दलित चेहरों में गिने जाते हैं। गोपालगंज के पूर्व सांसद और वर्तमान में एमएलसी जनक राम खान एवं भूतत्व तथा अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण मंत्री रह चुके हैं। रविदास समुदाय से आने वाले जनक राम की पहचान जमीनी नेता के रूप में है। वे अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल रहते हैं लेकिन संगठन में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।
राजनीतिक समीकरण करेंगे फैसला
बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री का चयन सिर्फ लोकप्रियता से नहीं बल्कि जटिल जातीय और राजनीतिक समीकरणों से तय होता रहा है। बीजेपी के सामने भी यही चुनौती है। ऐसा चेहरा सामने लाना जो संगठन, जातीय संतुलन और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति तीनों पर खरा उतरे। फिलहाल इन छह चेहरों के इर्द-गिर्द ही बिहार की अगली सत्ता की चर्चा घूम रही है। आने वाले समय में पार्टी की रणनीति, गठबंधन की स्थिति और चुनावी गणित यह तय करेगा कि पाटलिपुत्र की सत्ता का ताज आखिर किसके सिर सजेगा।
