केंद्र और प्रदेश सरकार बांग्लादेशी घुसपैठ रोकने के लिए लगातार सख्त कदम उठा रही है, इसके बावजूद बांग्लादेशी नेपाल के रास्ते यूपी में घुसने में कामयाब हो रहे हैं। हाल ही में लखनऊ पुलिस ने एक चौंकाने वाले मामले का खुलासा किया है।
पुलिस ने सीतापुर रोड पर स्थित अस्ती रेलवे क्रासिंग के पास 11 साल से बंगाली चांदसी क्लीनिक चलाने वाले आरूप बख्शी को हिरासत में लिया। पूछताछ में पता चला कि आरूप बांग्लादेशी है।
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कैसे भारत में आकर बस गया बांग्लादेशी?
आरूप बख्शी वर्ष 2012 में बांग्लादेश से नेपाल गया। वहां से नेपाल बॉर्डर पार करके लखीमपुर खीरी के रास्ते सीतापुर पहुंचा। वह महोली इलाके में दो साल तक रहा। इस दौरान उसने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य जरूरी कागजात बनवा लिए।
हाइड्रोसील का इलाज करता था बांग्लादेशी
साल 2014 में वह लखनऊ आ गया और अस्ती रेलवे क्रासिंग के पास एक वकील के घर में किराए पर रहने लगा। यहां उसने बंगाली क्लीनिक खोल लिया। वह खुद को डॉक्टर बताकर लोगों का हाइड्रोसील का इलाज करता था।
फर्जी दस्तावेजों के सहारे पासपोर्ट बनवाया
वर्ष 2016 में उसने उसी फर्जी दस्तावेजों के सहारे पासपोर्ट भी बनवा लिया। इलाके के लोग उसे बांग्लादेशी नहीं समझ पाए। पुलिस के अनुसार, आरूप की शादी हो चुकी है।
पासपोर्ट के लिए भी कर चुका है आवेदन
कुछ समय पहले उसके माता-पिता वीजा लेकर भारत आए थे। वे फिलहाल उत्तराखंड के उधम सिंह नगर में हैं। पुलिस उसकी पत्नी और अन्य परिजनों की जानकारी जुटा रही है। आरूप ने सीतापुर के पते पर पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था।
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क्या सवाल उठ रहे हैं?
सवाल उठ रहा है कि सीतापुर पुलिस और एलआईयू ने जांच कैसे की कि बांग्लादेशी होने का पता ही नहीं चला। स्थानीय लोगों के मुताबिक, आरूप ने ममापुर बाना में प्लॉट खरीदा था। वह अक्सर नैनीताल जाता था और वहां भी उसकी संपत्ति है।
कैसे हुई है कार्रवाई?
पुलिस नेपाल बॉर्डर और सीतापुर पुलिस से मिले इनपुट के आधार पर कार्रवाई कर रही है। नेपाल में नई सरकार बनने के बाद बिना पहचान पत्र के बॉर्डर पार करना बंद कर दिया गया है।
अब आगे क्या है?
आरूप बख्शी के खिलाफ धोखाधड़ी और विदेशी अधिनियम समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस फर्जी दस्तावेज बनाने में उसकी मदद करने वालों की भी तलाश कर रही है।
