अर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (AI) की रेस में दुनिया के हर देश ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया है। यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका से लेकर एशिया तक के हर बड़े देश की पहली प्राथमिकता है कि कैसे AI सेक्टर में आत्मनिर्भर बना जाए। किसी देश में सेमीकंडक्टर बनाने की कवायद हो रही है, किसी देश में डेटा सेंटर, कहीं ग्राफिक्स प्रॉसेसिंग यूनिट (GPU) बनाने की। दुनिया का एक देश ऐसा भी है, जो इस रेस में न होकर भी खुद को टॉप 5 देशों में बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यह इशारा किया है कि वह विदेशी फंडिंग से अपने देश के लिए AI मॉड्यूल तैयार करेंगे। वह पैसा नहीं खर्च करेंगे लेकिन डेटा पर उनका कंट्रोल होगा, तकनीक का इस्तेमाल करेंगे, वह भी बिना अपनी अर्थव्यवस्था पर भार दिए हुए। उन्होंने AI सेक्टर में विदेशी निवेश तो बुलाया है लेकिन खुद सीधे तौर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं।
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इमैनुएल मैक्रों, विदेशी निवेश पर निर्भर क्यों?
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हाल ही में मशहूर भारतीय पॉडकास्टर राज शमानी के शो 'फिगरिंग आउट' में वैश्विक तकनीक और राजनीति पर खुलकर बात की। उन्होंने मान लिया कि यूरोप के पास बेहतरीन वैज्ञानिक और टैलेंट तो है, लेकिन अमेरिका और चीन के मुकाबले वह स्केल, पूंजी और जोखिम लेने की क्षमता में पीछे रह गया है। इमैनुअल मैक्रों मानत हैं कि यूरोप का बाजार बहुत बिखरा हुआ है, जिससे वहां के स्टार्टअप्स अमेरिका और चीन को पीछे नहीं छोड़ पा रहे हैं।
फ्रांस इससे निपटने के लिए क्या करेगा?
इमैनुअल मैक्रों ने इस संकट से उबरने के लिए फ्रांस की 109 अरब यूरो की AI योजना का जिक्र किया है। इस डील में दिलचस्प बात यह है कि संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश, भारी निवेश कर रहे हैं। AI तकनीक, हार्डवेयर, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर सब अमेरिका के होंगे। फ्रांस सिर्फ अपनी जमीन देगा, जहां ये इन्फ्रास्ट्रक्चर होगा। फिर इसमें स्वदेशी क्या होगा? इस सवाल का भी इमैनुअल मैक्रों ने जो जवाब दिया है, वह कई देशों के लिए मॉडल हो सकता है। इमैनुअल मैक्रों का मानना है कि बुनियादी ढांचे का फ्रांस की धरती पर होना और यूरोपीय नियमों का पालन करना ही असली 'डिजिटल संप्रभुता' है।
इमैनुअल मैक्रों मानते हैं कि निवेश भले ही विदेशी हो, संसाधन विदेशी हो लेकिन फ्रांस में होने की वजह से उन पर नियंत्रण इसी देश का रहेगा। यूरोपीय नियम भी लागू होंगे। डेटा का कंट्रोल, फ्रांस के पास होगा, न कि UAE या अमेरिका के पास। अगर ऐसी स्थिति है तो बिना एक भी पैसे के निवेश के, फ्रांस को सीधे तकनीक और उसका नतीजा मिल रहा है। यह घाटे का सौदा नहीं है।
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फ्रांस के पास अपना AI मॉडल क्या है?
विदेशी निवेश के साथ-साथ फ्रांस, OpenAI की तर्ज पर Mistral AI जैसे घरेलू प्रोजेक्ट पर जोर दे रहा है। Mistral AI फ्रांस स्थित एक दिग्गज AI रिसर्च, जो 2023 में स्थापित हुई थी। यह अपने ओपन-सोर्स और एक्सपर्ट लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) के लिए जानी जाती है। यह OpenAI को टक्कर देने में सक्षम है। यह चैटबॉट, कोडिंग और जटिल मुश्किलों को सुलझाने में सक्षम है।
विदेशी दबाव के बीच कैसे AI की रेस में टिकेगा फ्रांस?
इमैनुअल मैक्रों, 'संप्रभु AI' का सपना देख रहे हैं लेकिन विदेशी फंडिंग के जरिए। उनका सीधा सा कहना है कि पैसा कहीं का हो, निवेश कहीं का हो लेकिन कानून हमारा है। संप्रभुता का अर्थ होता है कि अपना संसाधन, अपना पैसा और अपना नियंत्रण। इमैनुअल मैक्रों मानते हैं कि अगर, अगर डेटा सेंटर फ्रांस की जमीन पर हैं तो उन पर भी 'द जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन' और फ्रांसीसी कानून लागू होंगे।
इमैनुअल मैक्रों का साफ कहना है कि निवेश चाहे UAE से आए या कहीं और से, उन मशीनों पर चलने वाला 'एल्गोरिदम' और 'डेटा' फ्रांस के नियंत्रण में रहेगा। जिसके पास डेटा है, उसे कंट्रोल करने की क्षमता है, उसी का दबदबा है। फ्रांस, बिना निवेश के ही यह हासिल कर रहा है, यह फ्रांस की सफलता है।
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फ्रांस, खाड़ी के देशों से ले रहा निवेश?
AI का बुनियादी ढांचा, डेटा सेंटर और GPU बेहद महंगा है। यूरोप AI इनोवेशन से बच रहा है। दुनिया की टॉप टेक कंपनियों के बेहतरीन इंजीनियर, टेक लीडर्स भारत से हैं। फ्रांस में भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई बेहतर फ्रांस इसी आधार पर सिलिकॉन वैली के मुकाबले बेहतर पूंजी की तलाश में है।
UAE और सऊदी अरब जैसे देश अपने तेल-आधारित अर्थव्यवस्था को बदलने के लिए AI में भारी निवेश कर रहे हैं। फ्रांस के लिए यह एक बड़ा मौका है। UAE की पूंजी, फ्रांस को गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के बराबर खड़े होने की वित्तीय क्षमता देगा।
मुश्किलें क्या आएंगी?
पैसा खाड़ी देशों का है, होस्टिंग फ्रांस में है, लेकिन 'चिप्स' अभी भी अमेरिका की कंपनी Nvidia की हैं। जब तक यूरोप अपना खुद का हाई-एंड हार्डवेयर नहीं बनाता, संप्रभुता की उम्मीद बेमानी है। निवेश UAE का होगा लेकिन टेक, पूरी तरह से अमेरिका का होगा। अमेरिका, उन देशों में शुमार है जो कभी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में भरोसा नहीं जताता है।
अमेरिका का व्यापार भी डोनाल्ड ट्रंप जैसे राष्ट्रपति की वजह से अप्रत्याशित है। वह कब, किस पर क्या नियम बना दें, कोई इसका अनुमान नहीं लगा सकता है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या विदेशी निवेशक केवल मुनाफा कमाएंगे या वे फ्रांस को तकनीक भी देंगे।
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भारत के लिए क्या सीख है?
भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में डेटा सेंटर्स की किल्लत झेल रहा है। ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) की रेस में भी भारत 6वें पायदान पर है। अमेरिका और UAE दोनों का प्रदर्शन, इस लिस्ट में भारत से बेहतर है। फ्रांस की तरह, भारत को भी हाइब्रिड मॉडल पर जोर देना होगा।
भारत अभी, अमेरिका, चीन और ताइवान जैसे देशों से GPU करीदता है। अगर ये देश, भारत को GPU बेचने की जगह, भारत में निवेश करना शुरू करें तो आर्थिक बोझ कम होगा। जॉन पेडी रिसर्च के मुताबिक साल 2023-24 में केवल इन 3 देशों से भारत 60 करोड़ रुपये से ज्यादा के GPU खरीद चुका है।
भारत के लिए भी यह बेहतर होगा कि पूंजी खाड़ी देशों से ले, अपनी इंजीनियरिंग क्षमताओं का इस्तेमाल करे और यूरोप, एशिया और अफ्रीका के देशों को सुविधाएं बेचे। अगर भारत में फ्रांस की तरह बुनियादे ढांचे पर कंट्रोल रहेगा तो 'डिजिटल संप्रभुता' पर आंच भी नहीं आएगी और भारत बिना बड़े निवेश के बेहतर व्यापार कर सकेगा।
