logo

मूड

ट्रेंडिंग:

5 रुपये का पैकेट, करोड़ों का कारोबार अनब्रांडेड स्नैक्स की असली ताकत

भारत के स्नैक्स के बाजार का 56 प्रतिशत हिस्सा उन लोगों के हाथ में है जिनका कोई नाम नहीं, कोई दुकान नहीं, कोई विज्ञापन नहीं। फिर भी ये 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा रहे हैं।

AI Generated Image

प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

शेयर करें

google_follow_us

हर गली नुक्कड़ पर आपको चने, नमकीन, या मूंगफली बेचने वाले दिख जाएंगे। कई बात दुकानों में या कई बार ठेले पर। बस 5 या 10 रुपये में। छोटे दुकानदार इस व्यवसाय से रोजाना पैसे कमाते है और अपना घर चलाते हैं। भारत में ऐसे छोटे-छोटे लाखों दुकानदार हैं जो भारत के स्नैक्स के बाजार का 40 से 56 प्रतिशत हिस्सा हैं। ये दुकानदार जो स्नैक्स बेचते हैं वह बिना किसी विज्ञापन के और बिना किसी बड़ी कंपनी के इतनी बड़ी इंडस्ट्री चलाते हैं। 2025 में भारत का पूरा स्नैक्स का बाजार करीब 50,590 करोड़ रुपये का है। इसमें से 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये इन्हीं छोटे दुकानदारों के पास जाते हैं। 

 

Lay's, Kurkure, Haldiram's ये सब स्नैक्स मार्केट में बड़े नाम हैं। पैसे के हिसाब से इनका हिस्सा 60 प्रतिशत है लेकिन जितना खाना रोज बिकता है, उसमें खुले और बिना नाम वाले स्नैक्स पैकेट्स का हिस्सा 56 प्रतिशत है। इसका मतलब यह है कि दाम में बड़े ब्रांड आगे हैं। जैसे- हल्दीराम्स साल में 8,700 करोड़ कमाती है। बालाजी वेफर्स ने पिछले साल 6,500 करोड़ कमाए। छोटे शहरों और गांवों में आज भी खुली नमकीन और खुली भुजिया ज्यादा बिकती है।

 

यह भी पढ़ें: बिजनेस सीखना है? ये 5 फिल्में आपको MBA से भी ज्यादा सिखा सकती हैं

इनका पैसा बनता कैसे है?

खुले में स्नैक्स बेचने वाली कंपनियों का फॉर्मूला बहुत सीधा है। इसमें खर्चा कम और कमाई ज्यादा। बड़ी कंपनी को विज्ञापन देना होता है, बड़ी पैकेजिंग करनी होती है, बड़ा दफ्तर चलाना होता है। यह सब प्रोडक्ट की कीमत में जुड़ता है। यह कारण बड़ी कंपनियों के प्रोडक्ट के दाम बढ़ाते हैं। वहीं, छोटे निर्माताओं को ब्रांडिंग और अच्छी पैकेजिंग इत्यादि पर खर्च नहीं करना होता है। कच्चा माल पास की मंडी से आता है, उत्पादन घर पर होता है, पैकेजिंग साधारण पॉलीथिन में होती है और इनके परिवार के लोग ही इसे बनाने में काम करते हैं। एक छोटी यूनिट में प्रति किलो उत्पादन लागत करीब 200 रुपये है और बिक्री 600 से 800 रुपये प्रति किलो पर होती है।

लोकल बिजनेस का दम

ये छोटी कंपनियां पूरे देश में काम नहीं करतीं, बल्कि अपने आसपास के इलाके या जिले में बहुत मजबूत होती हैं। दुकानदार के साथ इनका सीधा मेल-जोल होता है और दुकानदार को इनका सामान बेचने पर कमाई भी ज्यादा होती है। ये लोग वही स्वाद बनाते हैं जो वहां के लोगों को पसंद आता है जो बड़े ब्रांड नहीं दे पाते। इनका सारा लेनदेन नकद में होता है इसलिए पैसा कभी नहीं फंसता। जब महंगाई बढ़ती है और लोग महंगा सामान नहीं खरीद पाते, तब ये सस्ते और अच्छे सामान के तौर पर सबकी पहली पसंद बन जाते हैं। इसी वजह से बड़ी कंपनियां भी इनके सामने टिक नहीं पातीं।

 

यह भी पढ़ें: मिडिल क्लास का पैसा कहां जा रहा है? EMI, SIP और क्रेडिट कल्चर का नया गेम

आगे क्या होगा?

आजकल सरकारी नियम सख्त हो रहे हैं और लोग भी साफ-सफाई पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। साथ ही, ऑनलाइन सामान खरीदने का चलन बढ़ने से इन छोटे ब्रांड्स पर थोड़ा दबाव बढ़ गया है। इनका गांव का बाजार अभी बहुत बड़ा है और वहां कम कीमत वाले सामान का कोई दूसरा तोड़ नहीं है। 2034 तक यह बाजार 1 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर निकल जाएगा। इसमें बड़े ब्रांड्स और छोटे लोकल ब्रांड्स, दोनों के लिए अच्छी जगह होगी।

Related Topic:#Business News

और पढ़ें