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नकद से नेटवर्क तक, आखिर क्या है भारत की Hidden Economy की दुनिया?

भारत की शैडो इकॉनमी और कैश लेनदेन का नेटवर्क बहुत बड़ा है। यह अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालती है जिसे रोकने के लिए सरकार लगातार सुधार कर रही है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Freepik

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भारत में बहुत सारा पैसा ऐसा है, जो कमाया जाता है, खर्च होता है, हाथ बदलता है लेकिन सरकार को कभी पता नहीं चलता। इसे ही हिडन इकॉनमी कहते हैं यानी वह अर्थव्यवस्था जो दिखती तो नहीं लेकिन चलती जरूर है। अनुमान है कि भारत में हर 100 रुपये में से करीब 26 रुपये इसी छुपी हुई दुनिया में घूमते हैं। जब कोई दुकानदार कैश लेता है और रसीद नहीं देता, जब कोई मकान मालिक किराया नोटों में लेता है और कहीं नहीं लिखता तो वह उसी दुनिया का हिस्सा होता है।

 

हिडन इकॉनमी को शैडो इकॉनमी भी कहते हैं। इसमें वे सारे काम आते हैं जो रियल हैं, जिनमें पैसा कमाया और खर्च किया जाता है लेकिन जिनकी कोई सरकारी जानकारी नहीं होती। न टैक्स भरा जाता है, न GST कटती है, न कोई रसीद मिलती है। एक छोटे से नाई की दुकान से लेकर बड़े बिल्डरों तक, एक रिक्शा चालक से लेकर कुछ बड़े व्यापारियों तक इस अर्थव्यवस्था का दायरा बहुत बड़ा है। इसमें सड़क किनारे के ठेले वाले से लेकर खेती के मजदूर और निर्माण कार्य तक सब शामिल हैं। यह सिर्फ गरीबों या छोटे लोगों की दुनिया नहीं है अमीर और पढ़े-लिखे लोग भी इसका हिस्सा होते हैं। 

 

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कुछ जरूरी आंकड़े

दुनिया की कुल शैडो इकॉनमी करीब 12.5 खरब डॉलर की है और इसकी सबसे ज्यादा हिस्सेदारी बड़े देशों में है। साल 2000 में दुनिया की शैडो इकॉनमी GDP का 17.7 फीसदी थी जो 2023 तक घटकर 11.8 फीसदी पर आ गई लेकिन भारत में यह गिरावट बहुत धीमी है। भारत का Tax-to-GDP ratio सिर्फ करीब 6 फीसदी है जो इस बड़ी हिडन इकॉनमी की वजह से ही इतना कम है। जितना ज्यादा पैसा छुपेगा उतना कम टैक्स आएगा और उतनी कम सरकारी सुविधाएं मिलेंगी। 

 

भारत में आज भी नकद यानी कैश सबसे ज्यादा चलता है। इसकी वजह सीधी है कैश में कोई निशान नहीं छूटता। न बैंक की एंट्री, न डिजिटल रिकॉर्ड, न कोई सवाल। यही वजह है कि किराए की दुकान हो, मजदूरी हो या जमीन का सौदा बहुत सारे लेनदेन आज भी नोटों में होते हैं। रियल एस्टेट सेक्टर तो भारत की पैरेलल इकॉनमी का करीब 45 फीसदी हिस्सा अकेले बनाता है। यानी जमीन-मकान का धंधा इस छुपी हुई अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा खिलाड़ी है।

सिर्फ कैश नहीं, नेटवर्क भी है

हिडन इकॉनमी अब सिर्फ नोटों तक सीमित नहीं है। इसमें एक पूरा नेटवर्क काम करता है। कोई ठेकेदार बिना बिल के काम करवाता है, कोई डॉक्टर फीस की रसीद नहीं देता, कोई किराएदार किराए का कोई लिखित हिसाब नहीं रखता। इन सब लेनदेन में पैसा घूमता है, लोग कमाते हैं, खर्च करते हैं लेकिन ये सब सरकार की नजर से बाहर रहता है। कुछ जगहों पर तो पूरे-पूरे बाजार इसी तरह चलते हैं जहां हर चीज 'बिना बिल के' होती है।

सरकार ने क्या-क्या कदम उठाए?

नवंबर 2016 में सरकार ने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद कर दिए जो उस वक्त देश में चल रहे कुल कैश का करीब 86 फीसदी थे। इसका मकसद था कि जो काला पैसा नोटों में छुपाया गया है वह सामने आए। इसके साथ ही जुलाई 2017 में GST लागू किया गया जिसने तमाम अलग-अलग टैक्सों की जगह एक ही टैक्स सिस्टम बना दिया।

 

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इससे कारोबारियों के लिए छुपाना मुश्किल हो गया क्योंकि हर खरीद-बिक्री की डिजिटल एंट्री होने लगी। जन-धन योजना, आधार और मोबाइल की तिकड़ी जिसे JAM Trinity कहते हैं  इसने लाखों लोगों को पहली बार बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा। इसके अलावा UPI और डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने से लेनदेन का रिकॉर्ड रखना आसान हो गया। 

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