भारत के समुद्री कारोबार यानी सीफूड एक्सपोर्ट में बहुत बड़ी तेजी आई है। इसका सबसे बड़ा और अच्छा असर अब जमीन पर हमारे मछुआरों की जिंदगी में साफ दिखने लगा है। निर्यात में हुई इस बढ़ोतरी ने सीधे तौर पर मछुआरों और छोटे कारोबारियों की किस्मत बदलने का काम किया है। पहले मछुआरों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा बीच के लोग खा जाते थे लेकिन अब निर्यात बढ़ने से मछुआरों को अपनी पकड़ का पहले के मुकाबले 20 से 25 प्रतिशत तक ज्यादा दाम मिल रहा है।
इस पूरे सेक्टर ने अब तक लगभग 40 लाख लोगों को काम दिया है। एक और अच्छी बात यह है कि समुद्र किनारे जो नई फैक्ट्रियां और प्रोसेसिंग सेंटर खुले हैं, उनमें काम करने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं हैं। इससे समुद्र किनारे इलाकों के लाखों परिवारों की कमाई बढ़ी है और उनकी आर्थिक स्थिति पहले से काफी मजबूत हुई है।
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अगर हम सरकारी आंकड़ों को देखें तो देश का समुद्री निर्यात 60,000 करोड़ रुपये से बढ़कर अब करीब 68,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। कुछ साल पहले तक यह आंकड़ा केवल 45,000 करोड़ रुपये के आस-पास हुआ करता था। सरकार ने अब आने वाले पांच सालों के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का बहुत बड़ा लक्ष्य रखा है। निर्यात में आई यह 23,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त बढ़त ही वह असली वजह है, जिसकी वजह से समुद्र किनारे रहने वाले लोगों के लिए व्यापार के नए दरवाजे खुले हैं।
झींगा पालन बना कमाई का सबसे बड़ा जरिया
समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) की रिपोर्ट बताती है कि इस पूरी कमाई में सबसे बड़ी भूमिका 'झींगे' (Shrimp) की है। दुनिया के बड़े देशों जैसे अमेरिका और चीन में भारतीय झींगे की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है। पहले मछुआरे केवल समुद्र में जाकर मछली पकड़ने पर निर्भर रहते थे लेकिन अब गांवों में शुरू हुए झींगा पालन (Aquaculture) ने छोटे किसानों को भी दुनिया भर के बाजार से जोड़ दिया है। इससे छोटे स्तर पर काम करने वाले लोग भी अब इस बड़े व्यापार का हिस्सा बन गए हैं और अच्छी कमाई कर रहे हैं।
छोटे कारोबारियों के लिए बड़े मौके
सरकारी आंकड़ों और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार अब छोटे व्यापारियों और मछुआरों को विदेशों में माल भेजने के लिए पूरा सहारा दे रही है। इस योजना के तहत मत्स्य पालन के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा निवेश यानी 20,050 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। इस भारी-भरकम बजट का इस्तेमाल समुद्र किनारे आधुनिक कोल्ड स्टोरेज, बर्फ के कारखाने और फिशिंग पोर्ट्स बनाने में किया जा रहा है। इसका सीधा फायदा यह हुआ है कि मछलियां और झींगे अब जल्दी खराब नहीं होते। छोटे व्यापारी अब कम खर्चे में अपना सामान अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक आसानी से पहुंचा पा रहे हैं। आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल और ओडिशा जैसे राज्यों के व्यापार को इससे बहुत ताकत मिली है।
चुनौतियां और आगे का रास्ता
हालांकि, इस कामयाबी के साथ-साथ कुछ मुश्किलें भी सामने खड़ी हैं। विदेशों में माल भेजने के लिए सफाई और क्वालिटी के नियम बहुत सख्त होते हैं। जैसे कि मछली में किसी भी तरह के केमिकल का न होना। इन नियमों को पूरा करना छोटे मछुआरों के लिए कभी-कभी कठिन और महंगा हो जाता है।
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इसके अलावा, बदलता मौसम और समुद्र का बढ़ता तापमान भी एक चुनौती है पर सरकार अब मछुआरों को आधुनिक नावें, बेहतर जाल और ट्रेनिंग दे रही है। अब कोशिश यह है कि सिर्फ कच्ची मछली ही नहीं, बल्कि तैयार भोजन (Ready-to-eat) के पैकेट भी विदेशों में ज्यादा भेजे जाएं, जिससे आने वाले समय में मछुआरों और छोटे कारोबारियों का मुनाफा और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।