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गहने नहीं, EV और सोलर पैनल के चलते कैसे महंगी हो जा रही चांदी?

पिछले कुछ दिनों में चांदी की कीमतों ने निवेशकों से लेकर कारोबारियों तक  को चौंकाया है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि चांदी में निवेश करें या न करें। क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे की असली वजह क्या है?

silver price rise reason explained

चांदी के दाम ने चौंकाया, Photo Credit: Khabargaon

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सोने के दाम बढ़ना अब हर दिन आने वाली खबर जैसा हो गया है। इसके उलट चांदी के दाम बढ़ने से हर कोई हैरान रह गया। इस साल की शुरुआत में चांदी की कीमत 2.5 लाख रुपये प्रति किलो को भी पार कर गई। सोने के गहनों से भारत के लोगों को विशेष प्यार है इसलिए उसकी कीमतें बढ़ना तो समझ आता है लेकिन चांदी की कीमतें बढ़ने का कारण लोग समझ नहीं पा रहे हैं। साल 2025 में चांदी कीमतें 160 प्रतिशत तक बढ़ीं और 2026 के पहले हफ्ते में ही चांदी 7 प्रतिशत और महंगी हो गई। अब कई देश चांदी को लेकर नए-नए नियम निकाल रहे हैं इसकी असल वजह कई ऐसे उत्पाद हैं, जिनका इस्तेमाल बीते कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। 

 

तेजी से बदलती दुनिया ऊर्जा जरूरतों और कई अन्य कामों के लिए अलग-अलग चीजें बना रही है। बीते कुछ साल में चिप और सोलर पैनल जैसी चीजों की मांग और खपत तेजी से बढ़ती है। इसी के चलते कई धातुओं और मिनरल्स की मांग में बढ़ोतरी आई है। इसका असर दुनिया के कई देशों पर पड़ा है और चांदी समेत कई मिनरल्स के दाम आसमान छू रहे हैं। भारत में हम चांदी को गहने बनाने में इस्तेमाल होने वाली एक धातु के रूप में जानते हैं लेकिन इसका इस्तेमाल इससे कहीं ज्यादा है। एक और रोचक तथ्य है कि जितनी चांदी की खपत दुनियाभर में हो रही है, उसमें आधे से ज्यादा चांदी का इस्तेमाल औद्योगिक स्तर पर ही किया जा रहा है। सिर्फ सौर ऊर्जा से जुड़ी चीजें बनाने में ही दुनिया का 15 पर्सेंट चांदी खर्च होने लगा है।

भारत में कितनी चांदी है?

 

भारत में जितनी चांदी की खपत हर साल हो रही है, उसकी तुलना में उत्पादन और उपलब्धता दोनों बहुत कम है। मोटा-माटी ऐसे मानिए कि अगर भारत को एक किलो चांदी की जरूरत है तो 800 से 900 ग्राम चांदी भारत को दूसरे देशों से मंगानी पड़ती है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स (IBM) के मुताबिक, भारत में चांदी की जितनी खदानें हैं, उनमें 87 प्रतिशत सिर्फ राजस्थान में हैं। 5 प्रतिशत खदानें झारखंड में, 3 प्रतिशत आंध्र प्रदेश में और सिर्फ 2 प्रतिशत कर्नाटक में हैं। IBM के डेटा के मुताबिक, भारत में साल 2019-20 में 609 मीट्रिक टन (2562 करोड़ रुपये), 2020-21 में 705 मीट्रिक टन (4266 करोड़ रुपये) और 2021-22 में 647 मीट्रिक टन (4213 करोड़ रुपये) चांदी का उत्पादन हुआ।

 

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भारत में चांदी की मांग की तुलना में यह उत्पादन बेहद कम है। यही वजह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा चांदी आयातक देश है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक रिपोर्ट के मुताबिक चांदी के आयात के मामले में भारत सबसे आगे है। साल 2024 में दुनिया के 20 प्रतिशत चांदी का आयात भारत ने ही किया था। भारत ने एक साल में 6.4 बिलियन डॉलर यानी लगभग 57 हजार करोड़ रुपये की चांदी का आयात किया। वहीं, इसी साल भारत ने सिर्फ 4500 करोड़ रुपये के चांदी के प्रोडक्ट्स का निर्यात किया। यानी निर्यात, आयात से कई गुना ज्यादा था। कीमत के हिसाब से देखें तो जितनी चांदी खनन से निकलती है उसके लगभग 10 गुना के बराबर चांदी दूसरे देशों से मंगाई जाती है।

 

silver price in last 10 years
पिछले 10 साल में चांदी की कीमत, Photo Credit: Khabargaon

 

 

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का इस बारे में कहना है, 'भारत को चाहिए कि वह चांदी को क्रिटिकल इंडिस्ट्रियल एंड एनर्जी-ट्रांजिशन मेटल के रूप में पहचाने और इसका इस्तेमाल क्लीन एनर्जी के लिए करे। इसके लिए भारत को दूसरे देशों में चांदी के खनन के लिए समझौते करने होंगे और स्थानीय स्तर पर चांदी की रीसाइकलिंग पर ध्यान देना होगा ताकि आयात को कम किया जा सके। साथ ही, भारत को यह भी करना होगा कि वह कुछ देशों की बजाय कई जगहों से चांदी का आयात करे।'

भारत में कहां और कैसे मिलती है चांदी?

 

IBM की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के चंदेरिया और कर्नाटक के रायचुर में चांदी सीधे तौर पर निकाली जाती है। यहां एक प्लांट हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड का और एक प्लांट हुत्ती गोल्ड माइंस कंपनी लिमिटेड का है। चांदी अन्य धातुओं के साथ बाय-प्रोडक्ट के तौर पर मिलती है। यानी जब दूसरी धातुओं का खनन होता है और कच्चे माल की साफ-सफाई की जाती है तो उसी में से थोड़ी सी चांदी भी निकलती है।

 

भारत में जितनी चांदी कुल पैदा होती है, उसका 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड की खदानों से ही निकलता है। हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड मुख्य रूप से लेड, जिंक, कॉपर और सोने का खनन करती है और साथ में चांदी भी मिलती है। इसके अतिरिक्त जितनी भी चांदी भारत में इस्तेमाल की जाती है, उन सबका आयात दूसरे देशों से किया जाता है।

 

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IBM की रिपोर्ट बताती है कि साल 2021-22 में चांदी के आयात में 198% का इजाफा हुआ था और एक साल में 4422 टन चांदी का आयात हुआ था। यह वह समय था जब भारत में सोलर, EV और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए चांदी की खपत ने रफ्तार तक नहीं पकड़ी थी। इसके बाद के सालों में इन चीजों में चांदी की खपत कई गुना बढ़ गई है।

कहां से चांदी खरीदता है भारत?

 

ऑब्जर्वेटरी ऑफ इकनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी (OEC) की रिपोर्ट बताती है कि भारत चांदी के लिए यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त अरब अमीरात, हॉन्ग कॉन्ग, रूस और कजाकस्तान जैसे देशों पर निर्भर है। भारत में चांदी से बनने वाले उत्पादों के लिए सबसे बड़ा बाजार यूनाइटेड किंगडम, स्विटजरलैंड और अमेरिका हैं।

 

IBM की साल 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, डेटा बताता है कि दुनियाभर में लगभग 5.5 लाख टन चांदी खदानों में मौजूद है। इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी पेरू की है। पेरू के पास 18 पर्सेंट, ऑस्ट्रेलिया के पास 17 पर्सेंट, चीन के पास 13 पर्सेंट, पोलैंड के पास 12 पर्सेंट, रूस के पास 8 पर्सेंट, मेक्सिको के पास 7 पर्सेंट, चिली के पास 5 पर्सेंट, बोलिविया के पास 4 पर्सेंट और अमेरिका के पास 4 पर्सेंट चांदी मौजूद है।  

खत्म हो रही चांदी?

 

दरअसल, दुनिया में चांदी की सप्लाई लैटिन अमेरिकी देशों से होती है। हालांकि, इन देशों की खदानें अब खाली हो रही हैं और भंडार घट रहा है। दुनिया को 25 पर्सेंट चांदी की सप्लाई करने वाले मेक्सिको में भी उत्पादन घट रहा है। मेक्सिको की सबसे बड़ी सैन जूलियन खदान 2027 तक बंद हो जाएगी जिसके चलते चिंता और बढ़ती जा रही है। मेक्सिको के बाद जो देश बड़े चांदी उत्पादक हैं, उनमें चिली, बोलीविया और पेरू प्रमुख हैं। इन देशों में जो चांदी मिल रही है, उसकी क्वालिटी अच्छी नहीं है। यानी ज्यादा खनन करके जितनी चांदी मिलती है, उसकी तुलना में खर्च ज्यादा हो जाता है। इसके चलते डिमांड की तुलना में सप्लाई कम हो पा रही है। चांदी के साथ एक और समस्या है कि इसका खनन सीधे तौर पर नहीं होता है। चांदी ज्यादातर अन्य धातुओं के खनन के साथ निकलती है। ऐसे में इसका उत्पादन चाहकर भी बहुत नहीं बढ़ाया जा सकता है। 

 

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अब उत्पादन कम होने और मांग लगातार बढ़ने का असर हुआ है कि चांदी की रीसाइकलिंग पर जोर बढ़ा है। कई कंपनियां पुरानी सोलर प्लेट्स, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और अन्य चीजों से चांदी को निकालकर उसे रीसाइकल कर रही हैं। कई संस्थानों में इस पर रिसर्च भी हो रही है कि अधिकतम चांदी की रीसाइकलिंग कैसे की जाए। 'द सिल्वर इंस्टीट्यूट' का कहना है कि चांदी की रीसाइकलिंग हर साल बढ़ती जा रही है। साल 2023 की तुलना में साल 2024 में 6 प्रतिशत ज्यादा चांदी रीसाइकल की गई। साल 2023 में दुनियाभर में जितनी चांदी की सप्लाई हुई उसमें 18 प्रतिशत चांदी रीसाइकलिंग से ही प्राप्त हुई थी।

 

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इसी रीसाइकलिंग को और बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने पिछले साल राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) के तहत 1500 करोड़ की इन्सेंटिव योजना शुरू की। इसके जरिए इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट की रीसाइकलिंग करके उनसे अहम खनिजों को निकाला जाएगा। यह योजना साल 2030-31 तक लागू रहेगी।  सरकार को उम्मीद है कि इससे हर साल लगभग 40 टन क्रिटिकिल मिनरल्स हर साल रीसाइकल किए जा सकेंगे और हजारों लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।

 

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तेजी से बढ़ रही है चांदी की रीसाइक्लिंग, Photo Credit: Notebook LM

 

चीन ने चांदी पर क्या किया?

 

चांदी की प्रोसिसंग के मामले में सबसे आगे चीन है। 2025 में जनवरी से नवंबर तक चीन ने 4600 टन चांदी का निर्यात किया था और सिर्फ 220 टन चांदी का आयात किया। अब चीन ने 1 जनवरी 2026 से चांदी के निर्यात को थोड़ा कंट्रोल किया है। नए नियमों के मुताबिक, अब चांदी के निर्यात के लिए चीन में सरकार से परमिशन लेना जरूरी है। चीन ने बाकायदा उन कंपनियों की एक लिस्ट तक जारी कर दी है जो टंगस्टन, एंटीमनी और चांदी का निर्यात कर सकेंगी।

 

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चांदी के निर्यात को कंट्रोल करेगा चीन, Photo Credit: Notebook LM

 

 

कुल 44 कंपनियों को चांदी का निर्यात करने की इजाजत दी गई है। 2025 में सिर्फ 42 कंपनियों को ही इसकी इजाजत थी। साथ ही, इसे 'स्ट्रैटजिक मटीरियल' का दर्जा दिया गया है। रेयर अर्थ मटीरियल्स को भी इसी कैटगरी में रखा जाता है और उनके निर्यात पर भी ऐसे ही नियम लागू होते हैं। चीन के इस कदम की आलोचना भी होने लगी है। एलन मस्क ने कहा था कि कई उद्योगों के लिए चांदी बेहद जरूरी है ऐसे में यह ठीक नहीं है। 

किन चीजों में होता है चांदी का इस्तेमाल?

 

चांदी हाई इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी वाली धातु है यानी बेहतर बिद्युत सुचालक (इलक) है। साधारण भाषा में मतलब यह हुआ कि इसमें करंट बहुत तेजी से और आसानी से दौड़ जाता है। ऐसे में बैटरी वाले उपकरणों में चांदी का इस्तेमाल खूब किया जाता है। उदाहरण के लिए- सोलर पैनल में लगने वाले फोटोवोल्टिक सेल में, इलेक्ट्रिक गाड़ियों की वायरिंग और उसके उपकरणों में, चार्जिंग के लिए बनने वाले स्टेशन में, सेंसर में, चार्जर में और पावर ग्रिड के साथ-साथ कई अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में चांदी का खूब इस्तेमाल होता है। 

 

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द सिल्वर इंस्टीट्यूट के 'वर्ल्ड सिल्वर सर्वे 2025' के मुताबिक, साल 2025 में 59 प्रतिशत चांदी का इस्तेमाल सोलर एनर्जी, EV और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया गया। गहनों में 17 प्रतिशत, चांदी के बर्तनों में 4 प्रतिशत और 24 प्रतिशत चांदी का इस्तेमाल निवेश से जुड़ी चीजों में हुआ। यही सर्वे बताता है कि पिछले 8-9 साल में चांदी के औद्योगिक इस्तेमाल का प्रतिशत तेजी से बढ़ा है। साल 2016 में जहां 45 प्रतिशत चांदी का इस्तेमाल सोलर एनर्जी, EV और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में हो रहा था, वही 2025 में बढ़कर 59 प्रतिशत पहुंच चुका है।

 

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कहां-कहां होता है चांदी का इस्तेमाल, Photo Credit: Khabargaon

 

 

इसे उदाहरणों से समझते हैं। बीते कुछ साल में इलेक्ट्रिक गाड़ियों, गैजेट्स और कंप्यूटर आधारित चीजों के इस्तेमाल में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों की कमी के चलते सौर ऊर्जा पर भी खूब निवेश हो रहा है। ऐसे में चांदी का इस्तेमाल इन दो सेक्टर में खूब बढ़ा है। एक वर्ग मीटर आकार की सोलर प्लेट बनाने में 3 से 10 ग्राम तक चांदी का इस्तेमाल होता है। एक अच्छी बात है कि टेक्नॉलजी में सुधार होने से इसमें थोड़ी कमी आई है। पहले जहां सोलर प्लेट की हर सेल के लिए 521 मिलीग्राम चांदी की जरूरत पड़ती थी, अब यह घटकर 111 मिलीग्रीम पर आ गई है।

 

सोलर पैनल के अलावा इलेक्ट्रिक गाड़ियों में भी चांदी का खूब इस्तेमाल हो रहा है। आज कल आ रही एक इलेक्ट्रिक कार में 25 से 50 ग्राम तक चांदी का इस्तेमाल होता है। अब यह मात्रा तो कम लगती है लेकिन जब कारों की संख्या के हिसाब से गणित लगाएं तो संख्या काफी बढ़ जाती है। भारत में साल 2025 में कुल 1,76,817 इलेक्ट्रिक कार बेची गईं। यह संख्या 2024 की तुलना में 77 प्रतिशत ज्यादा है। यानी इलेक्ट्रिक कारों की मांग तेजी से बढ़ रही है और नतीजतन चांदी की मांग भी बढ़ रही है।


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