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मसाला और महाराजा बॉन्ड क्या हैं; भारत का फायदा होता है या नुकसान?

भारत ने विदेशी बाजारों से निवेश जुटाने के लिए मसाला और महाराजा बॉन्ड की शुरुआत की। इन बॉन्ड के जरिए HDFC और NTPC जैसी कंपनियों ने बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भारी फंड जुटाया है।

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भारत की पहचान दुनिया में मसालों से है और शायद इसीलिए जब विदेशी बाजारों में रुपये में बॉन्ड जारी हुए तो उन्हें मसाला बॉन्ड कहा गया। इसी के साथ एक और बॉन्ड आया जिसका नाम था महाराजा बॉन्ड। दोनों का मकसद एक ही था, भारत के लिए विदेश से पैसा जुटाना लेकिन दोनों के खरीदार अलग-अलग थे।

 

बॉन्ड एक तरह का कर्ज पेपर होता है। जब किसी कंपनी या सरकार को पैसों की जरूरत होती है तो वह सीधे निवेशकों से पैसे उधार लेती है और बदले में एक कागज देती है जिसे बॉन्ड कहते हैं। इसमें लिखा होता है कि इतने साल बाद पैसा वापस होगा और हर साल इतना ब्याज मिलेगा।

 

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मसाला बॉन्ड की खासियत क्या है?

पहले जब भारतीय कंपनियां विदेश से पैसा उधार लेती थीं तो डॉलर में लेती थीं। इसमें एक दिक्कत थी कि अगर रुपया कमजोर हो जाए तो कंपनी को वापसी में ज्यादा रुपये चुकाने पड़ते थे। मसाला बॉन्ड में यह जोखिम पलट गया। ये बॉन्ड रुपये में जारी होते हैं लेकिन खरीदार विदेशी होते हैं इसलिए रुपये-डॉलर के उतार-चढ़ाव का जोखिम कंपनी का नहीं बल्कि निवेशक का हो जाता है। 

महाराजा बॉन्ड कहां से आया?

IFC यानी इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन ने जब रुपये में बॉन्ड जारी किए तो दो नाम दिए। जो बॉन्ड विदेशी निवेशकों को बेचे गए उन्हें मसाला बॉन्ड कहा गया और जो भारतीय निवेशकों को बेचे गए उन्हें महाराजा बॉन्ड कहा गया। 2014 में IFC ने पहला मसाला बॉन्ड जारी किया और 1,000 करोड़ रुपये जुटाए जो भारत में बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट में लगे। 2015 में IFC ने ग्रीन मसाला बॉन्ड भी जारी किए जिनसे 315 करोड़ रुपये जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जुटाए गए।

किन कंपनियों ने यह किया?

जुलाई 2016 में HDFC मसाला बॉन्ड जारी करने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी। HDFC ने लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर 3,000 करोड़ रुपये के बॉन्ड लिस्ट किए और कुल चार चरणों में 5,000 करोड़ रुपये जुटाए जिस पर ब्याज दर 7.875 फीसदी सालाना थी। 

 

अगस्त 2016 में NTPC (National Thermal Power Corporation Limited) ने 2,000 करोड़ रुपये के ग्रीन मसाला बॉन्ड जारी किए जो नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के लिए थे। 2019 में केरल की संस्था KIIFB (Kerala Infrastructure Investment Fund Board) ने 2,150 करोड़ रुपये के मसाला बॉन्ड लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर जारी किए और यह किसी भारतीय राज्य की तरफ से पहली बार था।

भारत को क्या फायदा हुआ?

भारत में ब्याज दरें ऊंची हैं जबकि पश्चिमी देशों में कम, इसलिए विदेश से 7 फीसदी से कम दर पर पैसा उठाना घरेलू कर्ज से सस्ता पड़ता था। इसके अलावा, जब विदेशी निवेशक रुपये में निवेश करते हैं तो रुपये की अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ती है और देश के बुनियादी ढांचे को पैसा मिलता है। 

कमी क्या है?

विदेशी निवेशक के लिए सबसे बड़ा खतरा रुपये की कमजोरी है। जैसे कि अमेरिकी निवेशक ने 2016 में मसाला बॉन्ड खरीदा जब 1 डॉलर 67 रुपये का था। जब 2019 में उसे पैसा वापस मिला तो 1 डॉलर 70 रुपये का हो चुका था यानी रुपया कमजोर हो गया। ऐसे में उसे रुपये में तो पूरा ब्याज मिला लेकिन जब उसने उसे वापस डॉलर में बदला तो हाथ में कम डॉलर आए। यही सबसे बड़ा जोखिम है। 

 

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ब्याज की बात करें तो शुरुआत में HDFC ने 2016 में 7.875 फीसदी सालाना ब्याज दिया था जो उस वक्त अमेरिका और यूरोप की तुलना में काफी ज्यादा था क्योंकि वहां ब्याज दर 1 से 2 फीसदी के आसपास थी। इसी वजह से विदेशी निवेशक इन बॉन्ड की तरफ खिंचे लेकिन बाद में RBI ने धीरे-धीरे इन बॉन्ड पर ब्याज की अधिकतम सीमा घटा दी। जब ब्याज कम हुआ और ऊपर से रुपये के गिरने का डर भी रहा तो विदेशी निवेशकों के लिए यह सौदा पहले जितना फायदेमंद नहीं रहा। 

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