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गीता ज्ञान से अदालत तक, JAL खरीदने को लेकर अदाणी से क्यों भिड़ा वेदांता ग्रुप?

वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने जेपी समूह के लिए सबसे अधिक बोली लगाने के बाद फैसला पलटने का आरोप लगाया। समूह ने इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया है।

Adani Group vs Vedanta Group

अनिल अग्रवाल और गौतम अडानी। (Photo Credit: X/@AnilAgarwal_Ved/@gautam_adani)

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जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) के अधिग्रहण मामले में अनिल अग्रवाल की वेदांता लिमिटेड ने कानूनी लड़ाई शुरू कर दी है। राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्याधिकरण से झटका लगने के बाद वेदांता ने सुप्रीम कोर्ट में 25 मार्च को एक याचिका दाखिल की है। अपनी ने आरोप लगाया कि अधिक बोली लगाने के बावजूद प्रक्रिया में निष्पक्षता नहीं बरती गई। वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट किया। इसमें जेपी ग्रुप को खड़ा करने वाले जयप्रकाश गौड़ के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया। 

 

अपनी पोस्ट में उन्होंने दावा किया कि वेदांता ग्रुप को लिखित पुष्टि मिली थी कि उसने जेपी समूह की संपत्ति के लिए बोली जीत ली है। मगर बाद में फैसला उलट दिया गया। दिवालियापन प्रक्रिया के तहत जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) के अधिग्रहण के लिए सार्वजनिक तौर पर सबसे अधिक बोली लगाने वाला घोषित किया गया था।

 

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उन्होंने आगे लिखा, 'आज सुबह मैं भगवद गीता का 15वां अध्याय पढ़ रहा था। एक विचार मेरे मन में रह गया- साहस रखो। विनम्र रहो। बिना किसी मोह के अपना कर्तव्य निभाओ। जीवन ने इस बात की परीक्षा ली। कुछ साल पहले जेपी ग्रुप खड़ा करने वाले जयप्रकाश गौड़ मुझसे मिलने लंदन आए थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कड़ी मेहनत और दूरदृष्टि से एक विशाल साम्राज्य बनाया था। उन्होंने कई बार मुझसे संपर्क किया। मुझे पत्र भी लिखे। उनकी एक बेहद सीधी-साधी इच्छा थी कि उन्होंने जो कुछ भी बनाया है, वह सुरक्षित हाथों में जाए और सही इरादे के साथ आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने हिंदी में अपने ही शब्दों में पत्र लिखकर मुझ पर अपना भरोसा जताया था। उस समय हम इस मामले में आगे नहीं बढ़ पाए थे।'

 

 

 

हमने लगाई सबसे अधिक बोली: अनिल अग्रवाल

अग्रवाल ने आगे बताया, 'हाल ही में आईबीसी प्रक्रिया के तहत सीओसी द्वारा इस संपत्ति की सार्वजनिक नीलामी की गई। कई बड़े और मजबूत बोलीदाताओं ने हिस्सा लिया। अचानक जयप्रकाश गौड़ की भावनाएं और इच्छाएं मेरे मन में ताजा हो गईं। एक-एक करके सभी बोलीदाताओं ने नीलामी से अपना नाम वापस ले लिया। आखिरकार हमें सार्वजनिक रूप से ‘सबसे बड़ी बोली लगाने वाला’ घोषित कर दिया गया। यह एक पूरी तरह से पारदर्शी प्रक्रिया थी। हमें लिखित रूप में सूचित किया गया कि हम जीत गए हैं, लेकिन जीवन कभी भी इतना सीधा-सादा नहीं होता। कुछ दिनों बाद फैसला बदल दिया गया। मैं इसकी बारीकियों या विस्तार में नहीं जाना चाहता। उसके लिए सही मंच मौजूद है।'

 

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क्या है पूरा मामला?

जेएएल को 57 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज को न चुकाने पर 2024 में दिवालिया घोषित किया गया था। पिछले साल ही कंपनी ऑफ कंजर्वेटिव्स (CoC) ने जेएएल अधिग्रहण से जुड़े अडाणी समूह की प्रस्तावित समाधान योजना को हरी झंडी दी। सबसे अधिक 89 फीसद लेनदारो से मत अडाणी एंटरप्राइजेज को मिले। इसके बाद डालमिया सीमेंट (भारत) और वेदांता समूह थे।

 

अडाणी समूह की बोली की मंजूरी के लिए दिवालिया अदालत एनसीएलटी में अपील की गई। यहां से बोली को मंजूरी मिलने के बाद वेदांता ग्रुप ने अपीलीय निकाय एनसीएलटी में चुनौती दी। हालांकि यहां से भी वेदांता समूह को राहत नहीं मिली। वेदांता का तर्क है कि लेनदारों की समिति ने उसे सबसे अधिक बोलीदाता घोषित किया था। अडाणी एंटरप्राइजेज ने जहां 14,535 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी। वहीं वेदांता ने 16,726 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी।

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