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जमीन से निकले तेल में भी होता है अंतर, समझिए कैसे अलग हैं WTI और ब्रेंट क्रूड

इन दिनों कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और अभी आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इसकी कीमतें और बढ़ सकती हैं। इस बीच WTI और ब्रेंट क्रूड का अंतर समझना जरूरी है।

crude oil prices

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI

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अगर आप भी सुबह उठकर खबरें पढ़ते हैं या टीवी पर न्यूज देखते हैं तो अक्सर क्रू़ड ऑयल या कच्चा तेल जैसे शब्द सुनते होंगे। कई बार ब्रेंट क्रूड और WTI जैसे शब्द भी अलग-अलग देशों और अलग-अलग कारणों से चर्चा में आते हैं। असल में तो यह जमीन से निकलने वाला तेल ही है लेकिन अपनी क्वालिटी और उपलब्धता के कारण इसका नाम बदल जाता है। इन दिनों पश्चिमी एशिया में जारी तनाव के चलते कच्चे तेल की खूब चर्चा हो रही है क्योंकि एक बैरल की कीमत 100 डॉलर के भी पार पहुंच गई है और दुनियाभर में पेट्रोलियम उत्पादों के महंगा होने की आशंका जताई जा रही है।

 

सोमवार सुबह ब्रेंट क्रूड ऑयल के एक बैरल की कीमत 115 डॉलर से भी ज्यादा हो गई। इतना महंगा तेल जून 2022 के बाद अब पहली बार हुआ है। अभी भी आशंका जताई जा रही है कि अगर ईरान बनाम इजरायल और अमेरिका का यह युद्ध खत्म नहीं हुआ तो यह कीमत 150 डॉलर यानी लगभग दोगुना तक पहुंच सकती है। कतर जैसे देशों ने संकेत दिए हैं कि अगर ऐसी स्थिति रही तो वे तेल का निर्यात भी रोक सकते हैं।

 

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अगर ऐसा होता है तो पेट्रोलियम उत्पादों पर आधारित कंपनियों जैसे कि पेंट और अन्य केमिकल उत्पादों की कीमतें भी आसमान छू सकती हैं। इस स्थिति में महंगा बढ़ने के आसार हैं और भारत समेत तमाम देशों की सरकारों को इसके चलते समस्या का सामना करना पड़ सकता है। खैर, हम पहले यह समझते हैं कि अलग-अलग कच्चे तेलों में अंतर क्या होता है।

WTI और ब्रेंट क्रूड का अंतर

 

WTI का फुलफॉर्म है वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट। यह मुख्य तौर पर अमेरिका के टेक्सास, ओकलाहोमा और उत्तरी डकोटा में पाया जाता है। यह हल्का और मीठा क्रू़ड ऑयल होता है। मतलब इसका घनत्व कम होता है और इसमें सल्फर की मात्रा कम होती है। इसी के चलते इसे रिफाइन करने में कम खर्च आता है। वैश्विक स्तर पर जब क्रूड ऑयल की कीमतों का आकलन होता है तो WTI की कीमतों को बेंचमार्क के तौर पर देखा जाता है। खासकर अमेरिकी देशों से जहां भी कच्चा तेल जाता है, वहां WTI ही मानक होता है। मोटा-माटी समझें तो यह अच्छी क्वालिटी का कच्चा तेल होता है। क्वालिटी बेहतर होने के बावजूद यह तेल सस्ता बिकता है क्योंकि इसका ट्रांसपोर्टेशन कम खर्चीला होता है। यही वजह है कि इसकी कीमतें बढ़ने का मतलब है कि कई चीजों के दाम प्रभावित होते हैं।

 

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ब्रेंट क्रूड वह कच्चा तेल है जो मुख्य रूप से नॉर्वे, डेनमार्क और यूनाइटेड किंगडम में मिलता है। यह भी हल्का और मीठा ही होता है। यानी दोनों में मुख्य अंतर इनके पाए जाने की जगह में है। ब्रेंट क्रूड भी हल्का तो होता है लेकिन WTI जितना हल्का नहीं होता है। मानक के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टिट्यूट (API) ग्रेविटी का इस्तेमाल होता है और तेल के हल्केपन को 10 से 70 के बीच मापा जाता है। जितना हल्का तेल होगा, उसका API उतना ही ज्यादा होगा।

 

इस पैमाने पर देखें तो WTI का API ग्रैविटी 39.6 डिग्री और ब्रेंट का 38 डिग्री होता है। यानी इसमें भी कोई खास अंतर नहीं है। WTI में सल्फर 0.24 पर्सेंट होता है और ब्रेंट में 0.40 पर्सेंट। आपको यहां यह जरूर जानना चाहिए कि अरब देशों से निकलने वाला कच्चा तेल इन दोनों से थोड़ा अलग होता है लेकिन वह ब्रेंट क्रूड जैसा ही माना जाता है।


भारत क्या खरीदता है?

 

कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर भारत ब्रेंट और WTI  क्रूड दोनों ही खरीदता है। ज्यादा मात्रा ब्रेंट की होती है। हालांकि, ब्रेंट और क्रूड के अलावा भी कई तरह के तेल दुनिया में होते हैं। उदाहरण के लिए- भारत ने लंबे समय से रूस से कच्चा तेल खरीदा जिसे यूरल्स कहा जाता है। इसकी कीमत ब्रेंट के ही आसपास होती है लेकिन यह थोड़ा और भारी होता है। ब्रेंट क्रूड भारत को लिए फायदेमंद माना जाता है क्योंकि भारतीय तेल कंपनियों के लिए इसे खरीदना और खरीदकर ले आना सस्ता पड़ता है।


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