अब तक 2 मुख्यमंत्री बना चुका भवानीपुर, क्या इस बार सुवेंदु अधिकारी को देगा मौका?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भवानीपुर विधानसभा सीट का इतिहास काफी ज्यादा रोचक रहा है। अब तक दो सीएम के लिए संकटमोचन बनी यह सीट एक समय पर राजनीतिक नक्शे से ही गायब हो गई थी। अब इस सीट पर ममता बनर्जी बनाम सुवेंदु अधिकारी होने जा रहा है।

भवानीपुर बनी हॉट सीट, Photo Credit: SORA
आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली भवानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही है लेकिन ममता बनर्जी को पहली बार विधानसभा पहुंचाने वाली यही सीट है। इस सीट पर ममता बनर्जी की पार्टी का 2011 से कब्जा है और हर मुश्किल समय में टीएमसी के लिए यह सीट ही सहारा बनी है। 2011 में पहली बार विधानसभा पहुंचने के लिए ममता बनर्जी के लिए यही सीट खाली करवाई गई थी और उपचुनाव के बाद ममता बनर्जी पहली बार विधायक बनी थी। 10 साल बाद 2021 में ममता बनर्जी नंदिग्राम से हार गईं और उन्हें फिर से विधानसभा जाने के लिए भवानीपुर सीट से उपचुनाव लड़ना पड़ा।
टीएमसी और ममता बनर्जी का पिछले डेढ़ दशक से गढ़ बन चुकी यह भवानीपुर की सीट एक समय कांग्रेस के दिग्गजों को गढ़ हुआ करती थी। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार जैसे कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं ने भी इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इन दिग्गजों के कारण इस सीट को पार्टी के प्रमुख शहरी गढ़ों में से एक के रूप में मजबूत पहचान मिली।
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लेफ्ट के लिए लगभग अभेद रहा किला
आजादी के बाद से लंबे समय तक यह विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ बना रहा। इस सीट पर कांग्रेस की हर बार जीत होती थी। हालांकि, बीच में एक छोटे अंतराल के लिए इस सीट पर लेफ्ट ने कब्जा कर लिया था। 1969 में इस सीट पर लेफ्ट ने जीत दर्ज की थी और उस समय इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट विधानसभा क्षेत्र कर दिया गया था। इस सीट से सीपीआई (एम) नेता साधन गुप्ता ने लेफ्ट की दूसरी सरकार के दौरान यह सीट जीती थी।
भवानीपुर सीट को क्यों हटा दिया था?
पश्चिम बंगाल में दिग्गजों का गढ़ रही यह सीट 1972 में हुए परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गई। इसके बाद यह सीट करीब 4 दशकों तक सिर्फ इतिहास में रही। उस समय किसी ने शायद सोचना नहीं होगा कि यह सीट एक बार फिर से पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्र बन जाएगी। साल 2011 में पसिसीमन के दौरान यह सीट फिर से असत्तित्व में आयी। यह वही समय था जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में लेफ्ट और टीएमसी के बीच कड़ा मुकाबला हो रहा था। इस कड़े मुकाबले में टीएमसी ने जीत दर्ज कर ली। ममता बनर्जी ने लेफ्ट के 34 साल के शासन को खत्म कर सीएम पद की शपथ ली। हालांकि, उन्हें सीएम बने रहने के लिए विधानसभा सदस्य बनना जरूरी था और इसके लिए उन्होंने उसी ऐतिहासित भवानीपुर सीट को चुना। ममता बनर्जी ने इस सीट से उपचुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बनीं।
2011 से अब तक ममता का गढ़
कांग्रेस के दबदबे वाली इस सीट पर ममता बनर्जी ने 2011 में अपने करीबी सुब्रत बक्शी को उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने 64 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल कर इस सीट पर जीत दर्ज की और इसके बाद ममता बनर्जी के लिए सीट खाली कर दी। ममता बनर्जी ने करीब 77 प्रतिशत वोट के साथ पहली बार विधानसभा में एंट्री की। इसके बाद से भवानीपुर टीएमसी का मजबूत किला बन चुका है।
2016 के विधानसभा चुनावों में, वामपंथी और कांग्रेस ने गठबंधन किया और बनर्जी के खिलाफ कांग्रेस की वरिष्ठ नेता दीपा दासमुंशी को मैदान में उतारा। इस मुकाबले को दीदी और बौदी के बीच लड़ाई के तौर पर पेश किया गया था। हालांकि, इस लड़ाई में ममता बनर्जी की ही जीत हुई।
2021 में फिर से संकटमोचन बनी भवानीपुर सीट
2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के सामने उन्हीं के पूर्व सहयोगी सुवेंदु अधिकारी ने मुश्किलें खड़ी कर दीं। सुवेंदु अधिकारी ने उनका साथ छोड़कर बीजेपी के साथ चले गए और बीजेपी ने उन्हें नंदीग्राम से चुनावी मैदान में उतार दिया। ममता बनर्जी भवानीपुर छोड़ सुवेंदु अधिकारी को चुनौती देने नंदीग्राम चली गईं। हालांकि, वहां उन्हें सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद ममता बनर्जी को विधानसभा जाने के लिए फिर से भवानीपुर जाना पड़ा। भवानीपुर में फिर से ममता बनर्जी ने बंपर वोटों के साथ जीत दर्ज की।
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सिद्धार्थ शंकर रे, ममता के बाद सुवेंदु?
ममता बनर्जी के लिए भवानीपुर सीट संकटमोचक की तरह रही है। जब भी ममता को जरूरत पड़ी है तो भवानीपुर की जनता उनके साथ खड़ी रही। इसी तरह बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे के लिए भी भवानीपुर सीट मजबूत किला थी। इस सीट से वह कई बार चुनाव जीते थे। 1957 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीतकर डॉ. बिधान चंद्र रॉय के मंत्रिमंडल में जगह हासिल की थी। हालांकि, महज 13 महीने बाद उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मतभेदों के कारण मंत्री पद और पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने 2 बार भवानीपुर से निर्दलीय चुनाव जीता और बाद में बंगाल के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे।
इस साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने नेता सुवेंदु अधिकारी को भवानीपुर सीट से टिकट दे दिया है। अब ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच इस सीट पर मुकाबला होगा। बीजेपी के दिग्गज नेता सुवेंदु अधिकारी को बीजेपी समर्थक अगले सीएम के तौर पर भी देख रहे हैं। 2011 में ममता बनर्जी के उदय की गवाह बन चुकी भवानीपुर सीट क्या इस मुश्किल समय में सुवेंदु अधिकारी को सहारा देगी। अगर ममता बनर्जी इस सीट से चुनाव हारती हैं तो यह उनके लिए एक बड़ी हानि और बीजेपी के लिए बंगाल में बड़ी जीत होगी।
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